प्रथम पाद - तुलसी महिमा

तडाग और तुलसी आदिकी महि मा , भगवान् ‌‍ विष्णु और शिवके स्नान -पूजनका
महत्त्व एवं विविध दानों तथा देवमन्दिरमें सेवा करनेका माहात्म्य
धर्मराज कहते हैं -
राजन् ‌‍ ! कासार ( कच्चे पोखरे ) बनानेपर तडाग ( पक्के पोखरे ) बनानेकी अपेक्षा आधा फल बताया गया है। कुएँ बनानेपर एक चौथाई फल जानना चाहिये। बावड़ी बनानेपर कमलोंसे भरे हुए सरोवरके बराबर पुण्य प्राप्त होता है। भूपाल ! नहर निकालनेपर बावड़ीकी अपेक्षा सौगुना फल प्राप्त होता है। धनी पुरुष पत्थरसे मन्दिर या तालाब बनावे और दरिद्र पुरुष मिट्टीसे बनावे तो उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है। यह ब्रह्याजीका कथन है। धनी पुरुष एक नगर दान करे और गरीब एक हाथ भूमि दे ; इन दोनोंके दानका समान फल है। ऐसा वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं। जो धनी पुरुष उत्तम फलके साधनभूत तडागका निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है ; उन दोनोंका पुण्य समान कहा गया है। जो बहुत -से प्राणियोंका उपकार करनेवाला आश्रम या धर्मशाला बनवाता है , वह तीन पीढ़ियोंके साथ ब्रह्यलोकमें जाता है। राजन् ‌ ! धेनु अथवा ब्राह्यण या जो कोई भी आधे क्षण भी उस आश्रमकी छायामें स्थित होता है , वह उसके बनवानेवालेको स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। राजन् ‌‍ ! जो बगीचे लगाते , देवमन्दिर बनवाते , पोखरा खुदाते अथवा गाँव बसाते हैं , वे भगवान् ‌‍ विष्णुके साथ पूजित होते हैं। जो तुलसीके मूलभागकी मिट्टीसे , गोपीचन्दनसे , चित्रकूटकी मिट्टीस अथवा गंगाजीकी मृत्तिकासे ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाता है , उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो। वह श्रेष्ट विमानपर बैठकर गन्धर्वों और अप्सराओंके समूहद्वारा अपने चरित्रका गान सुनता हुआ भगवान् ‌‍ विष्णुके धाममें आनन्द भोगता है। जो तुलसीके पौधेपर चुल्लूभर भी पानी डालता है , वह क्षीरसागर -निवासी भगवान् ‌‍ विष्णुके साथ तबतक निवास करता है , जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं , तदनन्तर विष्णुमें लय हो जाता है। जो ब्राह्यणोंको कोमल तुलसीदल अर्पित करता है , वह तीन पीढ़ियोंके साथ ब्रह्यलोकमें जाता है। जो तुलसीके लिये काँटोंका आवरण या चहारदीवारी बनवाता है , वह भी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ भगवान् ‌‍ विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है। नरेश्वर ! चरणकमलोंकी पूजा करता है , वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है , उसका वहाँसे कभी पुनरागमन नहीं होता। पुष्प तथा चन्दनके जलसे भगवान् ‌‍ गोविन्दको भक्तिपूर्वक नहलाकर मनुष्य विष्णुधाममें जाता है। जो कपड़ेसे छाने हुए जलके द्वारा भगवान् ‌‍ लक्ष्मीपतिको स्नान कराता है , वह सब पापोंसे छूटकर भगवान् ‌‍ विष्णुके साथ सुखी होता है। जो सूर्यकी संक्रान्तिके दिन दूध आदिसे श्रीहरिको नहलाता है , वह इक्कीस पीढ़ियोंके साथ विष्णुलोक्में वास करता है। शुक्लपक्षमें चतुर्दशी , अष्टमी , पूर्णिमा , एकादशी , रविवार , द्वादशी , पञ्चमी तिथि , सूर्यग्रहण , चन्द्रग्रहण , मन्वादि तिथि , युगादितिथि , सूर्यके आधे उदयके समय , सूर्यके पुष्यनक्षत्रपर रहते समय . रोहिणी और बुधके योगमें , शनि और रोहिणी तथा मङ्रल और अश्विनीके योगमें , शनि -अश्विनी , बुध -अश्विनी , शुक्र -रेवती योग , बुध -अनुराधा , श्रवण -सूर्य , सोमवार -श्रवण , हस्त -बृहस्पति , बुध -अष्टमी तथा बुध और आषाढ़ाके योगमें और दूसरे -दूसरे पवित्र दिनोंमेंजो पुरुष शान्तचित्त , मौन और पवित्र होकर दूध , दही , घी और शहदसे श्रीविष्णुको स्नान कराता है , उसको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह सब पापोंसे छूटकर सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता और इक्कीस पीढ़ियोंके साथ वैकुण्ठधारममें निवास करता है। राजन् ‌‍ ! फिर वहीं ज्ञान प्राप्त करके वह पुनरावृत्तिरहित और योगियोंके लिये भी दुर्लभ हरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। भूपते ! जो कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथि और सोमवारके दिन भगवान् ‌‍ शङ्करको दूधसे नहलाता है , शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।अष्टमी अथवा सोमवारको भक्तिपूर्वक नारियलके जलसे भगवान् ‌‍ शिवको स्नान कराकर मनुष्य शिव -सायुज्यका अनुभव करता है। भूपते ! शुक्लपक्षकी चतुर्दशी अथवा अष्टमीको घृत और मधुके द्वारा भगवान् ‌‍ शिवको स्नान कराकर मनुष्य उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। तिलके तेलसे भगवान् ‌‍ विष्णु अथवा शिवको स्नान कराकर मनुष्य सात पीढ़ियोंके साथ उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जो शिवको भक्तिपूर्वक ईखके रससे स्नान कराता है , वह सात पीढ़ियोंके साथ एक कल्पतक भगवान् ‌‍ शिवके लोकमें निवास करता है। ( फिर शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। ) नरेश ! एकादशीके दिन सुगन्धित फूलोंसे भगवान् ‌‍ विष्णुकी पूजा करके मनुष्य दस हजार जन्मके पापोंसे छूट जाता और उनके परम धामको प्राप्त कर लेता है। महाराज ! चम्पाके फूलोंसे भगवान् ‌‍ विष्णुकी और आकके फूलोंसे भगवान् ‌‍ शङ्करकी पूजा करके मनुष्य उन -उनका सालोक्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् ‌‍ शङ्कर अथवा विष्णुको धूपमें घृतयुक्त गुग्गुल मिलाकर देता है , वह सब पापोंसे छूट जाता है। नृपश्रेष्ठ ! जो भगवान् ‌‍ विष्णु अथवा शङ्करको तिलके तेलसे युक्त दीपदान करता है , वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो भगवान् ‌‍ शिव अथवा विष्णुको घीका दीपक देता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो गंगा -स्नानका फल पाता है। जो -जो अभीष्ट वस्तुएँ हैं , वह सब ब्राह्यणको दान कर दे -ऐसा मनुष्य पुनर्जन्मसे रहित भगवान् ‌‍ विष्णुके धाममें जाता है। अन्न और जलके समान दूसरा कोई दान न हुआ है ; न होगा। अन्नदान करनेवाला प्राणदाता कहा गया है और जो प्राणदाता है , वह सब कुछ देनेवाला है। नृपश्रेष्ठ ! इसलिये अन्नदान करनेवालेको सम्पूर्ण दानोंका फल मिलता है। जलदान तत्काल संतुष्ट करनेवाला माना गया है। नृपषेष्ठ ! इसलिये ब्रह्यवादी मनुष्योंने जलदानको अन्नदानसे श्रेष्ठ बताया है। महापातक अथवा उपपातकोंसे युक्त मनुष्य भी यदि जलदान करनेवाला है तो वह उन सब पापोंसे मुक्त हो जाता है , यह ब्रह्याजीका कथन है। शरीरको अन्नसे उत्पन्न कहा गया है। प्राणोंको भी अन्नजनित ही मानते हैं ; अतः पृथ्वीपते ! जो अन्नदान देनेवाला है , उसे प्राणदाता समझना चाहिये ; क्योंकि जो -जो तृप्तिकारक दान है , वह समस्त मनोवाञ्छत फलोंको देनेवाला है ; अतः भूपाल ! इस पृथ्वीपर अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। जो दरिद्र अथवा रोगी मनुष्यकी रक्षा करता है , उसपर प्रसन्न होकर भगवान् ‌‍ विष्णु उसकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं। जो मन , वाणी और क्रियाद्वारा रोगीकी रक्षा करता है , वह सब पापोंस छूटकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। महीपाल ! जो ब्राह्यणको निवास -स्थान देता है , उसपर प्रसन्न हो देवेश्वर भगवान् ‌‍ विष्णु उसे अपना लोक देते हैं। जो ब्रह्यवेत्ता ब्राह्यलोकमें जाता है तथा जो वेदवेत्ता ब्राह्यणको कपिला गाय दान देता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रस्वरूप हो जाता है। जो भयसे व्याकुलचित्तवाले पुरुषोंको अभय दान देता है , राजन् ‌‍ ! उसके पुण्यफलका यथार्थ वर्णन करता हूँ ,सुनो ; एक ओर तो पूर्णरूपसे उत्तम दक्षिणा देकर सम्पन्न किये हुए सभी यज्ञ हैं और दूसरी ओर भयभीय मनुष्यकी प्राणरक्षा है ( ये दोनों समान हैं )। महीपाल ! जो भयविह्लल ब्राह्यणकी रक्षा करता है , वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुका और सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा ले चुका। वस्त्रदान करनेवाला रुद्रलोकमें और कन्यादाता ब्रहालोकमें जाता है।
भूपते ! कार्तिक अथवा आषाढ़की पूर्णिमाको जो मानव भगवान् ‌‍ शिवकी प्रसन्नताके लिये वृषोत्सर्ग कर्म करता है , उसका फल सुनो -वह सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो भौंसेको शिवलिंसे चिह्रित करके छोड़्ता है , उसे कभी यमयातना ( नरक ) नहीं प्राप्त होती है। नृपसत्तम ! जो शक्तिके अनुसार ताम्बूल दान करता है , उसपर प्रसन्न हो भगवान् ‌‍ विष्णु उसे आयु . यश तथा लक्ष्मी प्रदान करते हैं। दूध , दही , घी और मधुका दान करनेवाला मनुष्य दस हजार दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नृपोत्तम ! ईख दान करनेवाला मनुष्य ब्रह्यलोकमें जाता है। गन्ध एवं पवित्र फल देनेवाला पुरुष भी ब्रह्यधाममें जाता है। गुड़ और ईखका रस देनेवाला मनुष्य क्षीरसागरको प्राप्त होता है। विद्यादान करनेसे मनुष्यको भगवान् ‌‍ विष्णुका सायुज्य प्राप्त होता है। विद्यादान , भूमिदान और गोदान -ये उत्तम -से -उत्तम तीन दान क्रमशः जप , जोतने -बोनेकी सुविधा और दूध दुहनेके कारण नरकसे उद्धार करनेवाले होते हैं। नृपोत्तम ! सम्पूर्ण भगवान् ‌‍ विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। ईंधन दान करनेसे मनुष्यको उपपातकोंसे छुटकारा मिलता है। शालग्राम शिलाका दान महादान बताया गया है। उसका दान करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। शिवलिं -दान भी ऐसा ही माना गया है। प्रभो ! जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंको घर दान देता है , राजन् ‌‍ ! उसे गंगास्नानका फल अवश्य प्राप्त होता है।
नृपश्रेष्ठ ! जो रत्नयुक्त सुवर्णका दान करता है , वह भोग और मोक्ष -दोनों प्राप्त कर लेता है ; क्योंकि स्वर्णदान महादान माना गया है। माणिक्यदान करनेसे मनुष्य परममोक्षको प्राप्त होता है। वज्रमणिके दानसे मानव ध्रुवलोकमें जाता है। मूँगा दान करनेसे स्वर्ग एवं रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। सवारी देने और मुक्तादान करनेसे दाता चन्द्रलोक प्राप्त करता है। वैदूर्य और पद्मरागमणि देनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें जाता है। पद्मरागमणिके दानसे सर्वत्र सुखकी प्राप्ति होती है। राजन् ‌‍ ! घोड़ा दान करनेवाला दीर्घकालके लिये अश्विनीकुमारोंके समीप जाता है। हाथी -दान महादान है। उससे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। सवारी दान करनेसे मनुष्य स्वर्गीय विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें जाता है। भैंस देनेवाला निस्संदेह अपमृत्युको जीत लेता है। गौओंको घास देनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। महीपते ! नमक देनेवाला पुरुष वरुणलोकमें जाता है।
जो अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें संलग्न , सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर तथा दम्भ और असूयासे रहित हैं , वे ब्रह्यलोकमें जाते हैं। जो वीतराग और ईर्ष्यारहित हो दूसरोंको परमार्थका उपदेश देते और स्वयं भी भगवान्‌के चरणोंकी आराधनामें लगे रह्ते हैं , वे वैकुण्ठधाममें जाते हैं। जो सत्सङ्रमें आनन्दका अनुभव करते , सत्कर्म करनेके लिये सदा उद्यत रह्ते और दूसरोंके अपवादसे मुँह मोड़ लेते हैं , वे विष्णुधाममें जाते हैं। जो सदा ब्राह्यणों और गौओंका हित साधन करते और परायी स्त्रियोंके सङ्रसे विमुख होते हैं , वे यमलोकका जीत लिया है , जो गायोंके प्रति क्षमाभाव रखनेवाले और सुशील हैं तथा जो ब्राह्यणोंपर भी क्षमाभाव रखते हैं , वे वैकुण्ठधाममें जाते हैं। जो अग्रिका सेवन करनेवाले गुरुसेवक पुरुष हैं तथा जो पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली स्त्रियाँ हैं , वे कभी जन्म -मरणरूप संसार -बन्धनमें नहीं पड़तीं। जो सदा देव -पूजामें तत्पर , हरिनामकी शरण लेनेवाले तथा प्रतिग्रहसे दूर रहते हैं , वे परम पदको प्राप्त होते हैं। नृपश्रेष्ठ ! जो ब्राह्यणके अनाथ शवका दाह करते हैं , वे सहस्त्र अश्वमेध यज्ञोंका फल भोगते हैं। मनुजेश्वर ! जो पूजारहित शिवलिंका पत्र , पुष्प , फल अथवा जलसे पूजन करता है , उसका फल सुनो -वह विमानपर बैठकर भगवान् ‌‍ शिवके समीप जाता है। जनेश्वर ! जो भक्ष्य -भोज्य और फलोंद्वारा निर्जन स्थानमें स्थित शिवलिंका पूजन करता है , वह पुनरावृत्तिरहित शिव -सायुज्यको प्राप्त करता है। सूर्यवंशी भगीरथ ! जो पूजारहित विष्णु -प्रतिमाका जलसे भी पूजन करता है , उसे विष्णुका सालोक्य प्राप्त होता है। राजन् ‌‍ ! जों देवालयमें गोचर्मके बराबर भू -भागको भी जलसे सींचता है , वह स्वर्गलोक पाता है। जो देवमन्दिरकी भूमिको चन्दनमिश्रत जलसे सींचता है , वह जितने कणोंको भिगोता है , उतने कल्पतक उस देवताके समीप निवास करता है। जो मनुष्य पत्थरके चूनेसे देवमन्दिरको लीपता है या उसमें स्वस्तिक आदिके चिहृ बनाता है , उसको अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। जो भगवान् ‌‍ विष्णु या शङ्करके समीप अखण्ड दीपकी व्यवस्था करता है , उसको एक -एक क्षणमें अश्वमेध यज्ञका फल सुलभ होता है। भूमिपाल ! जो देवीके मन्दिरकी एक बार , सूर्यके मन्दिरकी सात बार , गणेशके मन्दिरकी तीन बार और विष्णु -मन्दिरकी चार बार परिक्रमा करता है , वह उन -उनके धाममें जाकर लाखों युगोंतक सुख भोगता है। जो भक्तिभावसे भगवान् ‌‍ विष्णु , गौ तथा ब्राह्यणकी प्रदक्षिणा करता है , उसे पग -पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो काशीमें भगवान् ‌‍ शिवके लिंगका पूजन करके प्रणाम करता है , उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता , उसका फिर संसारमें जन्म नहीं होता। जो विधिपूर्वक भगवान् ‌‍ शङ्करकी दक्षिण और वाम परिक्रमा करता है , वह मनुष्य उनकी कृपासे स्वर्गसे नीचे नहीं आता। जो रोग -शोकसे रहित भगवान् ‌‍ नारायणकी स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करता है , वह मनसे जो -जो चाहता है , उन सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भूपाल ! जो भक्तिभावसे युक्त हो देवमन्दिरमें नृत्य अथवा गान करता है , वह रुद्रलोकमें जाकर मोक्षका भागी होता है। जो मनुष्य देवमन्दिरमें बाजा बजाते हैं , वे हंसयुक्त विमानपर आरूढ़ हो ब्रह्याजीके धाममें जाते हैं। जो लोग देवालयमें करताल बजते हैं , वे सब पापोंसे मुक्त हो द्स हजार युगोंतक विमानचारी होते हैं। जो लोग भेरी , मृदङ्र , पटह , मुरज और डिंडिम आदि बाजोंद्वारा देवेश्वर भगवान् ‌‍ शिवको प्रसन्न करते हैं , उन्हें प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो। वे सम्पूर्ण कामनाओंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें जाकर पाँच कल्पोंतक सुख भोगते हैं। राजन् ‌‍ ! जो मनुष्य देवमन्दिरमें शड्‌‍खध्वनि करता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् ‌‍ विष्णुके साथ सुख भोगता है। जो भगवान् ‌‍ विष्णुके मन्दिरमें ताल और झाँझ आदिका शब्द करता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् ‌‍ विष्णुके लोकमें जाता है। जो सबके साक्षी , निरञ्जन एवं ज्ञानस्वरूप भगवान् ‌ विष्णु हैं , वे संतुष्ट होनेपर सब धर्मोंका यथायोग्य सम्पूर्ण फल देते हैं। भूपते ! जिन देवाधिदेव सुदर्शनचक्रधारी श्रीहरिके स्मरण मात्रसे सम्पूर्ण कर्म सफल होते हैं , वे जगदीश्वर परमात्मा ही समस्त कर्मोंके फल हैं। पुण्यकर्म करनेवाले पुरुषोंद्वारा सदा स्मरण किये जानेपर वे भगवान् ‌‍ उनकी सब पीड़ाओंका नाश करते हैं। भगवान् ‌‍ विष्णुके उद्देश्यसे जो कुछ किया जाता है , वह अक्षय मोक्षका कारण होता है। भगवान् ‌‍ विष्णु ही हैं। इसी प्रकार कर्म , कर्मोंके फल और उनके भोक्ता भी भगवान् ‌‍ विष्णु ही हैं। कार्य भी विष्णु हैं , करण भी विष्णु हैं। उनसे भिन्न कोई भी वस्तु नहीं है।

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