प्रथम पाद - भगवानकी स्तुति

मार्कण्डेयजीको पिताका उपदेश , समय - निरुपणा , मार्कण्डेयद्वारा भगवानकी स्तुति
और भगवानका मार्कंण्डेयजीको भगवद्भक्तोंके लक्षण बताकर वरदान देना
नारदजीने पूछा -
ब्रह्मन् ‍ । पुराणोंमे यह सुना जाता है कि चिरत्र्जीवी महामुनी मार्कण्डेयने इस जगतके प्रलयकालमें भगवान् ‍ विष्णुकी मायाका दर्शन किया था , अत : इस विषयमें कहिये।
श्रीसनकजीने कहा -
नारदाजी। मैं उस सनातन कथाका वर्णन करुँगा , आप सावधान होकर सुनें। मार्कंण्डेय मुनिसे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा भगवान् ‍ विष्णुकी भक्तिसे परिपूर्ण है। साधुशिरोमाणि मृकण्डुने तपस्याने निवॄत्त होनेके बाद विवाह करके प्रसन्नतापूर्वक गॄहस्थधर्मका पालन आरम्भ किया। वे मन और इन्द्रियोंका संयम करके सदा प्रसन्न रहते और कॄतार्थाताका अनुभव करते थे। उनकी पत्नी बडी पवित्र , कार्यकुशल तथा निरन्तर पातिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली थीं। वे मन , वाणी और शरीरसे भी प्रातिव्रत - धर्मका पालन करती थीं। समय अनोपर उन्होंने भगवानके तेजोमय अंशसे युक्त गर्भ धारण किया और द्स महीनके बाद एक परम तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। महर्षि मॄकण्डु उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित पुत्रको देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने विधिपूर्वक मड्गलमय जातकर्म - संस्कार सम्पत्र कराया। मुनिका वह पुत्र शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन - दिन बढने लगा। विप्रवर। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें प्रसन्नतापूर्वक पुत्रका उपनयन - संस्कार करके मुनिने उसे वैदिक - धर्म - संहिताकी शिक्षा दी और कहा - बेटा। ब्राह्मणोंका दर्शन होनेपर सदा विधिपूर्वक उन्हें नमस्कार करना चाहिये। तीनों समय सूर्याको जलात्र्जलि देकर उनकी पूजा करना और वेदोंके स्वाध्यायपूर्वक वेदोक्त कर्मका पालन करते रहना चाहिये। ब्रह्मचर्य तथा तपस्याके द्बारा सदा श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। दुष्ट पुरुषोंसे वार्तालाप आदि निषिद्ध कर्मको त्याग देना चाहिये। भगवान् ‌‍ विष्णुके भजनमें लगे हुए साधुपुरुषोंके साथ रहना चाहिये। किसीसे भी द्वेष रखना उचित नहीं है। सबके हितका साधन करना चाहिये। वत्स ! जज्ञ , अध्ययन और दान – ये कर्म तुम्हें सदा करने चाहिये।
इस प्रकार पिताका आदेश पाकर मुनीश्वर मार्कण्डेय नित्य - निरन्तर भगवान् ‌‍ विष्णुका चिन्तन करते हुए स्वधर्मका पालन करने लगे। महाभाग मार्कण्डेय बड़े धर्मानुरागी और दयालु थे। वे मनको वशमें रखनेवाले और सत्यप्रतिज्ञ थे। वे जितेन्द्रिय , शान्त , महाज्ञानी और सम्पूर्ण तत्त्वोंके मर्मज्ञ थे। उन्होंने भगवान् ‌‍ विष्णुकी प्रसन्नताके लिये बड़ी भारी तपस्या की। बुद्धिमान् ‌‍ मार्कण्डेयके आराधना करनेपर जगदीश्वर भगवान् ‌‍ विष्णुने उन्हें पुराणसंहिता बनानेका वर दिया। चिरञ्जीवी मार्कण्डेयजी सुदर्शनचक्रधारी देवाधिदेव भगवान् ‌‍ विष्णुके महान् ‌‍ भक्त और उनके तेजके अंश ( अ० ५ श्लोक ६ ) थे। ब्रह्यन् ‌‍ ! यह संसार जब एकार्णवके जलमें विलीन हो गया , उस समय भी उन्हें अपना प्रभाव दिखानेके लिये भगवान् ‌‍ विष्णुने उनका संहार नहीं किया। मृकण्डुपुत्र मार्कण्डेय बड़े बुद्धिमान् ‌‍ और विष्णुभक्त थे। भगवान् ‌ श्रीहरि स्वयं जबतक सोते रहे , तबतक मार्कण्डेयजी वहाँ खड़े रहे। उस समयका माप मैं बतला रहा हूँ , सुनिये। पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा बतायी गयी है। नारदजी ! तीस काष्ठाकी एक कला समझनी चाहिये। तीस कलाका एक क्षण होता है और छः क्षणोंकी एक घड़ी मानी गयी है। दो घड़ीका एक मुहूर्त और तीस मुहूर्तका एक दिन होता है। तीस दिनका एक मास होता है और एक मासमें दो पक्ष होते हैं। दो मासका एक ऋतु और तीन ऋतुओंका एक अयन माना गया है। दो अयनसे एक वर्ष बनता है , जो देवताओंका एक दिन है। उत्तरायण देवताओंका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात्रि है। मनुष्योंके एक मासके बराबर पितरोंका एक दिन कहा जाता है। इसलिये सूर्य और चन्द्रमाके संयोगमें अर्थात् ‌‍ अमावस्याके दिन उत्तम पितृकल्प जानना चाहिये। बारह हजार दिव्या वर्षोंका एक दैवत युग होता है। दो हजार दैवत युगके बराबर ब्रह्याके एक दिन - रात्रिका मान है। वह मनुष्योंके लिये सृष्टि और प्रलय दोनों मिलकर ब्रह्याका दिन - रात - रूप एक कल्प है। इकहत्तर दिव्य चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता है और चौदह मन्वन्तरोंसे ब्रह्याजीका एक दिन पूरा होता है। मुने ! जितना बड़ा ब्रह्याजीका दिन होता है , उतनी हि बड़ी उनकी रत्रि भी बतायी गयी है। विप्रवर ! ब्रह्याजीकी रात्रिके समय तीनों लोकोंका नाश हो जाता है। मानव वर्ष - गणनाके अनुसार उसका जो प्रमाण है , वह सुनो। मुने ! एक हजार चतुर्युग ( चार हजार युग )- का ब्रह्याजीका एक दिन होता है। ऐसे ही तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका उनका एक वर्ष समझना चाहिये। ऐसे सौ वर्षोंमें उनकी आयु पूरी होती है। उनके काल - मानके अनुसार उनकी सम्पूर्ण आयुका समय दो परार्धका होता है। ब्रह्याजीका दो परार्ध भगवान् ‌ विष्णुके लिये एक दिन समझना चाहिये। इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि भी बतायी गयी है। मृकण्डुनन्दन मार्कण्डेयजी उतने ही समयतक उस भयंकर एकार्णवके जलमें भगवान् ‌‍ विष्णुकी शक्तिसे बलवान् ‌ होकर सूखे पत्तेकी भाँति खड़े रहे। उस समय वे श्रीहरिके समीप परमात्मतत्त्वका ध्यान करते हुए स्थित थे।
तदनन्तर प्रलयकालका अन्त समय आनेपर योगनिद्रासे मुक्त हो श्रीहरिने ब्रह्याजीके रूपसे इस चराचर जगत्‌की रचना की। जलका उपसंहार और जगत्‌‍की नूतन सृष्टि देखकर मार्कण्डेयजी चकित हो गये। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। महामुनि मार्कण्डेयने सिरपर अञ्जलि बाँधे नित्यानन्दस्वरूप श्रीहरिका प्रिय वचनोंद्वारा इस प्रकार स्तवन किया।
मार्कण्डेयजी बोले -
जिनके सहस्त्रों मस्तक हैं , रोग - शोक आदि विकारसे जो सर्वथा रहित हैं , जिनका कोई आधार नहीं है ( स्वयं ही सबके आधार हैं ) तथा जो सर्वत्र व्यापक हैं , मनुष्योंसे सदा प्रार्थित होनेवाले उन भगवान् ‌ नारायणदेवको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जो प्रमाणसे परे तथा जरावस्थासे रहित हैं , नित्य एवं सच्चिदानन्दस्वरूप हैं तथा जहाँ कोई तर्क या संकेत काम नहीं देता , उन भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। जो परम अक्षर , तित्य , विश्वके आदिकारण तथा जगत्‌‍के उत्पत्तिस्थान हैं , उन सर्वतत्त्वमय शान्तस्वरूप भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं नमस्कार करता हूँ। जो पुरातन पुरुष सब प्रकारकी सिद्धियोंसे सम्पन्न और सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र आश्रय हैं , जिनका स्वरूप परसे भी अति परे है , उन भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं नमस्कार करता हूँ। जो परम ज्योति , परम धाम तथा परम पवित्र पद हैं , जिनकी सबके साथ एकरूपता है , उन परमात्मा जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। सत् ‌‍, चित् ‌‍ और आनन्द ही जिनका स्वरूप है , जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्यादि देवताओंके लिये भी परम पद हैं , उन सर्वस्वरूप श्रेष्ठ सनातन भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सगुण , निर्गुण , शान्त , मायातीत और विशुद्ध मायाके अधिपति हैं तथा जो रूपरहित होते हुए भी अनेक रूपवाले हैं , उन भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। जो भगवान् ‌‍ इस जगत्‌‍की सृष्टि , पालन और संहार करते हैं , उन आदिदेव भगवान् ‌‍ जनार्दनको मैं नमस्कार करता हूँ। परेश ! परमानन्द ! शरणागतवत्सल ! दयासागर ! मेरी रक्षा कीजिये। मन - वाणीसे अतीत परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। विप्रवर नारदजी ! शङ्ख , चक्र और गदा धारण करनेवाले जगद्‌‍गुरु भगवान् ‌‍ विष्णु इस प्रकार स्तुति करनेवाले मार्कण्डेयजीसे अत्यन्त प्रसन्नता - पूर्वक बोले।
श्रीभगवान्‌‍ने कहा -
द्विजश्रेष्ठ ! संसारमें जो भक्त पुरुष मुझे भगवान्‌‍की भक्तिमें चित्त लगाये रहनेवाले हैं , उनपर संतुष्ट हो मैं सदा उनकी रक्षा करता हूँ , इसमें संदेह नहीं है। भगवद्भक्तरूपसे अपनेको छिपाकर मैं ही सदा सब लोकोंकी रक्षा करता हूँ।
मार्कण्डेयजीने पूछा -
भगवन् ‌‍ ! भगवद्भक्तके क्या लक्षण हैं ? किस कर्मसे मनुष्य भगवद्भक्त होते हैं , यह मैं सुनना चाहता हूँ ; क्योंकि इस बातको जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है।
श्रीभगवान्‌‍ने कहा -
मुनिश्रेष्ठ ! भगवद्भक्तोंके लक्षण बतलाता हूँ , सुनो। उनके प्रभाव अथवा महिमाका वर्णन करोड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। जो सम्पूर्ण जीवोंके हितैषी हैं , जिनमें दूसरोंके दोष देखनेकी आदत नहीं है , जो ईर्ष्यारहित , मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले , निष्काम एवं शान्त हैं , वे ही भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। जो मन , वाणी तथा क्रियाद्वारा दूसरोंको कभी पीड़ा नहीं देते तथा जिनमें संग्रह अथवा कुछ ग्रहण करनेका स्वभाव नहीं है , वे भगवद्भक्त माने गये हैं। जिनकी सात्तिक बुद्धि उत्तम भगवत्सम्बन्धी कथा - वार्ता सुननेमें स्वभावतः लगी रहती है तथा जो भगवान् ‌‍ और उनके भक्तोंके भी भक्त होते हैं , वे श्रेष्ठ भक्त समझे जाते हैं। जो श्रेष्ठ मानव माता और पिताके प्रति गंगा और विश्वनाथका भाव रखकर उनकी सेवा करते हैं , वे भी श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो भगवान्‌‍के पूजनमें रत हैं , जो इसमें सहायक होते हैं तथा जो भगवान्‌‍की पूजा देखकर उसका अनुमोदन करते हैं , वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो व्रतियों तथा यतियोंकी सेवामें संलग्न तथा परायी निन्दासे दूर रहते हैं , वे श्रेष्ठ भागवत हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक वचन बोलते हैं और सबके गुणोंको ही ग्रहण करनेवाले हैं , वे इस लोकमें भगवद्भक्त माने गये हैं। जो श्रेष्ठ मानव सब जीवोंको अपने ही समान देखते तथा शत्रु और मित्रमें भी समान भाव रखते हैं , वे उत्तम भगद्भक्त हैं। जो धर्मशास्त्रके वक्ता , सत्यवादी तथा साधुपुरुषोंके सेवक हैं , वे भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ कहे गये हैं। जो पुराणोंकी व्याख्या करते , जो पुराण सुनते और पुराण - वक्तामें श्रद्धाभक्ति रखते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। जो मनुष्य सदा गौओं तथा ब्राह्यणोंकी सेवा करते और तीर्थयात्रामें लगे रह्ते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य दूसरोंका अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते और भगवन्नामका जप करते रहते हैं , वे उत्तम भागवत हैं। जो बगीचे लगाते , तालाब और पोखरोंकी रक्षा करते तथा बावड़ी और कुएँ बनवाते हैं , वे उत्तम भक्त हैं। जो तालाब और देवमन्दिर बनवाते बनवाते तथा गायत्री - मन्त्रके जपमें संलग्न रहते हैं , वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो हरिनामका आदर करते , उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्षमें भर जाते और पुलकित हो उठते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य तुलसीका बगीचा देखकर उसको नमस्कार करते और कानोंमें तुलसी काष्ठ धारण करते हैं , वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो तुलसीकी गन्ध सूँघकर तथा उसकी जड़्के समीपकी मिट्टीको सूँघकर प्रसन्न होते हैं , वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो वर्णाश्रम - धर्मके पालनमें तत्पर , अतिथियोंका सत्कार करनेवाले तथा वेदार्थके वक्ता होते हैं , वे श्रेष्ठ भागवत माने गये हैं। जो भगवान् ‌‍ शिवसे प्रेम रखनेवाले , शिवके चिन्तनमें ही आसक्त रहनेवाले तथा शिवके चरणोंकी पूजामें तत्पर एवं त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले हैं , वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो भगवान् ‌‍ विष्णु तथा परमात्मा शिवके नाम लेते तथा रुद्राक्षकी मालासे विभूषित होते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा महादेवजी अथवा भगवान् ‌‍ विष्णुका उत्तम भक्तिसे यजन करते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो पढ़े हुए शास्त्रोंका दुसरोंके हितके लिये उपदेश करते और सर्वत्र गुण ही ग्रहण करते हैं , वे उत्तम भक्त माने गये हैं। परमेश्वर शिव तथा परमात्मा विष्णुमें जो समबुद्धिसे प्रवृत्त होते हैं , वे श्रेष्ठ भक्त माने गये हैं। जो शिवकी प्रसन्नताके लिये अग्निहोत्रमें तत्पर पञ्चाक्षर मन्त्रके जपमें संलग्न तथा शिवके ध्यानमें अनुरक्त रहते हैं , वे उत्तम भागवत हैं। जो जलदानमें तत्पर , अन्नदानमें संलग्न तथा एकादशीव्रतके पालनमें लगे रहनेवाले हैं , वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो गोदान करते , कन्यादानमें तत्पर रहते और मेरी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करते हैं , वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। विप्रवर मार्कण्डेय ! यहाँपर कुछ ही भगवद्भक्तोंका वर्णन किया है। मैं भी सौ करोड़ वर्षोंमें भी उन सबका पूरा - पूरा वर्णन नहीं कर सकता। अतः विप्रवर ! तुम भी सदा उत्तम शीलसे युक्त होकर रहो। समस्त प्राणियोंको आश्रय दो। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखो। सबके प्रति मैत्रीभाव रखते हुए धर्माचरणमें लगे रहो। पुनः महाप्रलय - कालतक सब धर्मोंका पालन करते हुए मेरे स्वरूपके ध्यानमें तत्पर रहकर तुम परम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
देवताओंके स्वामी दयासिन्धु भगवान् ‌‍ विष्णु अपने भक्त मार्कण्डेयको इस प्रकार वरदान देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। महाभाग मार्कण्डेयजी सदा भगवान् ‌‍ भजनमें लगे रहकर उत्तर धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्‌‍का पूजन किया। फिर महाक्षेत्र शालग्रामतीर्थमें उत्तम तपस्या की और भगवान्‌‍के ध्यानद्वारा कर्मबन्धनका नाश करके परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। इसलिये भववान्‌की आराधना करनेवाला भक्त पुरुष समस्त प्राणियोंका हितकारी होता है। वह मनसे जो - जो वस्तुएँ पाना चाहता है , वह सब निस्संदेह प्राप्त कर लेता है।
सनकजी कहते हैं -
विप्रवर नारद ! तुमने जो कुछ पूछा था , उसके अनुसार यह सब भगवद्भक्तिका माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

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