प्रथम पाद - ध्वजारोपणकी विधि

श्रीविष्णुमन्दिरमें ध्वजारोपणकी विधि और महिमा
श्रीसनकजी कहते हैं -
नारदजी ! अब मैं ध्वजारोपण नामक दूसरे व्रतका वर्णन करूँगा , जो सब पापोंको हर लेनेवाला , पुण्यस्वरूप तथा भगवान् ‌‍ विष्णुकी प्रसन्नताका कारण है। जो भगवान् ‌‍ विष्णुके मन्दिरमें ध्वजारोपणका उत्तम कार्य करता है , वह ब्रह्या आदि देवताओंद्वारा पूजित होता है। बहुत - सी दूसरी बातें कहनेसे क्या लाभ ! जो कुटुम्बयुक्त ब्राह्यणको सुवर्णका एक हजार भार दान देता है , उसके उस दानका फल ध्वजारोपण - कर्मके बराबर ही होता है। परम उत्तम गङ्रा - स्नानन , तुलसीकी सेवा अथवा शिवलिङ्रका पूजन - ये सब कर्म ही ध्वजारोपणकी समानता कर सकते हैं। ब्रह्यन् ‌‍ ! यह ध्वजारोपण नामक कर्म अद्भुत है , अपूर्व है और आश्चर्यजनक है। यह सब पापोंको दूर करनेवाला है। ध्वजारोपण कार्यमें जो - जो कार्य आवश्यक हैं , उन सबको बतलाता हूँ , आप मेरे मुखसे सुनें।
कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको मनुष्य अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए , प्रयत्नपूर्वक दातुन करके स्नानन करे। व्रत करनेवाला ब्राह्यण उस दिन एक समय भोजन करे , ब्रह्यचर्यसे रहे और धुले हुए शुद्ध वस्त्र धारण करके शुद्धतापूर्वक भगवान् ‌‍ नारायणके सामने उन्हींका स्मरण करते हुए रातमें शयन करे। तत्पश्चात् ‌‍ प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके नित्यकर्म पूर्ण करनेके अनन्तर भगवान् ‌‍ विष्णुकी पूजा करे। चार ब्राह्यणोंके साथ स्वस्तिवाचन करके ध्वजारोपणके निमित्त नान्दीमुख - श्राद्ध करे। वस्त्रसहित ध्वज और स्तम्भका गायत्री - मन्त्रद्वारा प्रोक्षण ( जलसे अभिषेक ) करे। फिर उस ध्वजके वस्त्रमें सूर्य , गरुड और चन्द्रमाकी पूजा करे। ध्वजके द्ण्डमें धाता और विधाताका पूजन करे। हल्दी अक्षत और गन्ध आदि सामग्रियोंसे विशेषतः श्वेत पुष्पोंसे पूजन करना चाहिये। तदनन्तर गोचर्म बराबर एक वेदी बनाकर उसे जल और गोबरसे लीपे। फिर अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतलायी हुई विधिके अनुसार पञ्चभू - संस्कारपूर्वक अग्रिकी स्थापना करके क्रमशः आघार और आज्य - भाग आदि होमकार्य करे। फिर घृतमिश्रित खीरकी एक सौ आठ आहुति दे। यह आहुति प्रधान देवता भगवान् ‌‍ विष्णुके अष्टाक्षर - मन्त्रसे देनी चाहिये। ( यथा ‘ ॐ नमो नारायणाय स्वाहा। ‘ ) ब्रह्यन् ‌‍ ! इसके बाद पुरुषसूक्तके प्रथम मन्त्र , विष्णोर्नुकम् ‌‍ , इरावती , वैनतेयाय स्वाहा , सोमो धेनुम् ‌‍ और उदुत्यं जातवेदसम् ‌‍ – इन मन्त्रोंसे क्रमशः आठ - आठ आहुति अग्रिमें डाले। तत्पश्चात् ‌‍ वहाँ यथाशक्ति ‘ बिभ्राड् ‌‍ बृहत् ‌‍ पिबतु सोम्यं मधु ‘ इत्यादि ( यजु० ३३।३० ) सूर्यदेवतासम्बन्धी मन्त्रों तथा ‘ शं नो मित्रः शं वरुणः ‘ ( यजु० ३६।९ ) इत्यादि शान्तिसूक्तके मन्त्रोंका पाठ या जप करे और पवित्रतापूर्वक भगवान् ‌‍ विष्णुके समीप रात्रिमें जागरण करे। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्यकर्म समाप्त करके गन्ध , पुष्प आदिके द्वारा क्रमशः पहलेकी तरह ही भगवान्‌‍कि पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उस सुन्दर ध्वजको मङ्रलवाद्य , सूक्तपाठ , स्तोत्रगान और नृत्य आदि उत्सवके साथ भगवान् ‌‍ विष्णुके मन्दिमें ले जाय। नारदजी ! भगवान्‌‍के द्वारपर अथवा मन्दिरके शिखरपर खम्भेसहित उस ध्वजको प्रसन्नतापूर्वक दृढ़ताके साथ स्थापित करे। फिर गन्ध , पुष्प , अक्षत , धूप , दीप आदि मनोहर उपचारों तथा भक्ष्य - भोज्य आदि पदार्थयुक्त नैवेद्योंसे भगवान् ‌‍ विष्णुकी पूजा करे। इस प्रकार उत्तम एवं सुन्दर ध्वजको देवालयमें स्थापित करके परिक्रमा करे।
इसके बाद भगवान्‌‍के सामने इस स्तोत्रका पाठ करे। पुण्डरीकाक्ष ! कमलनयन ! आपको नमस्कार है। विश्वभावन ! आपको नमस्कार है। हृषीकेश ! महापुरुष ! सबके पूर्वज ! आपको नमस्कार है। जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् ‌‍ उत्पन्न हुआ है , जिनमें यह सब प्रतिष्ठित है और प्रलयकाल आनेपर जिनमें ही इसका लय होगा , उन भगवान् ‌‍ विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। व्रह्या आदि देवता भी जिनके परम भाव ( यथार्थ स्वरूप )- को नहीं जानते और योगी भी जिन्हें नहीं देख पाते , उन ज्ञानस्वरूप श्रीहरिकी मैं वन्दना करता हूँ। अन्तरिक्ष जिनकी नाभि है , द्युलोक जिनका मस्तक है और पृथ्वी जिनका चरण है , उन विश्वरूप भगवान्‌‍को मैं प्रणाम करता हूँ। सम्पूर्ण दिशाएँ जिनके कान हैं , सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं तथा ऋक् ‌‍, साम और यजुर्वेद जिनसे प्रकाशित हुए हैं , उन ब्रह्यस्वरूप भगवान् ‌‍ विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके मुखसे ब्राह्यण उत्पन्न हुए हैं , जिनकी भुजासे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है , जिनके ऊरुसे वैश्य प्रकट हुए हैं और जिनके चरणोंसे शूद्रका जन्म हुआ है , विद्वान् ‌‍ लोग मायाके संयोगमात्रसे जिन्हें पुरूष कहते हैं , जो स्वभावतः निर्मल , शुद्ध , निर्विकार तथा दोषोंसे निर्लिप्त हैं , जिनका कहीं अन्त नहीं है , जो किसीसे पराजित नहीं होते और क्षीरसागरमें शयन करते हैं , श्रेष्ठ भक्तोंपर जिनकी स्त्रेहधारा सदा प्रवाहित होती रह्ती है तथा जो भक्तिसे ही सुलभ होते हैं , उन भगवान् ‌‍ विष्णुको मैं प्रणास करता हूँ। पृथ्वी आदि पाँच भूत , तन्मात्रएँ , इन्द्रियाँ तथा सूक्ष्म और स्थूल सभी पदार्थ जिनसे अस्तित्व लाभ करते हैं , सब ओर मुखवाले उन सर्वव्यापी परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्हें सम्पूर्ण लोकोंमें उत्तम - से - उत्तम , निर्गुण , अत्यन्त सूक्ष्म , परम प्रकाशमय परव्रह्य कहा गया है , उन श्रीहरिको मैं बारम्बार प्रणास करता हूँ। योगीश्वरगण जिन्हें निर्विकार , अजन्मा , शुद्ध , सब ओर बाँहवाले तथा ईश्वर मानते हैं , जो समस्त कारणतत्तोंके भी कारण हैं , जो भगवान् ‌‍ सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा हैं , यह जगत् ‌‍ जिनका स्वरूप विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो मायासे मोहित चित्तवाले अज्ञानी पुरुषोंके लिये हृदयमें रहकर भी उनसे दूर बने हुए हैं और ज्ञानियोंके लिये जो सर्वत्र प्राप्त हैं , वे भगवान् ‌‍ विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। चार , दो , पाँच और दो अक्षरवाले मन्त्रोंसे जिनके लिये आहुति दी जाती है , वे विष्णुभगवान् ‌‍ मुझपर प्रसन्न हों। जो ज्ञानियों , कर्मयोगियों तथा भक्त पुरुषोंकी उत्तम गति प्रदान करनेवाले हैं , वे विश्वपालक भगवान् ‌‍ मुझपर प्रसन्न हों। जगत्‌‍का कल्याण करनेके लिये श्रीहरि लीलापूर्वक जिन शरीरोंकी धारण करते हैं , विद्वान् ‌‍ लोग उन सबकी पूजा करते हैं , वे लीलाविग्रहधारी भगवान् ‌‍ मुझपर प्रसन्न हों। ज्ञानी महात्मा जिन्हें सच्चिदानन्दस्वरूप निर्गुण तथा गुणोंके अधिष्ठान मानते हैं , वे भगवान् ‌‍ विष्णु मुझपर प्रसन्न हों।
इस प्रकार स्तुति करके भगवान् ‌‍ विष्णुको प्रणाम और ब्राह्यणोंका पूजन करे। तत्पश्चात ‌‍ दक्षिणा और वस्त्र आदिके द्वारा आचार्यकी भी पूजा करे। विप्रवर ! उसके बाद भक्तिभावसे पूर्ण होकर यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन करावे। फिर स्त्री - पुत्र और मित्र आदि बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निरन्तर भगवान् ‌‍ नारायणके चिन्तनमें लगा रहे। नारदजी ! जितने क्षणोंतक उस ध्वजाकी पताका वायुसे फहराती रहती है , आरोपण करनेवाले मनुष्यकी उतनी ही पाप - राशियाँ निस्संदेह नष्ट हो जाती हैं। महापातकोंसे युक्त अथवा सम्पूर्ण पातकोंसे दूषित पुरुष भी भगवान् ‌ विष्णुके मन्दिरमें ध्वजा फहराकर सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो धार्मिक पुरुष ध्वजाको आरोपित देखकर उसका अभिनन्दन करते हैं , वे सभी अनेकों महापातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। भगवान् ‌‍ विष्णुके मन्दिरमें स्थापित किया हुआ ध्वज जब अपनी पताका फहराने लगता है , उस समय आधे पलमें ही वह उसे आरोपित करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है।

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