द्वितीय पाद - निरुक्त-वर्णन

सनन्दनजी कहते हैं — अब मैं निरुक्तका वर्णन करता हूँ , जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्ग है । यह वैदिक धातुरूप है , इसे पाँच प्रकारका बताया गया है ॥१॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता है , कहीं वर्णका विपर्यय होता है , कहीं वर्णोंका विकार होता है और कहीं वर्णका नाश माना गया है ॥२॥ नारद ! जहाँ वर्णोंके विकार अथवा नाशद्वारा जो धातुके साथ विशेष अर्थका प्रकाशक संयोग होता है , वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया है ॥३॥ वर्णके आगमसे ‘ हंस :’ पदकी सिद्धि होती है । वर्णोंके विषर्यय ( अदल - बदल ) - से ‘ सिंह :’ पद सिद्ध होता है । वर्णनाशसे ‘ पृषोदर :’ सिद्ध होता है ॥४॥ ‘ भ्रमर ‘ आदि शब्दोंमे पाँचवाँ योग समझना चाहिये । वेदोंमें लौकिक नियमोंका विकल्प या विपर्यय कहा गया है । यहाँ ‘ पुनर्वसु ‘ पदको उदाहरणके रूपमें रखना चाहिये ॥५॥ ‘ नभवस्वत‌ ‘- में ‘ वत्‌ ‘ प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे ‘ स ‘ का रुत्व नहीं हुआ । ( वार्तिक भी है -‘ नभोंऽङ्गिरोमनुषां वत्युपसंख्यानम्‌ ‘ ) ‘ वृषन्‌ अश्वो यस्य स :’ इस विग्रहमें ब्रहुव्रीहि समास होनेपर ‘ वृषन्‌ + अश्व :’ इस अवस्थामें अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था , किंतु ‘ वृषण्‌ वस्वश्वयो :’ इस वार्तिकके नियमानुसार भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ : अत : ‘ वृषणश्व :’ यही वैदिक प्रयोग है । ( लोकमें ‘ वृषाश्व :’ होता है । ) कहीं - कहीं आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपदका प्रयोग होता है । यथा -‘ प्रतीपमन्य ऊर्मिर्युध्यति ‘ यहाँ ‘ युध्यते ‘ होना चाहिय , किंतु परस्मैपदका प्रयोग किया गया है । ‘ प्र ‘ आदि उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनकी उपसर्ग एवं गतिसंज्ञा होती है ; किंतु वेदमें वे धातुके बादमें या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी ‘ उपसर्ग ‘ एवं ‘ गति ‘ कहलाते हैं - यथा ‘ हरिभ्यां याह्योक आ। आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि। ‘ यहाँ ‘ आयादि ‘ के अर्थमें ‘ याहि + आ ‘ का व्यवहित तथा पर प्रयोग है। दूसरे उदाहरणमें आ + याहिके बीचमें बहुत - से पदोंका व्यवधान है ॥६॥ वेदमें विभक्तियोंका विपर्यास देखा जाता है , जैसे - ‘ दध्रा जुहोति ‘; यहाँ ‘ दुहि ‘ शब्द ‘ हु ‘ धातुका कर्म है , उसमें द्वितीया होनी चाहिये , किंतु ‘ तृतीया च होश्छन्दसि ‘ इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया हो गयी है । ‘ अभ्युत्सादयामक :’ इसमें अभि + उतपूर्वक ‘ सद्‍ ‘ धातुसे लुङ लकारमें ‘ आम्‌ ‘ और ‘ अक ‘- का अनुप्रयोग हुआ है ( लोकमें ‘ अभ्युदषीषदत्‌ ‘ रूप बनता है ) । ‘ मा त्वाग्निर्ध्वनयीत ‘ इसमें ‘ नोनयति ध्वनय० ‘ इत्यादि वैदिक सूत्रके द्वारा च्लिके चङभावका निषेध होता है । माङके योगमें ‘ अट आट ‘ न होनेसे ‘ ध्वनयीत्‌ ‘ रूप हुआ है ( लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप अदिध्वनत्‌ ‘ होता है और चुरादिका रूप ‘ अदिध्वनत्‌ ‘ होता है ) । ‘ ध्वनयीत‌ ‘ इत्यादि प्रमुक उदाहरण हैं । ‘ निष्टर्क्य० ‘ इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध होते हैं । ‘ छन्दसि निष्टर्क्य ‘ इत्यादि सूत्र इसमें प्रमाण हैं । यहाँ ‘ निस्‌ पूर्वक कृत्‌ ‘ धातुसे ‘ ऋदुपधाच्च ‘ सूत्रके अनुसार ‘ क्यप्‌ ‘ प्राप्त था ; परंतु ‘ ण्यत्‌ ‘ प्रत्यय हुआ है ; साथ ही ‘ कृत ‘ में आदि - अन्तका विषर्यय होनेसे ‘ तृक ‘ रूप बना । फिर गुण होनेसे तर्क्य हुआ । ‘ निस्‌ ‘ के ‘ स्‌ ‘ का षत्व हुआ और ष्टुत्व होकर ‘ निष्टर्क्य ‘ सिद्ध हुआ । ‘ गृभाय ‘ इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक ‘ शायच ‘ होनेसे बनते हैं । ह्र - धातुसे शायच हुआ और ‘ ह्रग्रहोर्भश्छन्दसि ‘ के आदेशानुसार ‘ ह ‘ के स्थानमें ‘ भ ‘ ओ गया तो ‘ गृभाय ‘ बना -‘ गृभाय जिह्वया मधु ‘ ॥७॥ शास्त्रकार सुप , तिङ उपग्रह ( परस्मैपद - आत्मनेपर ) , लिङ्ग , पुरुष , काल , हल्‌ , अच्‌ , स्वर , कर्तृ , ( कारक ) और यङ - इन सबका व्यत्यय ( विपर्यय ) चाहते हैं , वह भी बाहुलकसे सिद्ध होता है ॥८॥ ‘ रात्री ‘ शब्दमें ‘ रात्रेश्चाजसौ ‘ ( पा० सू० ( ४।१।३१ ) इस नियमके अनुसार रात्रि - शब्दसे डीप - प्रत्यय हुआ है । ( लोकमें ‘ कृदिकारादक्तिन : ‘ से डीष होकर अन्तोदात्त होता है । ) ‘ विभ्वी ‘ में बी विभु - शब्दसे ‘ भुवश्च ‘ के नियमानुसार डीष‌ हुआ है । ‘ कद्रू :’ पदमें ‘ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ‘ से ऊङ प्रत्यय हुआ हैं । ‘ आविष्टयो वर्धते ‘ इत्यादि स्थलोंमें ‘ अविष्टयस्योपसंख्यान्म छन्दसि ‘ के नियमानुसार ‘ आविस्‌ ‘ अव्यय से ‘ त्पप्‌ ‘ यह तद्धित - प्रत्यय हुआ है । ‘ वाजसनेयिन : ‘ मे ‘ वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते ‘ इस व्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय - शब्दसे ‘ शौनकादिभ्यश्छन्दसि “ सूत्रके द्वारा ‘ णिनि ‘ प्रत्यय हुआ है ॥९॥ ‘ कर्णेभि :’ में ‘ बहुलं छ्न्दसि ‘ के नियमानुसार ‘ भिस्‌ ‘ के स्थानमें ‘ ऐस ‘ आदेश नहीं हुआ है । ‘ यशोभग्य :’ पदमें वेशोयश आदेर्भगाद्‌यल ‘ इस सूत्रसे ‘ यल ‘ प्रत्यय हुआ है । इत्यादि उदाहरण जानने चाहिये । ‘ चतुरक्षरम्‌ ‘ पदसे चार अक्षरवाले ‘ आश्रावय ‘ ‘ अस्तु श्रौषट ‘ आदि पदोंकी ओर संकेत किया गया है । अक्षर - समूह वाच्य हो तो ‘ छन्दस्‌ ‘ शब्दसे ‘ यत्‌ ‘ प्रत्यय होता है -‘ छ्न्दस्य :’ यह उदाहरण है । ‘ देवास :’ में ‘ आज्जसेरसुक्‌ ‘ इस नियमके अनुसार ‘ असुक्‌ ‘ का आगम हुआ है । ‘ सर्वदेव ‘ शब्दसे स्वार्थमें ‘ ‘ तातिल्‌ ‘ प्रत्यय होता है । ‘ सविता न : सुवतु सर्वदेवतातिम्‌ ‘ इस उदाहरणमें ‘ सर्वदेव ‘ शब्दसे ‘ तातिल्‌ ; प्रत्यय होनेपर ‘ सवदेवताति ‘ शब्दकी सिद्धि होती है । ‘ युष्मद्‌ ‘,’ अस्मद‌ ‘ शब्दोंसे सादृश्य - अर्थमें ‘ वतुप्‌ ‘ प्रत्यय होता है । इस नियमसे ‘ त्वावत :’ पदकी सिद्धि हुई है । ‘ त्वावत :’ का पर्याय है ‘ त्वत्सदृशान्‌ ‘ ( तुम्हारे सदृश ) ॥१०॥ ‘ उभयाविनम्‌ ‘ इत्यादि पदोमें ‘ बहुलं छन्दोविन्प्रकरणे० ‘ इत्यादि नियमसे उभय शब्दके अकारका दीर्घ होनेसे ‘ उभयाविनम्‌ ‘ रूप बना है । प्रत्य , पूर्व आदि शब्दोंसे इवार्थमें ‘ थाल ‘ प्रत्यय होता है , इस नियमसे ‘ प्रत्नथा ‘ बनता है । इसी प्रकार ‘ पूर्वथा ‘ आदि भी हैं । वेदमें ‘ ऋच ‘ शब्द परे होनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता है और उत्तरपदके आदिका लोप हो जाता है । तिस्त्र ऋचो यस्मिन्‌ ‘ तत तृचं सूक्तम्‌ । जिसमें तीन ऋचाएँ हों , उस सूक्तका नाम ‘ तृच ‘, है । ‘ त्रि + ऋच ‘ इस अवस्थामें ‘ त्रि ‘ का सम्प्रसारण होनेपर ‘ तृ ‘ बना और ऋच्‌के ऋका लोप हो गया तो ‘ तृचम् ‌’ सिद्ध हो गया । ‘ इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथाम् ‌’ यहाँ ‘ अप ‘ उपसर्गके साथ ‘ स्पृध ‘ धातुके लङ लकारमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप है । ‘ अपस्पृधेथाम ‘ यह निपातनसे सिद्ध होता है । रेफका सम्प्रसारण और अलोप निपातनसे ही होता है । माङका योग न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ है ( लोकमें इसका रूप ‘ अपास्पर्धेथाम ‘ होता है ) । ‘ वसुभिर्नो अव्यात ‘ इत्यादिमें ‘ अव्यादवद्या० ‘ इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर ‘ अ ‘ परे होनेपर एङ ( ओ ) - का प्रकृतिभाव हुआ है । ‘ आपो अस्मान् ‌ मातर ;’ इत्यादि प्रयोग भी ‘ आपो जुषाणो० ‘ आदि नियमके अनुसार प्रकृति - भावसे सिद्ध होते हैं । आकार परे रहनेपर ‘ आपो ‘ आदिमें प्रकृतिभाव होता है ॥११॥ ‘ समानो गर्भ : सगर्भस्तत्र भव : सगर्भ्य : । ‘ यहाँ ‘ समानस्य स :’ इत्यादि सूत्रसे समानका ‘ स ‘ आदेश हुआ है । ‘ सगर्भसय़ूथसनुताद्‌यत ‘ से यत् ‌- प्रत्यय हुआ है । ‘ अष्टापदी ‘ यहाँ ‘ छन्दसि च ‘- के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टनके ‘ न ‘ का ‘ आ ‘ आदेश हो गया है । ‘ ऋतौ भवम ऋत्व्यम् ‌’- जो ऋतुमें हो , उसे ‘ ऋत्व्य ‘ कहते हैं । ‘ ऋत्व्यवास्त्व्य :’ इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर ‘ ऋत्व्यम ‘ पदकी सिद्धि होती है । अतिशयेन ‘ ऋजु ‘ इति ‘ र्जिष्ठम्‌ ‘ - जो अत्यन्त ऋजु ( कोमल या सरल ) हो , उसे ‘ रजिष्ठ ‘ कहा गया है । ‘ विभाषर्जोश्छन्दसि ‘ के नियमानुसार इष्ठ , इमन् ‌ और ईयम् ‌ परे रहनेपर ऋजुके ‘ ऋ ‘ के स्थानमें ‘ र ‘ होता है । ‘ ऋजु इष्ठ ‘ इस अवस्थामें ॠके स्थानमें ‘ र ‘ तथा उकार लोप होनेसे ‘ रजिष्ठ ‘ शब्द बना है । ‘ त्रिपञ्चकम ‘- त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् ‌ ‘ त्रिपञ्चकम् ‌’ इस विग्रहके अनुसार बहुवीहिसमास करनेपर ‘ त्रिपञ्चकम ‘ की सिद्धि होती है । ‘ हिरण्ययेन सविता रथेन ‘ इस मन्त्र - वाक्यमें ‘ ऋत्व्यवास्त्व्य ‘ आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य - शब्दसे ‘ मय‍ट ‘ प्रत्यय और उसठे ‘ म ‘- का लोप निपातन किया जाता है । इससे ‘ हिरण्यय ‘ शब्द्की सिद्धि होती है । ‘ इतरम् ‌’- वेदमें इतर शब्दसे ‘ अदड ‘ का निषेध है। अत : ‘ सु ‘ का ‘ अम् ‌’ आदेश होनेसे ‘ इतरम् ‌’ पद सिद्ध होता है । यथा -‘ वार्त्रघ्नमितरम ‘ । ‘ परमे व्योमन् ‌’ यहाँ ‘ व्योमनि ‘ रूप प्राप्त था ; किंवु ‘ सुपां सुलुक् ‌’ इत्यादि नियमसे डि - विभक्तिका लुक हो गया ॥१२॥ ‘ उर्विया ‘ की जगह ‘ उरुणा ‘ रूप प्राप्त था । ‘ टा ‘ का ‘ इया ‘ आदेश होनेसे ‘ उर्विया ‘ रुप बना । ‘ इयाडियाजीकाराणामुप - संख्यानम् ‍’ इस वार्तिकसे यहाँ ‘ इयाज् ‌’ हुआ है । ‘ स्वप्रया के स्थानमें ‘ स्वप्नेन ‘ यह रूप प्राप्त था , कितु ‘ सुपा ‘ सुलुक्‌० ‘ इत्यादि नियमके अनुसार ‘ टा ‘ का ‘ अयाच् ‌’ हो गया ; अत ; ‘ स्वप्नया ‘ रूप बना । ‘ वारयध्वम ‘ रूप प्राप्त था , किंतु ‘ ध्वमो ध्वात् ‌’ सूत्रसे ‘ ध्वम ‘ के स्थानमें ‘ ध्वात ‘ आदेश होनेसे ‘ ‘ वारयध्वात ‘ हो गया । ‘ अदुहत ‘ के स्थानमें ‘ अदुह्न ‘ यह वैदिक प्रयोग है । ‘ लोपस्त आत्मनेपदेषु ‘ इस सूत्रसे तलोप और ‘ बहुलं छ्न्दसि ‘ से रुटका आगम हुआ है । ‘ वि ‘ पादपूर्तिके लिये है । ‘ अवधिषम ‘ य़ह रूप प्राप्त था , इसके स्थानमें ‘ वधीं ‘ रूप हुआ है । यहाँ ‘ अम् ‘ का ‘ म ‘ आदेश और अडागमका अभाव तथा ‘ ईद ‘ का आगम हुआ है - वर्धी वृत्रम । ‘ यजध्वैनं ‘- यहाँ ‘ यजध्वम् ‌ + एनम् ‌’ इस दशामें ‘ ध्वम ‘ के ‘ म ‘ का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है । ‘ तमो भरन्त एमसि ‘- यहाँ ‘ इम :’ के स्थानमें ‘ इदन्तो मसि ‘ इस सूत्रके अनुसार ‘ एमसि ‘ रूप हुआ है। ‘ स्विन्न : स्नात्वी मलादिव ‘- इस मन्त्रमें ‘ स्नात्वा ‘ रूप प्राप्त था ; किंतु ‘ स्नात्व्यादयश्च ‘- इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें ‘ स्नात्वी ‘ निपातन हुआ । ‘ गत्वाय ‘- गत्वाके स्थानमें ‘ क्त्वो यक ‘ सूत्रके अनुसार ‘ यक ‘ का आगम होनेसे उक्त पद सिद्भ होता है । ‘ अस्थभि ;’ में अस्थि - शब्दके ‘ इ ‘ को ‘ अनङ ‘ आदेश होकर नलोप हो गया है । ‘ छन्दस्यपि दृश्यते ‘ इस नियमसे इलादि विभक्ति परे रहनेपर भी ‘ अनङ ‘ आदेश होता है॥१३॥ ‘ गोनाम् ‌’ यहाँ आम् ‌- विभक्ति परे रहते नुटका आगम हुआ है । किसी छन्दके पादान्तमें गो - शब्द हो तो प्राय : षष्ठी - बहुवचनमें वहाँ नुट्‌का आगम हो जाता है । ‘ अपरिहवृता :’ यहाँ ‘ हु हवरेश्छन्दसि ‘ से पाप्त हुए ‘ हु ‘ आदेशका अभाव निपातित हुआ है । ‘ ततुरि : ` जगुरि :’ इत्यादि पद भी ‘ बहुलं छन्दसि ‘ के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं । ‘ ग्रसिताम्‌ ‘ ‘ ग्रसु ‘ अदनेका निष्ठान्त रूप है । यहाँ इट्‍का निषेध प्राप्त था , किंतु निपातनसे इट हो गया है । इसी प्रकार ‘ स्कभित ‘ आदिको भी समझना चाहिये । ‘ पश्वे ‘ यहाँ ‘ जसादिषु छन्दसि वा वचनं० ‘ इत्यादिसे वैकल्पिक घि - संज्ञा होनेके कारण घि - संज्ञाके अभावमें यण्‌ होनेसे ‘ पश्वे ‘ रूप बना है । इसी तरह ‘ दधद ‘ यह दधातिके स्थानमें निपातित हुआ है ; लेटका रूप है। ‘ दधद्रत्नानि दाशुषे ‘ यह मन्त्र हौ । ‘ बभूथ ‘ यह लिट लकारके मध्यम पुरुषका एकवचन है । वेदमें इसके ‘ इट ‘ का अभाव निपातित हुआ है। ‘ प्रमिणन्ति ‘- यहाँ ‘ प्रणीणन्ति ‘ रूप प्राप्त था । ‘ मीनातेर्निगमे ‘ सूत्रसे ह्नस्व हो गया । ‘ अवीवृधत ‘-‘ नित्यं छ्न्दसि ‘ से चड परे रहते उपधा ऋवर्णका ‘ ऋ ‘- भाव नित्य होता है ॥१४॥ ‘ मित्रयु :’ यहाँ दीर्घका निषेध होता है । ‘ दुष्ट इवाचरति ‘ इस अर्थमें क्यच्‌ परे रहते दुष्ट शब्दका ‘ दुरस ‘‌ आदेश होता है । ‘ दुरस्यु :’ यह निपातनात्‌ सिद्ध रूप है । इसी प्रकार ‘ द्रविणस्यु :’ इत्यादि भी है । वेदमें ‘ क्त्वा ‘ परे रहते हाधातुका ‘ हि ‘ आदेश विकल्पसे होता है । ‘ हि ‘ आदेश न होनेपर ‘ घुमास्था० ‘ इत्यादि सूत्रसे ‘ आ ‘ के स्थानमें ‘ ई ‘ हो जाता है ; अत : ‘ हित्वा ‘ और ‘ हीत्वा ‘ दोनों रूप होते हैं । ‘ सु ‘ पूर्वक धा - धातुसे ‘ क्त ‘ प्रत्यय परे होनेपर ‘ इत्व ‘ निपातन किया जाता है : इससे ‘ सुधितम ‘ रूप बनता है - यथा ‘ गर्भं माता सुधितं वक्षणासु । ‘ ‘ दाधर्ति ‘ ‘ दर्धर्ति ‘ और ‘ दर्धर्षि ‘ आदि रूप निपातनसे सिद्ध हैं । ये ‘ धृ ‘- धातुके यडलुगन्त रूप हैं । ‘ स्ववद्भि :’ अव - धातुसे असुन्‌ करनेपर ‘ अवस ‘ रूप होता है । ‘ शोभनमवो येषां ते स्ववस : तै : स्ववद्भि ‘ यह उसकी व्युत्पत्ति है । ‘ स्वव : स्वतवसोरुषसश्चेष्यते ‘ इस वार्तिकसे भकारादि प्रत्यय परे रहते ‘ स्ववस्‌ ‘ आदि शब्दोंके ‘ स ‘ का ‘ त ‘ हो जाता है । प्रसवार्थक ‘ सू ‘ धातुके लिटमें ‘ ससूवेति निगमे ‘ सूत्रसे ‘ ससूव ‘ यह निपातसिद्ध रूप है । यथा -‘ गृष्टि : ससूव स्थविरम ‘ । ‘ सुधित ‘ इत्यादि सूत्रसे ‘ धत्स्व ‘ के स्थानमें ‘ धिस्व ‘ निपातित होता है - ‘ धिस्व वज्रं दक्षिण इन्द्रहस्ते ‘ ॥१५॥ ‘ प्रप्रायमग्नि :’ यहाँ ‘ प्रसमुपोद : पादपूरणे ‘ से पादपूर्तिके लिये ‘ प्र ‘ उपसर्गका द्वित्व हो गया है । ‘ हरिवते हर्यश्वाय ‘ यहाँ ‘ छन्दसीर : ‘ से ‘ ‘ मतुप्‌ ‘ के ‘ म ‘ का ‘ व ‘ हुआ है । ‘ अक्षण्वन्त : में अक्षि - शब्दसे मतुप . ‘ छन्दस्यपि दृश्यते ‘ से अनड - आदेश तथा ‘ अनो नुट ‘ से ‘ नुट ‘ का आगम हुआ है । ‘ सुपथिन्तर ;’ में ‘ नाद‌घस्य ‘ से ‘ नुट ‘ का आगम विशेष कार्य है । ‘ रथीतर ;’ में ‘ ईद्रथिन :’ से ‘ ई ‘ हुआ है । ‘ नसत्तम ‘ में नञपूर्वक सद - धातुसे निष्ठामें नत्वका अभाव निपातित हुआ है । इसी प्रकार सूत्रोक्त ‘ निषत्त ‘ आदि शब्दोंको जानना चाहिये । ‘ अम्नेरेव ‘- इसमें ‘ अम्नस्‌ ‘ शब्द ईषत अर्थमें है । वेदमें सकारका वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है । वेदमें सकारका वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है । ‘ भुवरथो इति ‘ यहाँ ‘ भुवश्च महाव्याह्रते :’ से भुवस्‌के ‘ स ‘ का ‘ र ‘ हुआ है ॥१६॥ ‘ ब्रूहि ‘ यहाँ ‘ ब्रूहि प्रेष्य० ‘ इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हुआ है । यथा - अग्नयेऽनुब्रू३हि । ‘ अद्यामावास्येत्या३त्थ ‘ यहाँ ‘ निगृह्यानुयोगे च ‘ इस सूत्रसे वाक्यके ‘ टि ‘ का प्लुतभाव होता है । ‘ अग्नीत्प्रेषणे परस्य च ‘ इस सूत्रसे आदि और परका भी प्लुत ह्ता है । उदाहरणके लिये ‘ ओ३श्रा ३ वय ‘ इत्यादि पद है । इन सबमें प्लुत हुआ है । ‘ दाश्वान्‌ ‘ आदि पद क्वसु - प्रत्ययान्त निपातित होते हैं । ‘ स्वतवान्‌ ‘ शब्दके नकारका विकल्पसे ‘ रु ‘ होता है , पायु - शब्द परे रहनेपर - स्वतवाँ : पायुरग्ने। ‘ ‘ त्रिभिष्ट्वं देव सवित : । ‘ यहाँ ‘ त्रिभिस त्वम्‌ ‘ इस दशामें ‘ युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्त : पादम्‌ ‘ इस सूत्रमें ‘ स ‘ के स्थानमें ‘ ष ‘ होकर ष्टुत्व होनेसे ‘ त्रिभिष्ट्वम बनता है । ‘ नृभिष्टत :’ यहाँ ‘ स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि ‘ इस सूत्रसे ‘ नॄनिस ‘ के ‘ स ‘ का ‘ ष ‘ होकर ष्टुत्व हुआ है ॥१७॥ ‘ अभीषुण :’ यहाँ ‘ सुञ :’ सूत्रसे ‘ स ‘ का ‘ ष ‘ हुआ है । ‘ ऋताषाहम ‘ में सहे : पृतनर्ताभ्यां च ‘ इस सूत्रसे ‘ स्‌ ‘ का मूर्धन्य आदेश हुआ है । ‘ न्यषीदत्‌ ‘ यहाँ भी ‘ निव्यभिभ्योऽडव्यवाये वा छन्दसि ‘ इस सूत्रसे ‘ स ‘ का मूर्धन्य हुआ है। ‘ नृमणा :’ इसा पदमें ‘ छन्दस्यृदवग्रहात्‌ ‘ सूत्रसे ‘ न ‘ का ‘ ण ‘ हुआ पदमें ‘ छन्दस्यृदवग्रहात्‌ ‘ सूत्रसे ‘ न ‘ का ‘ णि ‘ हुआ है । बाहुलक चार प्रकारके होते हैं - कहीं प्रवित्ति होती है , कहीं अप्रवृत्ति होती है , कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है । इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद - समुदाय सिद्ध है । इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद - समुदाय सिद्ध है । क्रियावाची ‘ भू ‘ ‘ वा ‘ आदि शब्दोंकी ‘ धातु ‘ संज्ञा जाननी चाहिये । ‘ भू ‘ आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं ॥१८ - १९॥ ‘ एध ‘ आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं ( इन्हें ‘ अनुदात्तेत ‘ माना गया है ) । मुने !’ अत ‘ आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं ॥२०॥ शीकृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं । फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत्‌ ( परस्मैपदी ) कहे गये हैं ॥२१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदानेत ( आत्मनेपदी ) बताये गये हैं । ‘ गुप ‘ आदि बयालीस धातु ‘ उदात्तेत्‌ ‘ ( परस्मैपदी ) कहे गये हैं ॥२२॥ ‘ घिणी ‘ आदि दस धातु शाब्दिकोंद्वारा ‘ अनुदात्तेत ‘ कहे गये हैं । ‘ अणु ‘ आदि सत्ताईस धातु ‘ उदात्तेत ‘ बताये गये हैं ॥२३॥ ‘ अय ‘ आदि चौतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत ( आत्मनेपदी ) माने गये हैं । ‘ मव्य ‘ आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं ॥२४॥ ‘ धावु ‘ धातु अकेला ही ‘ स्वरितेत ‘ कहा गया है । ‘ क्षुध ‘ आदि बावन धातु ‘ अनुदात्तेत ‘ कहे गये हैं ॥२५॥ ‘ घुषिर ‘ आदि अठासी धातु ‘ उदात्तेत्‌ ‘ माने गये हैं । ‘ द्युते ‘ आदि बाईस धातु ‘ अनुदात्तेत‌ ‘ स्वीकार किये गये हैं ॥२६॥ घटादिमें तेरह धातु ‘ षित ‘ और ‘ अनुदात्तेत ‘ कहे गये हैं । तदनन्तर ‘ ज्वर ‘ आदि बावन धातु उदात्त बताये गये हैं ॥२७॥ ‘ राजृ ‘ धातु ‘ स्वरितेत ‘ है । उसके बाद ‘ भ्राजृ ‘ भ्राश्रृ और भ्लाश्रृ ‘- ये तीन धातु ‘ अनुदात्तेत ‘ कहे गये हैं । तदनन्तर ‘ स्यमु ‘ धातुसे लेकर आगे सभी आद्युदात्त एवं उदात्तेत ( परस्मैपदी ) हैं ॥२८॥ फिर एकमात्र ‘ षह ‘ धातु ‘ अनुदात्तेत ‘ तथा अकेला ‘ रम ‘ धातु ‘ आत्मनेपदी ‘ है । उसके बाद ‘ सद ‘ आदि तीन धातु ‘ उदात्तेत्‌ ‘ हैं । फिर ‘ कुच ‘ आदि चार धातु भी ‘ उदात्तेत ‘ ( परस्मैपदी ) ही हैं ॥२९॥ इसके बाद ‘ हिक्क ‘ आदि पैंतीस धातु ‘ स्वरितेत्‌ ‘ हैं । ‘ श्रिञ ‘ धातु स्वरितेत्‌ है । ‘ भृञ ‘ आदि चार धातु भी स्वरितेत ही हैं ॥३०॥ ‘ धेट ‘ आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं । ‘ स्मिङ ‘ आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं ॥३१॥ फिर ‘ पूङ ‘ आदि तीन धातु अनुदात्तेत कहे गये हैं । ‘ ह्न ‘ धातु परस्मैपदी है । फिर ‘ गुप ‘ से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं ॥३२॥ ‘ रम ‘ आदि धातु अनुदात्तेत हैं और ‘ ञिक्ष्विदा ‘ उदात्तेत है । स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं ॥३३॥ ‘ कित ‘ धातु ‘ उदात्तेत ‘ है । ‘ दान ‘ ‘ शान ‘- ये दो धातु उभयपदी हैं । ‘ पच ‘ आदि नौ धातु स्वरितेत्‌ ( उभयपदी ) हैं । वे परस्मैपदी ( और आत्मनेपदी दोनों ) माने गये हैं ॥३४॥ फिर तीन स्वरितेत्‌ धातु हैं । परिभाषणार्थक ‘ वद ‘ और ‘ वच ‘ धातु परस्मैपदी हैं । ये एक हजार छ : धातु भ्वादि कहे गये हैं ॥३५॥
‘ अद ‘ और ‘ हन्‌ ‘ धातु परस्मैपदी कहे गये हैं । ‘ द्विष ‘ आदि चार धातु स्वरितेत्‌ माने गये हैं ॥३६॥ यहाँ केवल ‘ चक्षिड धातु आत्मनेपदी कहा गया है । फिर ‘ ईर ‘ आदि तेरह धातु अनुदात्तेत हैं ॥३७॥ मुने ! वैयाकरणोंने ‘ षूड ‘ और ‘ शीड ‘- इन दो धातुओंको आत्मनेपरी कहा है । फिर ‘ षु ‘ आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥३८॥ मुनीश्वर ! यहाँ एक ‘ ऊर्णुञ ‘ धातु स्वरितेत्‌ कहा गया है । ‘ द्यु ‘ आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥३९॥ नारद ! केवल ‘ ष्टुञ ‘ धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है ॥४०॥ ‘ रा ‘ आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं । नारद ! फिर केवल ‘ इङ ‘ धातु आत्मनेपदी कहा गया है ॥४१॥ उसके बाद ‘ विद ‘ आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं । ‘ ञिष्वप्‌ शये ‘ यह धातु परस्मैपदी कहा गया है ॥४२॥ मुने ! ‘ श्वस ‘ आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे हैं । ‘ दीधीड ‘ और ‘ वेवीड ‘- ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं ॥४३॥ ‘ षस ‘ आदि तीन धातु ‘ उदात्तेत ‘ हैं । मुनिश्रेष्ठ ! ‘ चर्करीतं च ‘ यह यङलुगन्तका प्रतीक है । यह अदादि माना गया है । ‘ ह्नड ‘ धातु अनुदात्तेत कहा गया है ॥४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं ।
‘ हु ‘ आदि चार धातु ( हु , भी , ह्नी और पृ ) परस्मैपदी माने गये हैं ॥४५॥ ‘ भृञ्‌ ‘ धातु स्वरितेत्‌ और ‘ ओहाक ‘ धातु उदात्तेत है । ‘ माङ ‘ और ‘ ओहाड ‘- ये दोनों धातु अनुदात्तेत हैं । दानार्थक ‘ दा ‘ और धारणार्थक ‘ धा ‘- इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है ॥४६॥ ‘ णिजिर ‘ आदि तीन धातु स्वरितेत्‌ कहे गये हैं । ‘ घृ ‘ आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं ॥४७॥ इस प्रकार ह्वादि ( जुहोत्यादि ) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं ।
‘ दिव ‘ आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं ॥४८॥ नारद ! ‘ षूड ‘ आदि ‘ दूङ ‘- ये आत्मनेपदी हैं । ‘ षूड ‘ आदि सात धातु ओदित और आत्मनेपदी माने गये हैं ॥४९॥ विप्रवर ! ‘ लीड ‘ आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं । श्यति ( शो ) आदि चार धातु परस्मैदपदी हैं ॥५०॥ मुने ! ‘ जनी ‘ आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं । ‘ म्रृष ‘ आदि पाँच धातु ‘ स्वरितेत ‘ कहे गये हैं ॥५१॥ ‘ पद ‘ आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं । यहाँ वृद्धि - अर्थमें ही अकर्मक ‘ राध ‘ धातुका ग्रहण है । यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पढा गया है ॥५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत्‌ कहे गये हैं । तत्पश्चात्‌ रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥५३॥ शम आदि छियालीस धातु उदात्तेत कहे गये हैं । इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं ॥५४॥
‘ सु ‘ आदि नौ धातु स्वरितेत्‌ कहे गये हैं । मुने ! ‘ दु ‘ आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥५५॥ ‘ अश ‘ और ‘ ष्टिघ ‘ ये दो धातु अनुदात्तेत्‌ कहे गये हैं । यहाँ ‘ तिक ‘ आदि चौदह धातुओंको परस्मैपदी माना गया है ॥५६॥ विप्रवर ! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं ।
मुनिश्रेष्ठ‍ ! ‘ तुद ‘ आदि छ : स्वरितेत्‌ हैं ॥५७॥ ‘ ॠषी ‘ धातु उदात्तेत्‌ है और ‘ जुषी ‘ आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं । ‘ व्रश्च ‘ आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत कहे गये हैं ॥५८॥ मुनीश्वर ! यहाँ केवल ‘ गुरी ‘ धातु अनुदात्तेत बताया गया है । ‘ णू ‘ आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं ॥५९॥ ‘ कुङ ‘ धातुको ‘ अनुदात्तेत ‘ कहा गया है । यहीं कुटादिगणकी पूर्ति हुई है । ‘ पृङ ‘ और ‘ मृङ ‘- ये आत्मनेपदी धातु हैं । ‘ रि ‘ और ‘ पि ‘ से छ : धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं ॥६०॥ ‘ दृड ‘ ‘ धृड ‘- ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं । मुने ! ‘ प्रच्छ ‘ आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥६१॥ मुने ! फिर ‘ मिल ‘ आदि छ ; धातु स्वरितेत्‌ कहे गये हैं । इसके बाद ‘ कृती ‘ आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं ॥६२॥ इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु हैं ।
‘ रुध ‘ आदि नौ धातु स्वरितेत्‌ हैं । ‘ कृती ‘ धातु परस्मैपदी है । ‘ ञिइन्धी ‘ से तीन धातुतक अनुदात्तेत्‌ कहे गये हैं । तत्पश्चात ‘ शिष पिष ‘ आदि बारह धातु उदात्तेत्‌ हैं । इस प्रकार रुधादि - गणमें कुल पचीस धातु हैं ॥६३ - ६४॥
‘ तनु ‘ धातुसे लेकर सात धातु ‘ स्वरितेत ‘ कहे गये हैं । ‘ मनु ‘ और ‘ वनु ‘- ये दोनों आत्मनेपदी हैं । ‘ कृञ ‘ धातु स्वरितेत कहा गया है ॥६५॥ विप्रवर ! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगणमें दस धातुओंकी गणना की है ।
‘ क्री ‘ आदि सात धातु उभयपदी हैं । मुनीश्वर ! ‘ स्तम्भु ‘ आदि चार सौत्र ( सूत्रोक्त ) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं । ‘ क्रूञ्‌ ‘ आदि बाईस धातु उदात्तेत्‌ कहे गये हैं ॥६६ - ६७॥ ‘ वृङ ‘ धातु आत्मनेपदी है । ‘ श्रन्थ ‘ आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं और ‘ ग्रह धातु स्वरितेत्‌ है ॥६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने क्र्यादिगणमें बावन धातु गिनाये हैं ।
चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु ञित ( उभयपदी ) माने गये हैं ॥६९॥ मुने ! चित आदि अठारह ( या अडतीस ?) आत्मनेपदी माने गये हैं । ‘ ‘ चर्च ‘ से लेकर ‘ धृष ‘ धातुतक ‘ ञित ‘ ( उभयपदी ) कहे गये हैं ॥७०॥ इसके बाद अडतालीस अदन्त धातु भी उभयपदी ही हैं । ‘ पद ‘ आदि इस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं ॥७१॥ यहाँ सूत्र आदि आठ धातुओंको भी मनीषी पुरुषोंने उभयपदी कहा है । प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें णिच और प्राय : सब बातें इष्ठ प्रत्ययकी भाँति होती हैं । तात्पर्य यह कि ‘ इष्ठ ‘ प्रत्यय परे रहते जैसे प्रातिपदिक , पुंवद्भाव , रभाव , टिलोप . विन्मतुब्लोप , यणादिलोप , प्र , स्थ , स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं , उसी प्रकार ‘ णि ‘ परे रहते भी सब कार्य होंगे ॥७२॥ ‘ उसे करता है , अथवा उसे कहता है ‘ इस अर्थमें भी प्राति पदिकसे णिच प्रत्यय होता है । प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे णिच्‌ होता है । कर्तृ - व्यापारके लिये जो करण है , उससे धात्वर्थमें णिच होता है । चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत हैं । किंतु ‘ संग्राम ‘ धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोंने अनुदात्तेत माना है । स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन हैं ॥७३ - ७४॥ ‘ बहुलमेतन्निदर्शनम ‘- इसमें जो बहुल शब्द आया है , उससे अन्य जो सूत्रोक्त लौकिक और वैदिक धातु हैं . उन सबका ग्रहण होता है । सभी धातु सब गणोंमें हैं और सबके अनेक अर्थ हैं ॥७५॥ इन धातुओंके अतिरिक्त सानादि प्रत्यय जिनके अन्तमें हों , उनकी भी धातु - संज्ञा होती है । नामधातु भी धातु ही हैं । नारद ! इस प्रकार अनन्त धातुओंकी उद्भावना हो सकती है । यहाँ संक्षेपसे सब कुछ बताया गया है । इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें है ॥७६॥
( उपदेशावस्थामें एकाच अनुदात्त धातुसे परे वलादि आर्धधातुकको इटका आगम नहीं होता । जिनमें यह निषेध लागू होता है , उन धातुओंको ‘ अनिट ‘ कहते हैं । उन्हीं अनिट या एकाच अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है - ) अजन्त धातुओंमें - ऊकारान्त , ऋकारान्त , यु , रु , क्ष्णु , शीङ स्नु , नु , क्षु , श्वि , डीङ , श्रिञ , वृङ , वृञ - इन सबको छोडकर शेष सभी अनुदात्त ( अर्थात अनिट ) माने गये हैं ॥७७॥ शक्लृ , पच्‌ . मुच्‌ , रिच्‌ , वच्‌ , सिच्‌ , प्रच्छ , त्यज्‌ , निजिर , भज्‌ , भञ्ज , भुज्‌ , भ्रस्ज , मस्ज , यज्‌ , युज्‌ , रुज , रञ्ज , विजिर , स्वञ्ज , सञ्स , सृञ्ज ॥७८॥ अद , क्षुद्‌ , खिद , छिद , तुद , नुद , पद , भिद , विद ( सत्ता ), विद ( विचारणे ), शद , सद , स्विद , स्कन्द , हद , क्रुध्‌ , क्षुध्‌ , बुध्‌ , ॥७९॥ बन्ध्‌ , युध्‌ , रुध्‌ , राध्‌ , व्यध्‌ , शुध्‌ , साध्‌ , सिध्‌ , मन्‌ ( दिवादि ), हन्‌ , आप्‌ , क्षिप्‌ , क्षुप्‌ , तप्‌ , तिप्‌ , स्तृप्‌ , दृप्‌ ॥८०॥ लिप्‌ , लुप्‌ , वप्‌ , शप्‌ , स्वप्‌ , सृप्‌ , यभ्‌ , रभ्‌ , लभ्‌ , गम्‌ , नम्‌ , यम्‌ , रम्‌ , क्रुश्‌ , दंश‌ , दिश्‌ , दृश‌ , मृश्‌ , रिश्‌ , रुश्‌ , लिश्‌ , विश्‌ , स्पृश्‌ , कृष्‌ ॥८१॥ त्विष्‌ , तुष्‌ , द्विष्‌ , पुष्‌ , पिष्‌ , विष्‌ , शिष्‌ , शुष्‌ , श्लिष्‌ , घस्‌ , वस्‌ , दह , दिह , दुह , नह , मिह , रुह , लिह्‌ तथा वह्‌ ॥८२॥ ये हलन्तोंमें एक सौ दो धातु अनुदात्त माने गये हैं । ‘ च ‘ आदिकी निपात संज्ञा होती है । ‘ प्र ‘ आदि उपसर्ग ‘ गति ‘ कहलाते हैं । भिन्न - भिन्न दिशा , देश और कालमें प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थोंके बोधक होते हैं । विप्रवर ! वे देश - कालके भेदसे सभी लुङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं । यहाँ गणपाठ , सूत्रपाठ , धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ -‘ पारायण ‘ कहा गया है । नारद ! वैदिक और लौकिक स्भी शब्द नित्यसिद्ध हैं ॥८३ - ८५॥ फिर वैयाकरणोंद्वारा जो शब्दोंका संग्रह किया जाता है , उसमें उन शब्दोंका पारयण ही मुख्य हेतु है ( पारायण - जनित पुण्यलाभके लिये ही उनका संकलन होता है ) । सिद्ध शब्दोंका ही प्रकृति , प्रत्यय , आदेश और आगम आदिके द्वारा लघुमार्गसे सम्यक्‌ निरूपण किया जाता है । इस प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित्‌ ही वर्णन किया गया है। नारद ! इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी कर ही नहीं सकता ॥८६ - ८८॥ ( पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३ )

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