प्रथम पाद - द्वादशीव्रतका वर्णन

मार्गशीर्ष माससे लेकर कार्तिक मासपर्यन्त उद्यापनसहित शुक्लपक्षके
द्वादशीव्रतका वर्णन
ऋषि बोले -
महाभारा सूतजी ! आपको साधुवाद है। आपका हृदय अत्यन्त दयालु है। आपने कृपा करके सब पापोंका नाश करनेवाला उत्तम गंगा माहात्म्य हमें सुनाया है। यह गंगा -माहात्म्य सुनकर देवर्षि नारदजीने मुनिश्रेष्ठ सनकजीसे कौन -सा प्रश्न किया ? यह बताइये
सूतजीने कहा -
आप सब ऋषि सुनें। देवर्षि नारदने फिर जिस प्रकार प्रश्न किया था , वह बतलाऊँगा।
नारदजी बोले -
मुने ! आप भगवान् ‌‍ विष्णुके उन व्रतोंका वर्णन कीजिये , जिनका अनुष्ठान करनेसे भगवान् ‌‍ प्रसन्न होते हैं। जो भगवत् ‌‍-सम्बन्धी व्रत , पूजन और ध्यानमें तत्पर हो भगवान‌‍का भजन करते हैं , उनको भगवान् ‌‍ विष्णु मुक्ति तो अनायास ही दे देते हैं , पर वे जल्दी किसीको भक्तियोग नहीं देते। मुनिश्रेष्ठ ! आप भगवान् ‌‍ विष्णुके भक्त हैं। प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग -सम्बन्धी जो कर्म भगवान् ‌‍ श्रीहरिको प्रसन्न करनेवाला हो , उसका मुझसे वर्णन कीजिये।
श्रीसनकजीने कहा -
मुनिश्रेष्ठ ! बहुत अच्छा , बहुत अच्छा। तुम भगवान् ‌‍ पुरुषोत्तमके भक्त हो , इसीलिये बार -बार उन शार्ङ्रधन्वा -श्रीहरिका चरित्र पूछ्ते हो। मैं तुम्हें उन लोकोपकारी व्रतोंका उपदेश करता हूँ , जिनसे भगवान् ‌‍ श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और साधकको अभय -दान देते हैं। जिस पुरुषपर यज्ञस्वरूप भगवान्‌‍ जनार्दनकी प्रसन्नता हो जाती है , उसे इहलोक और परलोकमें सुख मिलता है तथा उसके तपकी बृद्धि होती है। महर्षिगण कहते हैं कि जिस किसी उपायद्वारा भी जो लोग भगवान् ‌‍ विष्णुकी आराधनामें लगे रह्ते हैं , वे परम पदको प्राप्त होते हैं ,। मार्गशीर्ष मासमें शुक्लपक्षकी द्वादशीको उपवास करके मनुष्य श्रद्धापूर्वक जलशायी भगवान् ‌‍ नारायणकी पूजा करे। मुनिश्रेष्ठ ! पहले दन्तधानवन करके स्नान करे , फिर श्वेतवस्त्र धारण करके मौन हो गन्ध , पुष्प , अक्षत , धूप . दीप और नैवेद्य आदि उपचारोंद्वारा भक्ति -भावसे श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। ‘ केशवाय नमस्तुभ्यम् ‌‍ ‘ ( केशव ! आपको नमस्कार है। ) -इस मन्त्रद्वारा श्रीविष्णुकी पूजा करनी चाहिये। उसी मन्त्रसे प्रज्वलित अग्निमें घृतमिश्रित तिलकी एक सौ आठ आहुति देकर भगवान् ‌ शालग्रामके समीप रातमें जागरण करे। उस रात्रिमें ही सेरभर दूधसे रोग -शोकरहित भगवान्‌‍ श्रीनारायनको स्नान करावे और गीत -वाद्य , नैवेद्य , भक्ष्य तथा भोज्यपदार्थोंद्वारा महालक्ष्मीसहित उन भगवान् ‌‍ नारायणका भक्तिपूर्वक तीन समय पूजन करे। फिर सबेरे उठकर यथावश्यक शौच -स्नानादि कर्म करके पूर्ववत् ‌‍ मन -इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मौनभावसे पवित्रतापूर्वक भगवान्‌की पूजा करे। उसके बाद निम्राङ्कित मन्त्रसे दक्षिणासहित घृतमिश्रित खीरऔर नारियलका फल भक्तिपूर्वक ब्राह्यणको अर्पित करे -
केशवः केशिहा देवः सर्वसम्पत्प्रदायक : ॥
परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायक :।
( ना० पूर्व० १७।२१ - २२ )
‘ जिन्होंने केशी दैत्यको मारा है तथा जो सब प्रकारकी सम्पत्ति देनेवाले हैं , वे भगवान् ‌‍ केशव यह उत्तम अन्न दान करनेसे मेरे लिये अभीष्ट वस्तुको देनेवाले हों। ‘
तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्यणभोजन करावे। उसके बाद भगवान् ‌‍ नारायणका चिन्तन करते हुए मौन होकर स्वयं भी भाई -बन्धुओंसहित भोजन करे। इस प्रकार जो भक्ति -भावसे भगवान् ‌‍ केशवकी उत्तम पूजा करता है , वह आठ पौण्डरीक यज्ञ्के समान फल पाता है। पौष मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके ‘ नमो नारायणाय ‘ इस मन्त्रसे पवित्रतापूर्वक श्रीहरिका पूजन करे। दूधसे भगवान्‌को नहलाकर खीरका नैवेद्य अर्पण करे। रातमें तीनों समय श्रीहरिकी पूजामें संलग्न रहकर जागता रहे। गन्ध , मनोरम पुष्प , धूप , दीप , नैवेद्य . नृत्य , गीत -वाद्य आदि तथा स्तोत्रोंद्वारा श्रीहरिकी अर्चना करे। सबेरेकी पूजाके पश्चात् ‌‍ घृत और दक्षिणासहित खिचड़ी ब्राह्यणको दे। ( उस समय निम्राङ्रित मन्त्र पढ़ना चाहिये - )
सर्वात्मा सर्वलोकेश : सर्वव्यापी सनातनः।
नारायणः प्रसन्नः स्यात् ‌‍ कृशरात्रप्रदानतः ॥
( ना० पूर्व० १७।२८ )
‘ जो सबके आत्मा , सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर तथा सर्वत्र व्यापक हैं , वे सनातन भगवान् ‌‍ श्रीनारायण यह खिचड़ी दान करनेसे मुझपर प्रसन्न हों। ‘
इस मन्त्रसे ब्राह्यणको उत्तम दान देकर यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन करावे। फिर स्वयं बन्धु -बान्धवोंसहित भोजन करे। जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक भगवान् ‌‍ नारायणदेवका पूजन करता है ,वह आठ अग्निष्टोम यज्ञोंका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। माघ शुक्ला द्वादशीको भी पूर्ववत् ‌‍ उपवास करके
‘ नमस्ते माधवाय ‘
इस मन्त्रसे अग्निमें आठ बार घीकी आहुति दे। उस दिन पूर्ववत् ‌‍ सेरभर दूधसे भगवान् ‌‍ माधवको स्नान करावे। फिर चित्तको एकाग्र करके गन्ध , पुष्प और अक्षत आदिसे पहलेकी तरह तीनों समय भक्तिपूर्वक पूजन करते हुए रातमें जागरण करे। तत्पश्चात् ‌‍ प्रातःकालका कृत्य समाप्त करके पुनः श्रीमाधवकी अर्चना करे। अन्तमें सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये वस्त्र और दक्षिणासहित सेरभर तिल ब्राह्यणको इस मंत्र्से दान करे -
माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः।
तिलदानेन महता सर्वान् ‌‍ कामान् ‌‍ प्रयच्छतु ॥
( ना० पूर्व० १७।३५ )
‘ सम्पूर्ण कर्मोंका फल देनेवाले तथा समस्त भूतोंके आत्मा भगवान् ‌‍ लक्ष्मीपति तिलके इस महादानसे प्रसन्न होकर मेरी सब कामनाएँ पूरी करें। ‘
इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक ब्राह्यणको तिल दान देकर भगवान् ‌‍ माधवका स्मरण करते हुए यथाशक्ति ब्राह्यणोंकी भोजन कराये। मुने ! जो इस प्रकार भक्ति -भावसे तिलदानयुक्त व्रत करता है , वह सौ वाजपेय यज्ञके सम्पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है। फाल्गुनके शुक्लपक्षमें द्वादशीको उपवास करके व्रती पुरुष ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम् ‌‍ ‘ इस मन्त्रसे भगवान्‌का पूजन करे और घृतमिश्रित तिलकी एक सौ आठ आहुति देकर पूर्वोक्त मानके अनुसार एक सेर दूधसे पवित्रतापूर्वक भगवान्‌‍स गोविन्दको स्नान करावे। पूर्ववत् ‌‍ रातमें जागरण और तीनों समय पूजा करे। फिर प्रातःकालका शौच , स्नान आदि कर्म पूरा करके पुनः भगवान् ‌‍ गोविन्दकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् ‌‍ वस्त्र और दक्षिणासहित एक आढक ( चार सेर ) धान ब्राह्यणको दे और निम्राङ्कित मन्त्रका पाठ करे -
नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥
अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्‌‍गुरो।
( ना० पूर्व० १७।४१ - ४२ )
‘ गोविन्द ! सर्वेश्वर ! गोपाङ्रनाओंके प्राणवल्लभ ! जगदुगुरो ! इस धान्यके दानसे आप मुझपर प्रसन्न हों। ‘
इस प्रकार भलीभाँति व्रतका पालन करके मनुष्य सम्यूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और महान् ‌‍ यज्ञका पूरा पुण्य प्राप्त कर लेता है। चैत्र मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके पहले बताये अनुसार ‘ नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यम् ‌ ‘- इस मन्त्रसे भगनान्‌की पूजा करे। पूर्ववत् ‌‍ एक सेर दूधसे भगवान् ‌‍ विष्णुको स्नान करावे। विप्रवर ! यदि शक्ति हो तो उसी प्रकार सेरभर घीसे भी आदरपूर्वक भगवान्‌‍को नहलावे तथा रातमें भी पहलेकी तरह जागरण और पूजन करे। तदनन्तर सबेरे उठकर प्रातः - कालके आवश्यक कर्म पूरा करके मधु , घी और तिलमिश्रित हवन -सामग्रीकी एक सौ आठ आहुति दे। उसके बाद बाह्यणको दक्षिणासहित एक आढक ( चार सेर ) चावल दान करे। ( मन्त्र इस प्रकार है - )
प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः ॥
तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः।
( १७।४७ - ४८ )
‘ भगवान् ‌‍ महाविष्णु प्राणस्वरूप हैं। वे ही सबके प्रियतम और प्राणदाता है। इस एक आढक चावलके दानसे वे भगवान् ‌‍ जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों। ‘
इस प्रकार भक्तिभावसे व्रतका पालन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अत्यग्निष्टोम यज्ञके आठगुने फलको पाता है। वैशाख शुक्ला द्वादशीको उपवास करके भक्तिपूर्वक देवेश्वर मधुसूदनको द्रोण ( कलश ) परिमित दूधसे स्नान करावे तथा रातमें तीन समय पूजन करते हुए जागरण करे। मधुसूदनकी विधिपूर्वक पूजा करके ‘नमस्ते मधुहन्त्रे ‘- इस मन्त्रसे घीकी एक सौ आठ आहुतिका होम करे। घीका उपयोग अपनी शक्तिके अनुसार करे। इससे पापहित होकर मनुष्य आठ अश्चमेध यज्ञोंका फल पाता है। ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके एक आढक ( चार सेर ) दूधसे भगवान् ‌‍ त्रिविक्रमको स्नान करावे और ‘नमस्त्रिविक्रमाय ‘ इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवान्‌का पूजन करे। खीरकी एक सौ आठ आहुति देकर होम करे। फिर रातमें जागरण करके भगवान्‌की पूजा करे। फिर प्रातःकृत्य करके पूजनके पश्चात् ‌‍ ब्राह्यणको दक्षिणासहित बीस पूआ दान करे। ( दानका मन्त्र इस प्रकार है -)
देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वर ॥
उपायनं च संगृह्य ममाभीष्टप्रदो भव।
( ना० पूर्व० १७।५५ - ५६ )
‘ देवदेव ! जगन्नाथ ! परमेश्वर ! आप मुझपर प्रसन्न होइये और यह भेंट ग्रहण करके मेरे अभीष्टकी सिद्धि कीजिये। ‘
तत्पश्चात् ‌‍ यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन करावे और उसके बाद स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ब्रह्यन् ‌‍! जो इस प्रकार भगवान् ‌‍ त्रिविक्रमका व्रत करता है , वह निष्पाप हो आठ यज्ञोंका फल पाता है।
आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको उपवास -व्रत करनेवाला जितेन्द्रिय पुरुष पूर्ववत् ‌‍ एक आढक ( चार सेर ) दूधसे वामनजीको स्नान करावे। ‘ नमस्ते वामनाय ‘- इस मन्त्रसे दूर्वा और घीकी एक सौ आठ आहुति देकर रातमें जागरण और वामनजीला पूजन करे। दक्षिणासहित दही , अन्न और नारियलका फल वामनजीकी पूजा करनेवाले ब्राह्यणको भक्तिपूर्वक अर्पण करे। ( मन्त्र इस प्रकार है - )
वामनो बुद्धिदो होता द्र्व्यस्थो वामनः सदा।
वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः ॥
( ना० पूर्व० १७।६१ )
‘ वामन बुद्धिदाता हैं। वे ही होता हैं और द्रव्यमें भी सदा वामनजी स्थित रहते हैं। वामन ही इस संसार - सागरसे तारनेवाले हैं। वामनजीको बार - बार नमस्कार है। ‘
इस मन्त्रसे दही -अन्नका दान करके यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन करावे। ऐसा करके मनुष्य सौ अग्निष्टोम यज्ञोंका फल पा लेता है।
श्रावण मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करनेवाला व्रती मधुमिश्रित दूधसे भगवान् ‌‍ श्रीधरको स्नान करावे और ‘ नमोऽस्तु श्रीधराय ‘-
इस मन्त्रसे गन्ध , पुष्प , धूप , दीप आदि सामग्नियोंद्वारा क्रमशः पूजन करे। मुने ! तत्पश्चात् ‌‍ दही मिले हुए घीसे एक सौ आठ आहुति दे। फिर रातमें जागरण करके पूजाकी व्यवस्था करे और ब्राह्यणको परम उत्तम एक आढक ( चार सेर ) दूध दान करे। विप्रवर ! साथ ही सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये वस्त्र और दक्षिणासहित सोनेके दो कुण्डल भी निम्राङ्कित मन्त्रसे अर्पण करे।
क्षीराब्धिशायिन् ‌‍ देवेश रमाकान्त जगत्पते।
क्षीरदानेने सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥
( ना० पूर्व० १७।६७ )
‘ क्षीरसागरमें शयन करनेवाले देवश्वर ! लक्ष्मीकान्त ! जगत्पते ! इस दुग्धदानसे आप अत्यन्त प्रसन्न हो सम्पूर्ण सुखोंके दाता होइये। ‘
ब्राह्यणभोजन सुख देनेवाला है , इसलिये व्रती पुरुष यथाशक्ति भोजन करावे। ऐसा करनेसे एक हजार अश्चमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके एक द्रोण ( कलश ) दूधसे जगद्‌‍गुरु भगवान् ‌‍ हृषीकेशको स्नान करावे।
‘ हृषीकेश नमस्तुभ्यम् ‌‍ ‘ इस मन्त्रसे मनुष्य भगवान्‌‍का पूजन करे। फिर पूर्ववत् ‌‍ जागरण आदि कार्य सम्पन्न करके आत्मज्ञानी ब्राह्यणको डेढ़ आढक ( छः सेर ) गेहूँ और यथाशक्ति सुवर्णकी दक्षिणा दे। ( मन्त्र इस प्रकार है - )
हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे।
मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥
( ना० पूर्व० १७।७२ )
‘ इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् ‌‍ हृषीकेश ! आप सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र कारण हैं। आपको नमस्कार है। इस गोधूम - दानसे प्रसन्न हो आप मुझे सब प्रकारके सुख दीजिये। ‘ तत्पश्चात् ‌‍ यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो महान् ‌‍ यज्ञका फल पाता है।
आश्चिन मासकी शुक्ला द्वादशीको उपवास करके पवित्र हो भक्तिपूर्वक भगवान् ‌‍ पद्मनाभको दूधसे स्नान करावे। फिर ‘ नमस्ते पद्मनाभाय ‘- इस मन्त्रसे यथाशक्ति तिल , चावल , जौ और घृतद्वारा होम एवं विधिपूर्वक पूजन करे। रातमें जागरनका कार्य सम्पन्न करके पुनः पूजन करे और ब्राह्यणको दक्षिणासहित एक पाव मधु दान करे। ( मन्त्र इस प्रकार है - )
पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह।
मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः ॥
( ना० पूर्व० १७।७७ )
‘ सम्पूर्ण लोकोंके पितामह पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है। इस मधुदानसे अत्यन्त प्रसन्न हो आप हमें सम्पूर्ण सुख प्रदान करें। ‘
जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष इस प्रकार भक्तिभावसे पद्मनाभ -व्रतका पालन करता है , उसे निश्चय ही एक हजार महान् ‌‍ यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। कार्तिक शुक्ला द्वादशीको उपवास करके जितेन्द्रिय पुरुष एक आढक ( चार सेर ) दूध , दही अथवा उतने ही घीसे भक्तिपूर्वक भगवान् ‌‍ दामोदरको स्नान करावे। स्नान करानेका मन्त्र है -‘ ॐ नमो दामोदराय। ‘ उसीसे मधु और घी मिलाये हुए तिलकी एक सौ आठ आहुति दे। फिर संयम -नियमपूर्वक तीनों समय श्रीहरिकी पूजामें तत्पर हो रातमें जागर्ण करे और प्रातःकाल आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो मनोरम कमलके फूलोंद्वारा भगवान्‌‍की पूजा करे। उसके बाद घृतमिश्रित तिलोंके द्वारा पुनः एक सौ आठ आहुति दे औ पाँच प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे युक्त अन्न ब्राह्यणको भक्तिपूर्वक दे। ( मन्त्र इस प्रकार है - )
दामोदर जगन्नाथ सर्वकारणकारण।
त्राहि मां कृपया देव शरणागतपालक ॥
( ना० पूर्व० १७।८३ )
‘ दामोदर ! जगन्नाथ ! आप समस्त कारणोंके भी कारण हैं। शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले देव ! कृपया मेरी रक्षा कीजिये। ‘
इस प्रकार कुटुम्बयुक्त श्रोत्रिय ब्राह्यणको दान और यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्राह्यणोंको भी भोजन करावे। इस प्रकार व्रतका विधिपूर्वक पालन करके अपने बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। इससे वह दो हजार अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है।
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार व्रतका पालन करनेवाला जो पुरुष परम उत्तम द्वादशी -व्रतका एक वर्षतक पूर्वोक्त विधिसे अनुष्ठान करता है , वह परम पदको प्राप्त होता है। जो एक मास या दो मासमें भक्तिपूर्वक उक्त व्रतका पालन करता है , वह उस -उस महीनेके बताये हुए फलको पाता है और हरिके परम पदको प्राप्त हो जाता है। मुनीश्वर ! व्रती पुरुषको चाहिये कि वह एक वर्ष पूरा करके मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथिको व्रतका उद्यापन करे। प्रातःकाल शौचादिसे निवृत्त हो दन्तधावन और स्नान करके नित्य कृत्य करे। फिर श्वेत वस्त्र तथा श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। श्वेत चन्दनका अनुलेपन करे। घरके आँगनमें एक दिव्य चौकोर एवं परम सुन्दर मण्डप बनावे। उसमें घण्टा और चँवर यथास्थान लगा दे। छोटी -छोटी घण्टियोंकी ध्वनिसे उस मण्डपको सुशोभित करे। फूलोंकी मालाओंसे उसको सजावे। ऊपरसे चँदोवा लगा दे और ध्वजा -पताकासे भी उस मण्डपको विभूषित करे। वह मण्डप श्वेत वस्त्रसे आच्छादित तथा दीपमालाओंसे आच्छादित होना चाहिये। उसके मध्यभागमें सर्वतोभद्रमण्डल बनाकर उसे विविध रंगोंसे भलीभाँति अलंकृत करे। सर्वतोभद्रके ऊपर जलसे भरे हुए बारह घड़े रखे। भलीभाँति शुद्ध किये हुए एक ही श्वेत वस्त्रसे उन सभी कलशोंको ढँक दे। वे सब कलश पञ्चरत्न्से युक्त होने चाहिये। ब्रह्यन् ‌‍! व्रती पुरूष अपनी शक्तिके अनुसार सोने . चाँदी अथवा ताँबेकी भगवान् ‌‍ लक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा बनावे और उसे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए कलशके ऊपर स्थापित करे। द्विजश्रेष्ठ ! जो प्रतिमा न बना सके , वह अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण अथवा उसका मूल्य वहाँ चढ़ा दे। बुद्धिमान् ‌‍ पुरुष सभी व्रतोंमें उदार रहे। धनकी कंजूसी न करे। यदि वह कृपणता करता है तो उसकी आयु और धन -सम्पत्तिका क्षय होता है। पहले शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले रोग -शोकसे रहित भगवान् ‌‍ लक्ष्मीनारायणका ध्यान करके उन्हें भक्तिपूर्वक पञ्चामृतसे स्नान करावे। फिर केशव आदि नामोंसे उनके लिये भिन्न -भिन्न उपचार चढ़ावे। रातमें पुराण -कथा -श्रवण आदिके द्वारा जागरण करे। निद्राको जीते और उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय -भावसे रहकर अपने वैभवके अनुसार रातके प्रथम , द्वितीय और तृतीय प्रहरके अन्तमें तीन बार भगवान्‌‍की पूजा करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर सबेरेके शौच -स्नान आदि आवश्यक कृत्य पूरे करके ब्राह्यणोंद्वारा व्याहृतिमन्त्रसे तिलकी एक हजार आहुतियाँ दिलावे। उसके बाद क्रमशः गन्ध , पुष्प आदि उपचारोंसे पुनः भगवान्‌‍की पूजा करे तथा भगवान्‌के समक्ष पुराणकी कथा भी सुने। फिर बारह ब्राह्यणोंमेंसे प्रत्येकको दस -दस पूजा , घृत , दधिसहित अन्न तथा खीर दान करे। उसके साथ दक्षिणा भी दे। ( दानका मन्त्र इस प्रकार है - )
देवदेव जगन्नाय भक्तानुग्रहविग्रह।
गृहाणोपायनं कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव ॥
( ना० पूर्व० १७।१०३ )
‘ भक्तोंपर कृपा करके अवतार - शरीर धारण करनेवाले देवेदव ! जगदीश्वर ! श्रीकृष्ण ! आप यह भेंट ग्रहण कीजिये और मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ दीजिये। ‘ इस मन्त्रसे भगवान्‌‍को भेंट अर्पण करके दोनों घुटने पृथ्वीपर टेककर व्रती पुरुष विनयसे नतमस्तक हो हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे -
नमो नमस्ते सुरराजराज नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास।
कुरुष्व सम्पूर्णफलं ममाद्य नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोत्तमाय ॥
( ना० पूर्व० १७।१०५ )
‘ देवताओंके राजाधिराज ! आपको नमस्कार है , नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌‍के निवासस्थान नारायणदेव ! आपको नमस्कार है। आज मेरे इस व्रतको पूर्णतः सफल बनाइये। आप पुरुषोत्तमको नमस्कार है। ‘ इस प्रकार ब्राह्यणों तथा भगवान् ‌‍ पुरुषोत्तमसे प्रार्थना करे। तत्पश्चात् ‌‍ महालक्ष्मीसहित भगवान् ‌‍ विष्णुको निम्राङ्कित मन्त्रसे अर्घ्य दे।
लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं क्षीरार्णवनिवासिने।
अर्घ्यं गृहाण देवेश लक्ष्म्या च सहितः प्रभो ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ‌‍ ॥
( ना० पूर्व० १७।१०७ - १०८ )
‘ लक्ष्मीपते ! क्षीरसागरमें निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। देवेश्वर ! प्रभो ! आप लक्ष्मीजीके साथ यह अर्घ्य स्वीकार करें। जिनके स्मरण तथा नामोच्चारण करनेसे तप तथा यज्ञकर्म आदिमें जो त्रुटि रह गयी हो , उसकी पूर्ति हो जाती है , उन भगवान् ‌‍ अच्युतकी मैं शीघ्र मस्तक झुकाता हूँ। ‘
इस प्रकार देवेश्वर भगवान् ‌‍ विष्णुसे वह सब कुछ निवेदन करके संयमशील व्रती पुरुष दक्षिणासहित प्रतिमा आचार्यको समर्पित करे। उसके बाद ब्राह्यणोंको भोजन करावे और यथाशक्ति दक्षिणा दे। फिर स्वयं भी बन्धुजनोंके साथ मौन होकर भोजन करे। फिर सायंकालतक विद्वानोंके साथ बैठकर भगवान् ‌‍ विष्णुकी कथा सुने। नारदजी ! जो मनुष्य इस प्रकार द्वादशी -व्रत करता है , वह इहलोक और परलोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा सब पापोंसे मुक्त हो अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ भगवान् ‌‍ विष्णुके धाममें जाता है , जहाँ जाकर कोई शोकका सामना नहीं करता। ब्रह्यन् ‌‍! जो इस उत्तम द्वादशी -व्रतको पढ़ता अथवा सुनता है , वह मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है।

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