श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १३

और्व बोले -
पुत्रके उप्तन्न होनेपर पिताको सचैल ( वस्त्रोसहित ) स्नन करना चाहिये । उसके पश्चात जातकर्म - संस्कार और आभ्युदयिक श्राद्ध करने चाहिये ॥१॥
फिर तन्मयभावसे अनन्यचित होकर देवता और पितृगणके लिये क्रमशः दायीं और बायीं ओर बिठाकर दो-दो ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हें भोजन करावे ॥२॥
हे राजन् ! पूर्व अथवा उत्तरकी और मुख करके दधि, अक्षत और बदरीफलसे बने हुए पिण्डोको देवतीर्थं * या प्रजापतितीर्थसे** दान करे ॥३॥
हे पृथिवीनाथ ! इस आभुदयिक श्राद्धसे नान्दिमुख नामक पितृगण प्रसन्न होते हैं अतः सब प्रकारकी अभिवृद्धिके समय पुरुषोंको इसका अनुष्ठाना करना चाहिये ॥४॥
कन्या और पुत्रके विवाहमें गृहप्रवेशमें, बालकोंके नामकरण तथा चूडाकर्म आदि संस्कारोंमें, सीमन्तोन्नयन - संस्कारमें और पुत्र आदिके मुख देखनेके समय गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्तसे नान्दिमुख नामक पितृगणका पूजन करे ॥५-६॥
हे पृथिवीपाल ! आभ्युदयिक श्राद्धमें पितृपूजाका यह सनातन क्रम तुमको सुनाया, अब प्रेताक्रियाकी विधि सुनो ॥७॥
बन्धु बान्धवोंको चाहिये कि भली प्रकार स्नान करानेके अनन्तर पुष्प-मालाओंसे विभूषित शवका गाँवके बाहर दाह करें और फिर जलाशयमें वस्त्रसहित स्नान कर दक्षिण-मुख होकर ‘यत्र तत्र स्थितायैतदमुदाय ‘ ***आदि वाक्यका उच्चारण करते हुए जलाज्जील दें ॥८-९॥
तदनन्तर, गोधूलिके समय तारा-मण्डलके दीखने लगनेपर ग्राममें प्रवेश करें और कतकर्म ( अशौच कृत्य ) सम्पन्न करके पृथिवीपर तृणादिकी शय्यापर शयन करें ॥१०॥
हे पृथिवीपते ! मृत पुरुषके लिये नित्यप्रति पृथिवीपर पिण्डदान करना चाहिये और हे पुरुषश्रेष्ठ ! केवल दिनके समय मांसहीन भात खाना चाहिये ॥११॥
अशौच कालमें, यदि ब्राह्मणोंकी इच्छा हो तो उन्हें भोजन कराना चाहिये, क्योंकी उस समय ब्राह्मण और बन्धुवर्गके भोजन करनेसे मृत जीवकी तृप्ति होती है ॥१२॥
अशौचके पहले, तीसरे, सातवें अथवा नवें दिन वस्त्र त्यागकर और बहिर्देंशमें स्नान करके तिलोदक दे ॥१३॥
हे नॄप ! अशौचके चौथे दिन अस्थिचयन करना चाहिये; उसके अनन्तर अपने सपिण्ड बन्धुजनोंका अंग स्पर्श किया जा सकता है ॥१४॥
हे राजन ! उस समयसे समानोदक +पुरुष चन्दन और पुष्पधारण आदि क्रियाओंके सिवा ( पत्र्चयज्ञादि ) और सब कर्म कर सकते हैं ॥१५॥
भस्म और अस्थिचयनके अनन्तर सपिण्ड पुरुषोंद्वारा शय्या और आसनक उपयोग तो किया जा सकता है किन्तु स्त्री - संसर्ग नहीं किया जा सकता ॥१६॥
बालक, देशान्तरस्थित व्यक्ति, पतित और तपस्वीके मरनेपर तथा जल, अग्नि और उद्धन्धन ( फाँसी लगाने ) आदिद्वारा आत्मघात करनेपर शीघ्र ही अशुचकी निवृत्ति हो जाती है ++ ॥१७॥
मृतकके कुटुम्बका अन्न दस दिनतक न खाना चाहिये तथा अशौच कालमें दान, परिग्रह, होम और स्वाध्याय आदि कर्म भी न करने चाहिये ॥१८॥
यह ( दस दिनका ) अशौच ब्राह्मणका है; क्षत्रियका अशौच बारह दिन और वैश्यका पन्द्रह दिन रहता है तथा शुद्रकी अशौच शुद्धि एक मासमें होती हैं ॥१९॥
अशौचके अन्तमे इच्छानुसार अयुग्म ( तीन, पाँच, सात, नौ आदि ) ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा उनकी उच्छिष्ट ( जूठन ) के निकट प्रेतकी तृत्पिके लिये कूशापर पिण्डदान करे ॥२०॥
अशौच- शुद्धि हो जानेपर ब्रह्माभोजके अनन्तर ब्राह्मण आदि चारों वर्णोको क्रमशः जल, शस्त्र, प्रतोद ( क्रोड़ा ) और लाठीका स्पर्श करना चाहिये ॥२१॥
तदनन्तर ब्राह्मण आदि वर्णोके जो-जो जातीय धर्म बतलाये गये हैं उनका आचरण करे; और स्वधर्मनौसार उपार्जित जीविकासे निर्वाह करे ॥२२॥
फिर प्रतिमास मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट - श्राद्ध करे जो आवाहनादि क्रिया और विश्वेदेवसम्बन्धी ब्राह्मणके आमन्तण आदिसे रहित होने चाहिये ॥२३॥
उस समय एक अर्घ्य और एक पवित्रक देना चाहिये तथा बहुत - से ब्राह्मणोंके भोजन करनेपर भी मृतकके लिये एक ही पिण्ड दान करना, चाहिये ॥२४॥
तदनन्तर, यजमानके ‘अभिरम्यताम्’ ऐसा कहनेपर ब्राह्मणगण ‘अभिरताः स्मः ‘ ऐसा कहे और फिर पिण्डदान समाप्त होनेपर ‘ अमृकस्य अक्षय्यमिदमुपतिष्ठताम् ‘ इस वाक्यका उच्चारण करें ॥२५॥
इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास एकोद्दिष्टकर्म करनेका विधान है । हे राजेन्द्र ! वर्षके समाप्त होनेपर सपिण्डीकरण करे; उसकी विधि सुनो ॥२६॥
हे पार्थिव ! ईशा सपिण्डिकरण कर्मको भी एक वर्ष, छः मास अथवा बारह दिनके अनन्तर एकोद्दिष्टश्राद्धकी विधिसे ही करना चाहिये ॥२७॥
इसमें तिल, गन्ध, और जलसे युक्त चार पात्र रखे । इनमेंसे एक पात्र मृत - पुरुषका होता है तथा तीन पितृगणके होते हैं । फीर मृत - पुरुषके पात्रस्थित जलादिसे पितृगणके पात्रोंका सित्र्चन करे ॥२८-२९॥
इस प्रकार मृत - पुरुषको पितृत्व प्राप्त हो जानेपर सम्पूर्ण श्राद्धधर्मोके द्वारा उस मृत पुरुषसे ही आरम्भ कर पितृगणका पूजन करे ॥३०॥
हे राजन ! पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भतीजा अथवा अपनी सपिण्ड सन्ततिमें उप्तन्न हुआ पुरुष ही श्राद्धादी क्रिया करनेका अधिकारी होती है ॥३१॥
यदि इन सबका अभाव हो तो समानोदककी सन्तति अथवा मातृपक्षके सपिण्ड अथवा समानोदकको इसका अधिकार है ॥३२॥
हे राजन ! मातृकुल और पितृकुल दोनोंके नष्ट हो जानेपर स्त्री ही इस क्रियाको करे; अथवा ( यदि स्त्री भी न हो तो ) साथियोंमेंसे ही कोई करे या बान्धवहीन मृतकके धनसे राजा ही उसके सम्पूर्ण प्रेत - कर्म करे ॥३३-३४॥
सम्पूर्ण प्रेत - कर्म तीन प्रकारके हैं - पूर्वकर्म, मध्यमकर्म तथा उत्तरकर्म ! इनके पृथक पृथक लक्षण सुनो ॥३५॥
दाहसे लेकर जल और शस्त्र आदिके स्पर्शपर्यन्त जितने कर्म हैं उनको पूर्वकर्म कहते हैं तथा प्रत्येक मासमें जो एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है वह मध्यमकर्म कहलाता है ॥३६॥
और हे नृप ! सपिण्डीकरणके पश्चात मृतक व्यक्तिके पितृत्वको प्राप्त हो जानेपर जो पितृकर्म किये जाते हैं वे उत्तरकर्म कहलाते हैं ॥३७॥
माता, पिता, सपिण्ड, समानोदक, समूहके लोग अथवा उसके धनका अधिकारी राजा पूर्वकर्म कर सकते है: किंतु उत्तरकर्म केवल पुत्र, दौहित्र आदि अथवा उनकी सन्तानकी ही करना चाहिये ॥३८-३९॥
हे राजन् ! प्रतिवर्ष मरण - दिनपर स्त्रियोंका भी उत्तरकर्म एकोद्दिष्ट श्राद्धकी विधिसे अवश्य करना चाहिये ॥४०॥
अतः हे अनघ ! उन उत्तरक्रियाओंको जिस- जिसको जिस- जिस विधिसे करना चाहिये, वह सुनो ॥४१॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥

  • अँगुलियोंके अग्रभाग ।
    ** कनिष्ठिकाका मूलभाग ।
    *** अर्थात हमलोग अमुल नाम - गोत्रवाले प्रेतके निमित्त, वे जहाँ कहीं भी हों यह जल देते हैं ।
  • समानोदक ( तर्पणादिमें समान जलाधिकारी अर्थात सगोत्र ) और सपिण्ड ( पिण्डधिकारी ) की व्याख्या कूर्मपुराणमें इस प्रकार की है -
    ‘सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समनोदकभावस्तु जन्मनाम्रोरवेदने ॥
    अर्थात = सातवीं पीढ़ीमें पुरुषकी सपिण्डता निवृत्त हो जाती है किन्तु समानोदकभाव उसके जन्म और नामका पता न रहनेपर दूर होता है ।
    ++ परन्तु माता - पिताके विषयके यह नियम नहीं है; जैसा कि कहा है - पितरौ चेन्मतौ स्यातां दुरस्थोऽपि हि पुत्रकः । श्रुत्वा तद्दिनमारभ्य दशांह सुतकी भवेत् ॥

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