द्वितीय पाद - संहिताप्रकरण

( सनन्दनजी बोले — ) नारदजी ! चैत्रादि मासोंमें क्रमश : मेषादि राशियोंमें सूर्यकी संक्रान्ति होती है । चैत्र शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भमें जो वार ( दिन ) हो , वही ग्रह उस ( चान्द्र ) वर्षका राजा होता है । सूर्यके मेषराशि - प्रवेशके समय जो वार हो , वह सेनापति ( या मन्त्री ) होता है । कर्क राशिकी संक्रान्तिके समय जो वार हो , वह सस्य ( धान्य )- का अधिपति होता है । उक्त वर्ष आदिका अधिपति यदि सूर्य हो तो वह मध्यम ( शुभ और अशुभ दोनों ) फल देता है । चन्द्रमा हो तो उत्तम फल देता है । मङ्गल अधिपति हो तो अनिष्ट ( अशुभ ) फल देनेवाला होता है । बुध , गुरु और शुक्र - ये तीनों अति उत्तम ( शुभ ) फलकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं । शनि अधिपति हो तो अशुभ फल होता है । इन ग्रहोंके बलाबल देखकर तदनुसार इनके न्यून या पूर्ण फल समझने चाहिये ॥१ - ३॥
( धूमकेतु - पुच्छलतारा आदिके फल — ) यदि कदाचित्‌ कहींसे सूर्य - मण्डलमें दण्ड ( लाठी ), कबन्ध ( मस्तकहीन शरीर ) कौआ या कीलके आकारवाले केतु ( चिह्न ) देखनेमेम आवे , तो वहाँ व्याधि , भ्रान्ति तथा चोरोंके उपद्रवसे धनका नाश होता है । छत्र , ध्वज , पताका या सजल मेघखण्ड - सदृश अथवा स्फुलिङ्ग ( आग्निकण ) सहित धूम सूर्यमण्डलमें दीख पडे तो उस देशका नाश होता है । शुक्ल , लाल , पीला अथवा काला सूर्यमण्डल दीखनेमें आवे , तो क्रमसे ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र वर्णोंको पीडा होती है मुनिवर ! यदि दो , तीन या चार प्रकारके रंग सूर्यमण्डलमें दीख पडें , तो राजाओंका नाश होता है । यदि सूर्यकी ॠर्ध्वगामिनी किरण लाल रंगकी दीख पडे , तो सेनापतिका नाश होता है । यदि उसका पीला वर्ण हो तो राजकुमारका , श्वेत वर्ण हो तो राजपुरोहितका तथा उसके अनेक वर्ण हों तो प्रजाजनोंका नाश होता है । इसी तरह धूम्र वर्ण हो तो राजाका और पिशङ्ग ( कपिल ) वर्ण हो तो मेघका नाश होता है । यदि सूर्यकी उक्त किरणें नीचेकी ओर हों , तो संसारका नाश होता है ॥७ . १ / २॥
सूर्य शिशिर ऋतु ( माघ - फाल्गुन )- में ताँबेके समान ( लाल ) दीख पडे , तो संसारके लिये शुभ ( कल्याणकारी ) होता है । ऐसे ही वसन्त ( चैत्र - वैशाख )- में कुंकुमवर्ण , ग्रीष्ममें पाण्डु ( श्वेत - पीत - मिश्रित )- वर्ण , वर्षामें अनेक वर्ण , शरद - ऋतुमें कमलवर्ण तथा हेमन्तमें रक्तवर्णका सूर्यविम्ब दिखायी दे , तो उसे शुभप्रद समझना चाहिये । मुनिश्रेष्ठ नारद ! यदि शीतकालमें ( अगहनसे फाल्गुनतक ) सूर्यका बिम्ब पीला , वर्षामें ( श्रावणसे कार्तिकतक ) श्वेत ( उजला ) तथा ग्रीष्ममें ( चैत्रसे आषाढतक ) लाल रंगका दीख पडे , तो क्रमसे रोग , अवर्षण तथा भय उपस्थित करनेवाला होता है । यदि कदाचित्‌ सूर्यका आधा विम्ब इन्द्रधनुषके सदृश दीख पडे तो राजालोंमें परस्पर विरोध बढता है । खरगोशके रक्तके सदृश सूर्यका वर्ण हो तो शीघ्र ही राजाओंमें महायुद्ध प्रारम्भ होता है । यदि सूर्यका वर्ण मोरकी पाँखके समान हो , तो वहाँ बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं होती है । यदि सूर्य कभी चन्द्रमाके समान दिखायी दे , तो वहाँके राजाको जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है । यदि सूर्य श्याम रंगका दीख पडे तो कीडोंका भय होता है । भस्म समान दीख पडे तो समूचे राज्यपर भय उपस्थित होता है और यदि सूर्यमण्डलमें छिद्र दिखायी दे , तो वहाँके सबसे बडे सम्राटकी मृत्यु होती है । कलशके समान आकारवाला सूर्य देशमें भूखमरीका भय उपस्थित करता है । तोरण - सदृश आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरोंका नाशक होता है । छत्राकार सूर्य उदित हो तो देशका नाश और सूर्य - बिम्ब खण्डित दीख पडे तो राजाका नाश होता है ॥८ - १४॥
यदि सूर्योदय या सूर्यास्तके समय बिजलीकी गडगडाहट और वज्रपात एवं उल्कापात हो तो राजाका नाश या राजाओंमें परस्पर युद्ध होता है । यदि पंद्रह या साढे सात दिनतक दिनमें सूर्यपर तथा रातमें चन्द्रमापर परिवेष ( मण्डल ) हो अथवा उदय और अस्त - स्मयमे वह अत्यन्त रक्तवर्णका दिखायी दे , तो राजाका परिवर्तन होता है ॥१५ - १६॥ उदय या अस्तके समय यदि सूर्य शस्त्रके समान आकारवाले या गदहे , ऊँट आदिके सदृश अशुभ आकारवाले मेघसे खण्डित - सा प्रतीत हो तो राजाओंमें युद्ध होता है ॥१७॥
( चन्द्रश्रृङ्गोन्नति - फल — ) मीन तथा मेष राशिमें यदि ( द्वितीया - तिथिको उदयकालमें ) चन्द्रमाका दक्षिण श्रृङ्ग उन्नत ( ऊपर उठा ) हो तो वह शुभप्रद होता है । मिथुन और मकरमें यदि उत्तर श्रृङ्ग उन्नत हो तो उसे श्रेष्ठ समझना चाहिये । कुम्भ और वृषमें यदि दोनों श्रृङ्ग सम हों तो शुभ है । कर्क और धनुमें यदि श्रृङ्ग शरसदृश हो तो शुभ है । वृश्चिक और सिंहमें भी धनुष - सदृशा हो तो शुभ है तथा तुला और कन्यामें यदि चन्द्रमाका श्रृङ्ग शूलके सदृश दीख पडे तो शुभ फल समझना चाहिये । इससे विपरीत स्थितिमें चन्द्रमाका उदय हो तो उस मासमें पृथ्वीपर दुर्भिक्ष , राजाओंमें परस्पर विरोध तथा युद्ध आदि अशुभ फल प्रकट होते हैं ॥१८ - १९ - १ - २॥
पूर्वाषाढ , उत्तराषाढ , मूल और ज्येष्ठा - इन नक्षत्रोंमें चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशामें हो तो जलचर , वनचर और सर्पका नाश तथा अग्निका भय होता है । विशाखा और सनुराधामें यदि दक्षिणभागमें हो तो पापफल देनेवाला होता है । मघा और विशाखामें यदि चन्द्रमा मध्यभागमें होकर चले तो भी सौम्य ( शुभ )- प्रद होता है । रेवतीसे मृगशिरापर्यन्त ६ नक्षत्र ‘ अनागत ‘, आर्द्रासे अनुराधापर्यन्त बारह नक्षत्र ‘ मध्ययोगी ‘ और वासव ज्येष्ठा से नौ नक्षत्र ‘ गतयोगी ‘ हैं । इनमें भी चद्रमा उत्तर भागमें रहनेपर शुभप्रद होता है ॥२२ . १ / २॥
भरणी , ज्येष्ठा , आश्लेषा , आर्द्रा , शतभिषा और स्वाती ये अर्धभोग ( ४०० कला ), ध्रुव ( तीनों उत्तरा , राहिणी ), पुनर्वसु और विशाखा - ये सार्धैकभोग ( १२०० कला ) तथा अन्य नक्षत्र सम ( पूर्ण ) भोग ( ८०० कला ) हैं । साधारणतया चन्द्रमाकी दक्षिण श्रृङ्गोन्नति अशुभ और उत्तर श्रृङोन्नति शुभप्रद है । तिथिके अनुसार चन्द्रमामें शुक्ल न होकर यदि शुक्लतामें हानि ( कमी ) हो तो प्रजाके कार्योंमें हानि नौर शुक्लतामें वृद्धि ( अधिकता ) हो दो प्रजाजनकी वृद्धि होती है । समतामें समता समझनी चाहिये । यदि चन्द्रमाका विम्ब मध्यम मानसे विशाल ( बडा ) देखनेमें आवे तो सुभिक्षकारक ( सस्ती लानेवाला ) और छोटा दीख पडे तो दूर्भिक्षकारक ( महँगी या अकाल लानेवाला ) होता है । चन्द्रमाका श्रृङ्ग अधोमुख हो तो शस्त्रका भय लाता है । दण्डाकर हो तो कलह ( राज - प्रजामें युद्ध ) होता है । चन्द्रमाका श्रृङ्ग अथवा बिम्ब मङ्गलादि ग्रहों ( मङ्गल , बुध , गुरु , शुक्र तथा शनि )- से आहत ( भेदित ) दीख पडे तो क्रमश : क्षेम , अन्नादि , वर्षा , राजा और प्रजाका नाश होता है ॥२६ . १ / २॥
( भौम - चार - फल — ) जिस नक्षत्रमें मङ्गलका उदय हो , उससे सातवें , या नवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह ‘ उष्ण ‘ नामक वक्र होता है । उसमें प्रजाको पीडा और अग्निका भय प्राप्त होता है । यदि उदयके नक्षत्रसे दसवें , ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्रमें मङगल वक्र हो तो वह ‘ अश्वमुख ‘ नामक वक्र होता है । उसमें अन्न और वर्षाका नाश होता है । यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो ‘ व्यालमुख ‘ वक्र कहलाता है । उसमें बी अन्न और वर्षाका नाश होता है । पंद्रहवें या सोलहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो ‘ रुधिरमुख ‘ वक्र कहलाता है । उसमें मङ्गल दुर्भिक्ष , क्षुधा तथा रोगको बढाता है । सत्रहवें या अट्ठारहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह ‘ मुसल ‘ नामक वक्र होता है । उससे धन - धान्यका नाश तथा दुर्भिक्षका भय होता है । यदि मङ्गल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफल्गुनी नक्षत्रमें उदित होकर उत्तराषाढमें वक्र हो तथा रोहिणीमें अस्त हो तो तीनों लोकोंके लिये नाशकारी होता है । यदि मङ्गल श्रवणमें उदित होकर पुष्यमें वक्रगति हो तो धनकी हानि करनेवाला होता है ॥२७ - ३३॥
मङ्गल जिस दिशामें उदित होता है , उस दिशाके राजाके लिये भयकारक होता है । यदि मघा - नक्षत्रके मध्य होकर चलता हुआ मङ्गल उसीमें वक्र हो जया तो अवर्षण ( वर्षाका अभाव ) और शस्त्रका भय लाता है तथा राजाके लिये विनाशकारी होता है । यदि मङ्गल मघा , विशाखा , या रोहिणीके योगताराका भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष , मरण तथा रोग लानेवाला होता है । उत्तरा फाल्गुनी , उत्तराषाढ , उत्तर भाद्रपद , रोहिणी , मूल , श्रवण और मृगशिरा - इन नक्षत्रोंके बीचमें तथा रोहिणीके दक्षिण होकर मङ्गकर चले तो अनावृष्टिकारक होता है । मङ्गल सब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल देनेवाला तथा प्रजामें कलह उत्पन्न करनेवाला होता है ॥३७ . १ / २॥
( बुध - चार - फल — ) यदि कदाचित्‌ आँधी , मेघ आदि उत्पात न होनेपर ( शुद्ध आकाशमें ) भी बुधका उदय देखनेमें न आवे तो अनावृष्टि , अग्निभय , अनर्थ और राजाओंमें युद्धकी सम्भावना समझनी चाहिये । धनिष्ठा , श्रवण , उत्तराषाढ , मृगशिरा और रोहिणीमें चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो वह लोकमें बाधा और अनावृष्टि आदिके द्वारा भयकारी होता है । यदि आर्द्रा , पुनर्वसु , पुष्य , आश्लेषा और मघा - इन नक्षत्रोंमें बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष , कलह , रोग तथा अनावृष्टि आदिका भय उपस्थित करनेवाला होता है । हस्तसे छ : ( हस्त , चित्रा , स्वाती , विशाखा , अनुराधा तथा ज्येष्ठा ) नक्षत्रोंमें बुधके रहनेसे लोकमें कल्याण , सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है । उत्तर भाद्रपद , उत्तरा फाल्गुनी , कृत्तिका और भरणीमें विचरनेवाला बुध वैद्य , घोडे और व्यापारियोंका नाश करनेवाला होता है । पूर्वा फाल्गुनी , पूर्वाषाढ और पूर्व भाद्रपदमें विचरता हुआ बुध यदि इन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो क्षुधा , शस्त्र , अग्नि और चोरोंसे प्राणियोंको भय प्राप्त होता है ॥४३ . १ / २॥
भरणी , कृत्तिका , रोहिणी और स्वाती - इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति ‘ प्राकृतिकी ‘ कही गयी है । आर्द्रा , मृगशिरा , आश्लेषा और मघा - इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति ‘ मिश्रा ‘ मानी गयी है । पूर्वा फाल्गुनी , उत्तरा फाल्गुनी , पुष्य और पुनर्वसु - इनमें बुधकी ‘ सक्षिप्ता ‘ गति कही गयी । पूर्व भाद्रपद , उत्तर भाद्रपद , रेवती और अश्विनी - इनमें बुधकी ‘ तीक्ष्णा ‘ गति होती है । उत्तराषाढ , पूर्वाषाढ और मूलमें उनकी ‘ योगान्तिका ‘ गति मानी गयी है । श्रवण , चित्रा , धनिष्ठा और शतभिषामें ‘ घोरा ‘ गति और विशाखा , अनुराधा तथा हस्ता - इन नक्षत्रोंमें बुधकी ‘ पाप ‘ संज्ञक गति होती है । इन प्राकृत आदि सात प्रकारकी गतियोंमें उदित होनेपर जितने दिनतक बुध दृश्य रहता है , उतने ही दिन उनमें अस्त होनेपर अदृश्य रहता है । उन दिनोंकी संख्या क्रमसे ४० , ३० , २२ , १८ , ९ , १५ और ११ है । बुध जब प्राकृत गतिमें रहता है , तब संसारमें कल्याण , आरोग्य और सुभिक्ष ( अन्न - वस्त्र आदिकी वृद्धि ) करता है । मिश्र और संक्षिप्त गतिमें मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियोंमें अनावृष्टि ( दुर्भिक्ष )- कारक होता है । वैशाख , श्रावण , पौष और आषाढमें उदित होनेपर बुध पापरूप फल देता है औरा अन्य मासोंमें उदित होनेपर वह शुभ फल देता है । आश्विन और कार्तिकमें बुधका उदय हो तो शस्त्र , दुर्भिक्ष और अग्निका भय प्राप्त होता है । यदि उदित हुए बुधकी कान्ति चाँदी अथवा स्फटिकके समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देनेवाला होता है ॥४४ - ५२॥
( बृहस्पति - चार - फल — ) कृत्तिका आदि दो - दो नक्षत्रोंके आश्रयसे कार्तिक आदि मास होते हैं ; परंतु अन्तिम ( आश्विन ), पञ्चम ( फाल्गुन ) और एकादश ( भाद्रपद )- ये तीन नक्षत्रोंसे पूर्ण होते हैं । इसी प्रकार बृहस्पतिका जिन नक्षत्रोंमें उदय होता है , उन नक्षत्रोंसे ( मासके अनुसार ही ) संवत्सरोंके नाम होते हैं । उन संव्त्सरोंमें कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियोंके लिये अशुभ फलदायक होते हैं । पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देनेवाले होते हैं । पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देनेवाले होते हैं। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्य ( शुभ - अशुभ दोनों ) फल देते हैं । वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देते हैं । वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देनेवाला होता है । आषाढ मध्यम और श्रावण श्रेष्ठ होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता ; परंतु आश्विन संवत्सर तो प्रजाजनोंके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ होता है । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार संवत्सरोंका फल समझना चाहिये ॥५५ . १ / २॥
बृहस्पति जब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चलता है , तब संसारमें कल्याण , आरोग्य तथा सुभिक्ष करनेवाला होता है। जब नक्षत्रोंके दक्षिण होकर चलता है , तब विपरीत परिणाम ( अशुभ , रोगवृद्धि तथा दुर्भिक्ष ) उपस्थित करता है तथा जब मध्य होकर चलता है , उस समय मध्यम फल प्रस्तुत करता है । गुरुका विम्ब यदि पीतवर्ण , अग्निसदृश , श्याम , हरित और लाल दिखायी दे तो प्रजाजनोंमें क्रमश : व्याधि , अग्नि , चोर , शस्त्र और अस्त्र का भय उपस्थित होता है । यदि गुरुका वर्ण धूएँके समान हो तो वह अनावृष्टिकारक होता ह । यदि गुरु दिनमें ( प्रात :- सायं छोडकर ) दृश्य हो तो राजाका नाश , रोगभय अथवा राष्ट्रका विनाश होता है । कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सरके शरीर हैं । पूर्वाषाढ और उत्तराषाढ ये दोनों नाभि हैं , आर्द्रा ह्रदय और मघा संवत्सरका पुष्प है । यदि शरीर पापग्रहसे पीडित तो तो दुर्भिक्ष , अग्नि और वायुका भय उपस्थित होता है । नाभि पापग्रहसे युक्त हो तो क्षुधा और तृषासे पीडा होती है । पुष्प पापग्रहसे आक्रान्त हो तो मूल और फलोंका नाश होता है । यदि हृदय - नक्षत्र पापग्रहसे पीडित हो तो अन्नादिका नाशा होता है । शरीर आदि शुभग्रहसे संयुक्त हों तो सुभिक्ष और क्ल्याणादि शुभ फल प्राप्त होते हैं ॥५६ - ६१॥ यदि मघा आदि नक्षत्रोंमें बृहस्पति हो तो वह क्रमश : शस्य - वृद्धि , प्रजामें आरोग्य , युद्ध , अनावृष्टि , द्विजातियोंको पीडा , गौओंको सुख , राजाओंको सुख , स्त्री - समाजको सुख , वायुका अवरोध , अनावृष्टि , सर्पभय , सुवृष्टि , स्वास्थ्य , उत्सववृद्धि , महार्घ , सम्पत्तिकी वृद्धि , देशका नाश , अतिवृष्टि , निर्वैरता , रोग - वृद्धि , भयकी हानि , रोगभय , अन्नकी वृद्धि , वर्षा , रोगकी वृद्धि , धान्यकी वृद्धि और अनावृष्टिरूप फल देता है ॥६२ - ६४॥
( शुक्र - चार - फल — ) शुक्रके तीन मार्ग हैं - सौम्य ( उत्तरा ), मध्य और याम्य ( दक्षिण ) । इनमेंसे प्रत्येकमें तीन - तीन वीथियाँ हैं और एक - एक वीथीमें बारी - बारीसे तीन - तीन नक्षत्र आते हैं । इन नक्षत्रोंको अश्वनीसे आरम्भ करके जानना चाहिये । इस प्रकार उत्तरसे दक्षिणतक शुक्रके मार्गमें क्रमश : नाग , इभ , ऐरावत , वृष , उष्ट्र , खर , मृग , अज तथा दहन - ये नु वीथियाँ हैं ॥६५ - ६६॥ उत्तरमार्गकी तीन वीथियोंमें विचरण करनेवाला शुक्र धान्य , धन , वृष्टि और शस्य ( अन्नकी फस्ल )- इन सब वस्तुओंको पुष्ट एवं परिपूर्ण करता है । मध्यमार्गकी जो तीन वीथियाँ हैं , उनमें शुक्रके जानेसे सब अशुभ ही फल प्राप्त होते हैं । मघासे पाँच नक्षत्रोंसें जब शुक्र जाता है तो पूर्व दिशामें उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकारक तथा शुभप्रद होता है । स्वातीसे तीन नक्षत्रतक जब शुक्र रहता है तब पश्चिम दिशा ( देश )- में मेघ सुवृष्टिकारक और शुभदायक होता है । शेष सब नक्षत्रोंमें उसका फल विपरीत ( अनावृष्टि और दुर्भिक्ष करनेवाला ) होता है । शुक्र जब बुधके साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता है । कृष्णपक्षकी अष्टमी , चतुर्दशी और अमावास्यामें यदि शुक्रका उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जलसे परिपूर्ण होती है । गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशिमें हों तथा एक पूर्व वीथीमें और दूसरा पश्चिम वीथीमें विद्यमान हो तो वे दोनों देशमें अनावृष्टि तथा दुर्भिक्ष लानेवाले और राजाओंमें परस्पर युद्ध करानेवाले होते हैं । मङ्गल , बुध , गुरु और शनि यदि शुक्रसे आगे होते हैं तो युद्ध , अतिवायु , दुर्भिक्ष और अनावृष्टि करनेवाले होते हैं ॥६७ - ७२॥ पूर्वाषाढ , अनुराधा , उत्तरा फाल्गुनी , आश्लेषा , ज्येष्ठा - इन नक्षत्रोंमें शुक्र हो तो वह सुभिक्षकारक होता है । मूलमें हो तो शस्त्रभय और अनावृष्टि देनेवाला होता है। उत्तर भाद्रपद और रेवतीमें शुक्रकें रहनेपर भय प्राप्त होता है ॥७३॥
( शनि - चार - फल — ) श्रवण , स्वाती , हस्त , आर्द्रा , भरणी और पूर्वा फाल्गुनी - इन नक्षत्रोंमें विचरनेवाला शनि मनुष्योंके लिये सुभिक्ष , आरोग्य तथा खेतीकी उपज बढानेवाला होता है ॥७४॥ जन्मनक्षत्रसे प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि चक्रके मुखमें एक , गुदामें दो , सिरमें तीन , नेत्रोंमें दो , हृदयमें पाँच , बायें हाथमें चार , बायें पैरमें तीन , दक्षिण पादमें तीन तथा दक्षिण हाथमें चार - इस तरह नक्षत्रोंकी स्थापना करे । शनिका वर्तमान नक्षत्र जिस अङ्गमे पडे , उसका फल निम्नलिखितरूपसे जानना चाहिये । शनि - नक्षत्र मुखमें हो तो रोग , गुदामें हो तो लाभ , सिरमें हो तो हानि , नेत्रमें हो तो लाभ , ह्रदयमें हो तो सुख , बायें हाथमें हो तो बन्धन , बायें पैरमें हो तो परिश्रम , दाहिने पैरमें हो तो श्रेष्ठ यात्रा और दाहिने हाथमें हो तो धन - लाभ होता है । इस प्रकार क्रमश : फल कहे गये हैं ॥७५ - ७७॥ बहुधा वक्रगामी होनेपर शनि इन फलोंकी प्राप्ति कराता ही है। यदि वह सम मार्गपर हो तो फल भी मध्यम होता है और यदि वह शीघ्रगति हो तो उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥७८॥
( राहु - चार - फल — ) भगवान्‌ विष्णुने अपने चक्रसे राहुका मस्तक काट दिया तो भी अमृत पी लेनेके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई ; अत : उसे ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥७९॥ वह ब्रह्माजीके वरसे सम्पूर्ण पर्वों ( पूर्णिमा और अमावास्या )- के समय चन्द्रमा और सूर्यको पीडा देता है ; किंतु ‘ शर ‘ तथा ‘ अवनति ‘ अधिक होनेके कारण वह उन दोनोंसे दूर ही रहता है ॥८०॥ एक सूर्यग्रहणके बाद दूसरे सूर्यग्रहणका तथा एक चन्द्रग्रहणके बाद दूसरे चन्द्रग्रहणका विचार छ : मासपर पुन : कर लेना चाहिये । प्रति छ : मासपर क्रमश : ब्रह्यादि सात देवता पर्वेश ( ग्रहणके अधिपति ) होते हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं - ब्रह्मा , चन्द्रमा , इन्द्र , कुबेर , वरुण , अग्नि तथा यम । ब्राह्मपर्वमें ग्रहण होनेपर पशु , धान्य और द्विजोंकी वृद्धि होती है ॥८१ - ८२॥ चन्द्रपर्वमें ग्रहण हो तो भी ऐसा ही फल होता है ; विशेषता इतनी ही है कि लोगोंको कफसे पीडा होती है । इन्द्रपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओंमें विरोध , जगत्‌में दुःख तथा खेती - बारीका नाश होता है । वारुणपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओंका अकल्याण और प्रजाजनोंका कल्याण होता है ॥८३ - ८४॥ अग्निपर्वमें ग्रहण हो तो वृष्टि , धान्यवृद्धि तथा कल्याणकी प्राप्ति होती है और यमपर्वमें ग्रहण होनेपर वर्षाका अभाव , खेतीकी हानि तथा दुर्भिक्षरूप फल प्राप्त होते हैं ॥८५॥ वेलाहीन समयमें अर्थात्‌ वेलसे पहले ग्रहण हो तो खेतीकी हानि तथा राजाओंको दारुण भय प्राप्त होता है और ‘ अतिवेल ‘ कालमें अर्थात्‌ वेला बिताकर ग्रहण हो तो फूलोंकी हानि होती है , जगत्‌में भय होता है और खेती चौपट हो जाती है ॥८६॥ जब एक ही मासमें चन्द्रमा - सूर्य - दोनोंका ग्रहण हो तो रजाओंमें विरोध होता है तथा धन और वृष्टिका विनाश होता है ॥८७॥ ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्यका उदय अथवा अस्त हो तो वे राजाओं और धान्योंका विनाश करनेवाले होते हैं । यदि चन्द्रमा और सूर्यका सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भूखमरी , रोग तथा अग्निका भय उपस्थित करनेवाले होते हैं ॥८८॥ उत्तरायणमें ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी हानि होती है तथा दक्षिणायनमें ग्रहण होनेपर अन्य वर्णके लोगोंको हानि पहुँचती है । सूर्य या चन्द्रमाके विम्बके उत्तर , पूर्व आदि भागमें यदि राहुका दर्शन हो ( स्पर्श देखनेमें आवे ) तो वह क्रमश : ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्रोंको हानि पहुँचाता है ॥८९॥ इसी तरह ग्रहणके समय ग्रासके और मोक्षके भी दस - दस भेद होते हैं ; जिनकी सूक्ष्म गतिको देवता भी नहीं जान सकते , फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ॥९०॥ गणितद्वारा ग्रहोंको लाकर उनके ‘ चार ‘ ( गतिमान , स्पर्श और मोक्ष कालकी स्थिति )- पर विचार करना चाहिये । जिससे उन ग्रहोंद्वारा ग्रहणकालके शुभ और अशुभ लक्षण ( फल )- को हम देख और जान सकें ॥९१॥ अत : बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि उस समयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अनुसंधान करे । धूम - केतु आदि तारोंका उदय और अस्त मनुष्योंके लिये उत्पातरूप होता है ॥९२॥ वे उत्पात दिव्य , भौम और अन्तरिक्ष भेदसे तीन प्रकारके हैं । वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके फल देनेवाले हैं । आकाशमें यज्ञकी ध्वजा , अस्त्र - शस्त्र , भवन और बडे हाथीके सदृश तथा खंभा , त्रिशूल और अङ्कुश - इन वस्तुओंके समान जो केतु दिखायी देते हैं , उन्हें ‘ आन्तरिक्ष ‘ उत्पात कहते है । साधारण ताराके समान उदित होकर किसी नक्षत्रके साथ केतु हो तो ‘ दिव्य ‘ उत्पात कहा गया है । भूलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले ( भूकम्प आदि ) उत्पातोंको ‘ भौम ‘ उत्पात कहते हैं ॥९३ - ९४॥ केतुतारा एक होकर भी प्राणियोंको अशुभ फल देनेके लिये भिन्न - भिन्न रूप धारण करता है । जितने दिनोंतक आकाशमें विविधरूपधारी केतु देखनेमें आता है , उतने ही मास या सौर वर्षोंतक वह अपना शुभाशुभ फल देता है । जो दिव्य केतु हैं , वे सदा प्राणियोंको विविध फल देनेवाले होते हैं ॥९५ - ९६॥ ह्नस्व , चिकना और प्रसन्न ( स्वच्छ ) श्वेत रङ्गका तेतु सुवृष्टि देता है । शीघ्र अस्त होनेवाला विशाल केतु अवृष्टि देता है ॥९७॥ इन्द्रधनुषके समान कान्तिवाला धूमकेतु तारा अनिष्ट फल देता है । दो , तीन या चारू रूपोंमें प्रकट त्रिशूलके समान आकारवाला केतु राष्टुका विनाशक होता है ॥९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशामें सूर्य - सम्बन्धी केतु मणि , हार एवं सूवर्णके समान देदीप्यमान दीखायी दे तो उन दिशाओंके राजाओंकी हानि होती है ॥९९॥ पलाश , विम्बफल , रक्त और तोतेकी चोंच आदिके समान वर्णका केतु अग्निकोणमें उदित हो तो शुभ फल देनेवाला होता है ॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतुओंकी कान्ति जल एवं तेलके समान होती है । वे भूखमरीका भय देनेवाले हैं । चन्द्रजनित केतुओंका वर्ण श्वेट होता है । वे सुभिक्ष और कल्याण प्रदान करनेवाले होते हैं ॥१०१॥ ब्रह्मदण्डसे उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओंसे युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित ( आन्तरिक्ष ) केतु प्रजाओंका विनाश करनेवाला माना गया है ॥१०२॥ यदि ईशानकोणमें श्वेतवर्णके शुक्रजनित केतु उदित हों तो वे अनिष्ट फल देनेवाले होते हैं । शिखारहित एवं कनकनामसे प्रसिद्ध शनैश्चरसम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं ॥१०३॥ गुरुसम्बन्धी केतुओंकी विकच संज्ञा है । वे दक्षिण दिशामें प्रकट होनेपर भी अभीष्ट साधक माने गये हैं । उसी दिशामें सूक्ष्म तथा शुक्लवर्णवाले बुधसम्बन्धी केतु हों तो वे चोर त्था रोगका भय प्रदान करनेवाले हैं ॥१०४॥ कुङ्कुनामसे प्रसिद्ध मङ्गल - सम्बन्धी केतुल लाल रंगके होते हैं । उनकी आकृति सूर्यके समान होती है । वे भी उक्त दिशामें उदित होनेपर अनिष्टदायक होते हैं । अग्निके समान कान्तिवाले अग्निम्बन्धी केतु विश्वरूप नामसे प्रसिद्ध हैं । वे अग्निकोणमें उदित होनेपर सुखद होते हैं ॥१०५॥ श्याम वर्णवाले सूर्यसम्बन्धी केतु अरुण कहलाते हैं । वे पाप अर्थात्‌ दुःख देनेवाले होते हैं । रीछके समान रंगवाले शुक्रसम्बन्धी केतु शुभदायक होते हैं ॥१०६॥ कृत्तिका तारामें उदित हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजाजनोंका नाश करता है । राजमहल , वृक्ष और पर्वतपर प्रकट हुआ केतु राजाओंका नाश करनेवाला होता है ॥१०७॥ कुमुद पुष्पके समान वर्णवाला कौमुद नामक केतु सुभिक्ष लानेवाला होता है । संध्याकालमें मस्तकसहित उदित हुआ गोलाकार केतु अनिष्ट फल देनेवाला होता है ॥१०८॥
( कालमान — ) ब्राह्म , दैव , मानव , पित्र्य , सौर , सावन , चान्द्र , नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य - ये नौ मान होते हैं ॥१०९॥ इस लोकमें इन नौ मानोंमेंसे पाँचके ही द्वारा व्यवहार होता है । किंतु उन नवों मानोंका व्यवहारके अनुसार पृथक्‌ - पृथक्‌ कार्य बताया जायगा ॥११०॥ सौर मानसे ग्रहोंकी सब प्रकारकी गति ( भगणादि ) जाननी चाहिये। वर्षाका समय तथा स्त्रीके प्रसवका समय सावन मानसे ही ग्रहण किया जाता है ॥१११॥ वर्षोंके भीतरका घटीमान आदि नाक्षत्र मानसे ही लिया जाता है । यज्ञोपवीत , मुण्डन , तिथि एवं वर्षेशका निर्णय तथा पर्व , उपवास आदिका निश्चय चान्द्र मानसे किया जाता है । बार्हस्पत्य मानसे प्रभवादि संवत्सरका स्वरूप ग्रहण किया जाता है ॥११२ - ११३॥ उन - उन मानोंके अनुसार बारह महीनोंका उनका अपना - अपना विभिन्न वर्ष होता है । बृहस्पतिकी अपनी मध्यम गतिसे प्रभव आदि नामवाले साठ संवत्सर होते हैं ॥११४॥ प्रभव , विभव , शुक्ल , प्रमोद , प्रजापति , अङ्गिरा , श्रीमुख , भाव , युवा , धाता , ईश्वर , बहुधान्य , प्रमाथी , विक्रम , वृष , चित्रभानु , सुभानु , तारण , पार्थिव , व्यय , सर्वजित , सर्वधारी , विरोधी , विकृत , खर , नन्दन , विजय , जय , मन्मथ , दुर्मुख , हेमलम्ब , विलम्ब , विकारी , शर्वरी , प्लव , शुभकृत्‌ , शोभन , क्रोधी , विश्वावसु , पराभव , प्लवङ्ग , कीलकम सौम्य , समान , विरोधकृत्‌ , परिभावी , प्रमादी , आनन्द , राक्षस , अनल , पिङ्गल , कालयुक्त सिद्धार्थ , रौद्र , दुर्मति , दुन्दुभि , रुधिरोद्रारी , रक्ताक्ष , क्रोधन तथा क्षय - ये साठ संवत्सर जानने चाहिये । ये सभी अपने नामके अनुरूप फल देनेवाले हैं । पाँच वर्षोंका युग होता है । इस तरह साठ संवत्सरोंमें बारह युग होते हैं ॥११५ - २१२॥ उन युगोंके स्वामी क्रमश : इस प्रकार जानने चाहिये - विष्णु , बृहस्पति , इन्द्र , लोहित , त्वष्टा , अहिर्बुध्न्य , पितर , विश्वेदेव , चन्द्रमा , इन्द्राग्नि , अश्विनीकुमार तथा भग। इसी प्रकार युगके भीतर जो पाँच वर्ष होते हैं , उनके स्वामी क्रमश : अग्नि , सूर्य , चन्द्रमा , ब्रह्मा और शिव हैं ॥१२२ - १२३॥
संवत्सरके राजा , मन्त्री तथा धान्येशरूप ग्रहोंके बलाबलका विचार करके तथा उनकी तात्कालिक स्थितिको भी भलीभाँति जानकर संवत्सरका फल समझना चाहिये ॥१२४॥ मकरादि छ : राशियोंमें छ : मासतक सूर्यके भोगसे सौम्यायन ( उत्तरायण ) होता है। वह देवताओंका दिन और कर्कादि छ : राशियोंमें छ : मासतक सूर्यके भोगसे दक्षिणायन होता है , वह देवताओंकी रात्रि है ॥१२५॥ गृहप्रवेश , विवाह , प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभकर्म माघ आदि उत्तरायणके मासोंमें करने चाहिये ॥१२६॥ दक्षिणायनमें उक्त कार्य गर्हित ( त्याज्य ) माना गया है , अत्यन्त आवश्यकता हो तो उस समय पूजा आदि यत्न करनेसे शुभ होता है । माघसे दो - दो मासोंकी शिशिरादि छ : ऋतुएँ होती हैं ॥१२७॥ मकरसे दो - दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमश : शिशिर , वसन्त और ग्रीष्म - ये तीन ऋतुएँ उत्तरायणमें होती हैं और कर्कसे दो - दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमश : वर्षा , शरद्‌ और हेमन्त - ये तीन ऋतुएँ दक्षिणायनमें होती हैं ॥१२८॥ शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे अमावास्यातक ‘ चान्द्र मास ‘ होता है । सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितक ‘ सौर मास ‘ होता है । तीस दिनोंका एक ‘ सावन मास ‘ होता है और चन्द्रमाद्वारा सब नक्षत्रोंके उपभोगमें जितने दिन लगते हैं , उतने अर्थात्‌ २७ दिनोंका एक ‘ नाक्षत्र मास ‘ होता है ॥१२९॥ मधु , माधव , शुक्र , शुचि , नभ :, नभस्य , इष , उर्ज , सहा :, सहस्य , तप और तपस्य - ये चैत्रादि बारह मासोंकी संज्ञाएँ हैं । जिस मासकी पौर्णमासी जिस नक्षत्रसे युक्त हो , उस नक्षत्रके नामसे ही उस मासका नामकरण होता है । ( जैसे जिस मासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्रासे युक्त होती है , उस मासका नाम ‘ चैत्र ‘ होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नामसे विख्यात होती है , जैसे चैत्री , वैशाखी आदि ) । प्रत्येक मासके दो पक्ष क्रमश : देवपक्ष और पितृपक्ष हैं , अन्य विद्वान्‌ उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं ॥१३० - १३२॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्योंमें सदा उपयुक्त माने जाते हैं । ब्रह्मा , अग्नि , विरञ्चि , विष्णु , गौरी , गणेश , यम , सर्प , चन्द्रमा , कार्तिकेय , सूर्य , इन्द्र , महेन्द्र , वासव , नाग , दुर्गा , दण्डधर , शिव , ( विष्णु , काम और शिव )- ये सब शुक्ल प्रतिपदासे लेकर क्रमश : उनतीस तिथियोंके स्वामी होते हैं । अमावास्या नामक तिथिके स्वामी पितर माने गये हैं ।
( तिथियोंकी नन्दादि पाँच संज्ञा — ) प्रतिपदा आदि तिथियोंकी क्रमश : नन्दा , भद्रा , जया , रिक्ता और पूर्णा - ये पाँच संज्ञाएँ मानी गयी हैं । पंद्रह तिथियोंमें इनकी तीन आवृत्ति करके इनका पृथक - पृथक्‌ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । शुक्लपक्षमें प्रथम आवृत्तिकी ( १ , २ , ३ , ४ , ५ - ये ) तिथियाँ अधम द्वितीय आवृत्तिकी ( ६ , ७ , ८ , ९ , १० - ये ) तिथियाँ मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी ( ११ , १२ , १३ , १४ , १५ - ये ) तिथियाँ शुभ होती हैं । इसी प्रकार कृष्णपक्षकी प्रथम आवृत्तिकी नन्दादि तिथियाँ इष्ट ( शुभ ), द्वितीय आवृत्तिकी मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी अनिष्टप्रद ( अधम ) होती हैं । दोनों पक्षोंकी ८ , १२ , ६ , ४ , ९ , १४ - ये तिथियाँ पक्षरन्ध्र कही गयी हैं। इन्हें अत्यन्त रूक्ष कहा गया है । इनमें क्रमश : आरम्भकी ४ , १४ , ९ , ९ , २५ और ५ घडियाँ सब शुभ कार्योंमें त्याग देने योग्य हैं । अमावास्या और नवमीको छोडकर अन्य सब विषम तिथियाँ ( ३ , ५ , ११ , १३ ) सब कार्योंसे प्रशस्त हैं । शुक्लपक्षकी प्रतिपदा मध्यम है ( कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा शुभ है ) ।
षष्ठीमें तैल , अष्टमीमें मांस चतुर्दशीमें क्षौर एवं पूर्णिमा और अमावास्यामें स्त्रीका सेवन त्याग दे । अमावास्या , षष्ठी , प्रतिपदा , द्वादशी , सभी पर्व और नवमी - इन तिथियोंमें कभी दातौन नहीं करना चाहिये । व्यतीपात , संक्रान्ति , एकादशी , पर्व , रवि और मङ्गलवार तथा षष्ठी तिथि और वैधृति - योगमें अभञ्जन ( उबटन )- का निषेध है । जो मनुष्य दशमी तिथिमें आँवलेसे स्नान करता है , उसको पुत्रकी हानि उठानी पडती है । त्रयोदशीको आँवलेसे स्नान करनेपर धनका नाश होता है और द्वीतीयाको उससे स्नान करनेवालोंके धन और पुत्र दोनोंका नाश होता है । इसमें संशय नहीं है । अमावास्या , नवमी और सप्तमी - इन तीन तिथियोंमें आँवलेसे स्नान करनेवालोंके कुलका विनाश होता है ॥१४४ . १ / २॥
जो पूर्णिमा दिनमें पूर्ण चन्द्रमसे युक्त हो ( अर्थात्‌ जिसमें रात्रिके समय चन्द्रमा कलाहीन हो ) वह पूर्णिमा ‘ अनुमती ‘ कहलाती है और जो रात्रिमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो वह ‘ राका ‘ कहलाती है । इसी प्रकार अमावास्या भी दो प्रकारकी होती है । इसी प्रकार अमावास्या भी दो प्रकारकी होती है । जिस्में चन्द्रमाकी किंचित्‌ कलाका अंश शेष रहता है , वह ‘ सिनीवाली ‘ कही गयी है तथा जिसमें चन्द्रमाकी सम्पूर्ण कला लुप्त हो जाती है , वह अमावास्या ‘ कुहू ‘ कहलाती है ॥१४५ - १४६॥
( युगादि तिथियाँ — ) कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी सत्ययुगकी आदि तिथि है ( इसी दिन सत्य्युगका प्रारम्भ हुआ था ), वैशाख शुक्लपक्षकी पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुगकी आदि तिथि है । माघकी अमावास्या द्वापरयुगकी आदि तिथि और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगकी आदि तिथि है । ( ये सब तिथियाँ अति पुण्य देनेवाली कही गयी हैं ) ॥१४७ - १४८॥
( मन्वादि तिथियाँ — ) कार्तिकशुक्ला द्वादशी , अश्विनशुक्ला नवमी , चैत्रशुक्ला तृतीया , भाद्रपदशुक्ला तृतीया , पौषशुक्ला एकादशी , आषाढशुक्ला दशमी , माघशुक्ला सप्तमी , भाद्रपदकृष्णा अष्टमी , श्रावणकी अमावास्या , फाल्गुनकी पूर्णिमा , आषाढकी पूर्णिमा , कार्तिककी पूर्णिमा , ज्येष्ठकी पौर्णमासी और चैत्रकी पूर्णिमा - ये चौदह मन्वादि तिथियाँ हैं । ये सब तिथियाँ मनुष्योंके लिये पितृकर्म ( पार्वण - श्राद्ध )- में अत्यन्त पुण्य देनेवाली हैं ॥१४९ - १५१ - १ - २॥
( गजच्छाया - योग — ) भादोंके कृष्णपक्षकी ( शुक्लादि क्रमसे भाद्रकृष्ण और कृष्णादि क्रमसे आश्विन कृष्ण पक्षकी ) त्रयोदशीमें यदि सूर्य हस्त - नक्षत्रमें और चन्द्रमा मघामें हो तो ‘ गजच्छाया ‘ नामक योग होता है ; ओ पितरोंके पार्वणादि श्राद्ध कर्ममें अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला है ॥१५२ . १ / २॥
किसी एक दिनमें तीन तिथियोंका स्पर्श हो तो क्षयतिथि तथा एक ही तिथिका तीन दिनमें स्पर्श हो तो अधिक तिथि ( अधितिथि ) होती है । ये दोनों ही निन्दित हैं । जिस दिन सूर्योंदयसे सूर्यास्तपर्यन्त जो तिथि रहती है , उस दिन वह ‘ अखण्ड तिथि ‘ कहलाती है । यदि सूर्यास्तसे पूर्व ही समाप्त होती है तो वह ‘ खण्ड तिथि ‘ कही जाती है ॥१ / २ . १५४॥
( क्षणतिथिकथन — ) प्रत्येक तिथिमें तिथि - मानका पंद्रहवाँ भाग ‘ क्षणतिथि ‘ कहलाता है । ( अर्थात्‌ प्रयेक तिथिमें उसी तिथेसे आरम्भ करके पंद्रह तिथियोंके अन्तर्भोग होते हैं ) । तथा उन क्षणतिथियोंका भी आधा क्षण तिथ्यर्ध ( क्षण
होते हैं। दिनमानका पंद्रहवाँ भाग दिनके मुहूर्तका मान है और रात्रिमानका पंद्रहवाँ भाग रात्रिके मुकूर्तका मान समझना चाहिये : इनसे दिन तथा रात्रिमें क्षण - नक्षत्रका विचार करे ॥२२४ - २२६ - १ - २॥
वारोंमें निन्द्य मुहूर्त—रविवारको अर्यमा , सोमवारको ब्राह्म तथा राक्षस , मङ्गलवारको पितर और अग्नि , बुधवारको अभिजित्‌ , गुरुवारको राक्षस और जल , शुक्रवारको ब्राह्म और पितर तथा शनिवारको शिव और सर्प मुहूर्त निन्द्य माने गये हैं ; इसलिये इन्हें शुभ कार्योंमें त्याग देना चाहिये ॥२२७ - २२८॥
मुहूर्तका विशेष प्रयोजन—जिस - जिस नक्षत्रमें यात्रा आदि जो - जो कर्म शुभ या अशुभ कहे गये हैं ; वे कार्य उस - उस नक्षत्रके स्वामीके मुहूर्तमें भी शुभ या अशुभ होते हैं। ऐसा समझकर उस मुहूर्तमें सदा वैसे कार्य करने या त्याग देने चाहिये ॥२२९॥
भूकम्पादि संज्ञाओंसे युक्त नक्षत्र—सूर्य जिस नक्षत्रमें हो , उससे सातवें नक्षत्रकी भूकम्प , पाँचवेंकी विद्युत , आठवेकी शूल , दसवेंकी अशनि , अठारहवेंकी केतु , पंद्रहवेंकी शूल , दसवेंकी अशनि , अठारहवेंकी केतु , पंद्रहवेंकी दण्ड , उन्नीसवेंकी उल्का , चौदहवेंकी निर्घातपात , इक्कीसवेंकी मोह , बाईसवेंकी निर्घात , तेईसवेंकी कम्प , चौबीसवेंकी कुलिश तथा पचीसवेंई परिवेष संज्ञा समझनी चाहिये ; इन संज्ञाओंसे युक्त चन्द्र - नक्षत्रोंमें शुभ कर्म नहीं करने चाहिये ॥२३० - २३२ - १ - २ - ॥
सूर्यके नक्षत्रसे आश्लेषा , मघा , चित्रा , अनुराधा , रेवती तथा श्रवणतककी जितनी संख्या हो , उतनी ही यदि अश्विनीसे चन्द्र - नक्षत्रतककी संख्या हो तो उसपर दुष्टयोगका सम्पात अर्थात्‌ रुद्रके प्रचण्ड अस्त्रका प्रहार होता है। अत : उसका नाम ‘ चण्डीशचण्डायुध ‘ योग है। उसमें शुभ कर्म नहीं करना चाहिये ॥२३३ - २३४ - १ - २॥
क्रकचयोग—प्रतिपदादि तिथिकी तथा रवि आदि वारकी संख्या निलानेसे यदि १३ हो तो वह क्रकचयोग होता है जो शुभ कार्यमें अत्यन्त निन्दित माना गया है ॥२३५॥
संवर्तयोग—रविवारको सप्तमी और बुधवारको प्रतिपदा हो तो ‘ संवर्तयोग ‘ जानना चाहिये। य शुभ कार्यको नष्ट करनेवाला है ॥२३६ - १ - २॥
आनन्दादि योग—१आनन्द , २कालदण्ड , ३धूम्र , ४धाता , ५सुधाकर सौम्य , ६ध्वाङ्क्ष , ७केतु , ८श्रीवत्स , ९वज्र , १०मुद्रर , ११छत्र , १२मित्र , १३मानस , १४पद्म , १५लुम्ब , १६उत्पात , १७मृत्यु , १८काण , १९सिद्धि , २०शुभ , २१अमृत , २२मुसल , २३अन्तक गद , २४ कुञ्चर मातङ्ग , २५राक्षस , २६चर , २७सुस्थिर और २८वर्धमान - ये क्रमश : पठित २८ योग अपने - अपने नामके समान ही फल देनेवाले कहे गये हैं।
इन योगोंको जाननेकी रीति—रविवारको अश्विनी नक्षत्रसे , सोमवारको मृगशिरासे , मङ्गलवारको आश्लेषासे , बुधवारको हस्तसे , गुरुवारको अनुराधासे , शुक्रवारको उत्तराषाढसे और शनिवारको शतभिषासे आरम्भ करके उस दिनके नक्षत्रतक गणना करनेपर जो संख्या हो , उसी संख्यावाला योग उस दिन होगा ॥२३७ - २४१॥
सिद्धियोग—रविवारको हस्त , सोमवारको मृगशिरा , मङ्गलवारको अश्विनी , बुधवारको अनुराधा , बृहस्पतिवारको पुष्य , शुक्रवारको रेवती और शनिवारको रोहिणी हो तो सिद्धियोग होता है ॥२४२ - १ - २॥
रवि और मङ्गलवारको नन्दा १।६।११। , शुक्र और सोमवारको भद्राअ २।७।१२ , बुधवारको जया ३।८।१३ , गुरुवारको रिक्ता ४।९।१४ और शनिवारको पूर्णा ५।१०।१५ न करे ॥२४३ - १ - २॥
सिद्धयोग—शुक्रवारको नन्दा , बुधवारको भद्रा , मङ्गलवारको जया , शनिवारको रिक्त और गुरुवारको पूर्णा तिथि हो तो ‘ सिद्धयोग ‘ कहा गया है ॥२४४ - १ - २॥
दग्धयोग—सोमवारको एकादशी , गुरुरको षष्ठी , बुधवारको तृतीया , शुक्रवारको अष्टमी , शनिवारको नवमी तथा मङ्गलवारको पञ्चमी तिथि हो तो ‘ दग्धयोग ‘ कहा गया है ॥२४५ - २४६॥
ग्रहोंके जन्मनक्षत्र—रविवारको भरणी , सोमवारको चित्रा , मङ्गलवारको उत्तराषाढ , बुधवारको धनिष्ठा , गुरुवारको उत्तराफाल्गुनी , शुक्रवारको ज्येष्ठा और शनिवारको रेवती - ये क्रमश : सूर्यादि ग्रहोंके जन्मनक्षत्र होनेके कारण शुभ कार्यके विनाशक होते हैं ॥२४७ - १ - २॥
यदि रवि आदि वारोंमें विशाखा आदि चार - चार नक्षत्र हों अर्थात्‌ रविवारको विशाखासे , सोमको पूर्वाषाढसे , मङगलको धनिष्ठासे , बुधको रेवतीसे , गुरुवारको रोहिणीसे , शुक्रको पुष्यसे और शनिको उत्तरा फाल्गुनीसे चार - चार नक्षत्र हों तो क्रमश : उत्पात , मृत्यु , काण तथा सिद्ध नामक योग कहे गये हैं ॥२४८ - १ - २॥
परिहार—ये जो ऊपर तिथि और वारके संयोगसे तथा वार और नक्षत्रके संयोगसे अनिष्टकारक योग बताये गये हैं , वे सबहूर्णोके देश - भारतके पश्चिमोत्तर - भागमें , बंगालमें और नैपाल देशमें ही त्याज्य हैं। अन्य देशोंमें ये अत्यन्त शुभप्रद हैं ॥२४९ - १ - २॥
सूर्यसंक्रान्तिकथन :— रवि आदि वारोंमें सूर्यकी संक्रान्ति होनेपर क्रमश : घोरा , ध्वांक्षी , महोदरी , मन्दा , मन्दाकिनी , मिश्रा तथा राक्षसी - ये संक्रान्तिके नाम होते हैं। उक्त घोरा आदि संक्रान्तियाँ क्रमश : शूद्र , चोर , वैश्य , ब्राह्मण , क्षत्रिय , गौ आदि पशु तथा चारों वर्णोंसे अतिरिक्त मनुष्योंको सुख देनेवाली होती हैं। यदि सूर्यकी संक्रान्ति पूर्वाह्नमें हो तो वह क्षत्रियोंको हानि पहुँचाती है। मध्याह्नमें हो तो ब्राह्मणोंको , अपराह्णमें हो तो वैश्योंको , सूर्यास्त - समयमें हो तो शूद्रोंको , रात्रिके प्रथम प्रहरमें हो तो पिशाचोंको , द्वितीय प्रहरमें हो तो निशाचरोंको , तृतीय प्रहरमें हो तो नाटयकारोंको , चतुर्थ प्रहरमें हो तो गोपालकोंको और सूर्योदय - समयमें हो तो लिङ्गधारियों वेशधारी बहुरूपियों , पाखण्डियों अथवा आश्रम या सम्प्रदायके चिह्न धारण करनेवालों को हानि पहुँचाती है ॥२५० - २५३ - १ - २॥
यदि सूर्यकी मेष - संक्रान्ति दिनमें हो तो संसारमें अनर्थ और कलह पैदा करनेवाली है। रात्रिमें मेष - संक्रान्ति हो तो अनुपम सुख और सुभिक्ष होता है तथा दोनों संध्याओंके समय हो तो वह वृष्टिका नाश करनेवाली है ॥२५४ - १ - २॥
करण - संक्रान्तिवश सूर्यके वाहन - भोजनादि—बव आदि ग्यारह करणोंमें संक्रान्ति होनेपर क्रमश : १सिंह , २बाघ , ३सूअर , ४गदहा , ५हाथी , ६भैंसा , ७घोडा , ८कुत्ता , ९बकरा , १०बैल और ११मुर्गा - ये सूर्यके वाहन होते हैं तथा १भुशुण्डी , २गदा , ३तलवार , ४लाठी , ५धनुष , ६बरछी , ७कुन्त भाला , ८पाश ९अङ्कुश , १०अस्त्र जो फेंका जाता है और ११बाण - इन्हें क्रमश : सूर्यदेव अपने हाथोंमें धारण करते हैं। १अन्न , २खीर , ३भिक्षान्न , ४पकवान , ५दूध , ६दही , ७मिठाई , ८गुड , ९मधु , १०घृत और ११चीनी - ये बव आदिकी संक्रान्तिमें क्रमश : भगवान्‌ सूर्यके हविष्य भोजन होते हैं ॥२५५ - २५७ - १ - २॥
सूर्यकी स्थिति—बव , वणिज , विष्टि , बालव और गर - इन कारणोंमें सूर्य बैठे हुए , कौलव , शकुनि और किंस्तुघ्न - इन करणोंमें खडे हुए तथा चतुष्पद , तैतिल और नाग - इन तीन करणोंमें सोते हुए , संक्रान्ति करते एक राशिसे दूसरी राशिमें जाते हों तो इन तीनों अवस्थाओंकी संक्रान्तिमें प्रजाको क्रमश : धर्म , आयु और वर्षाके विषयमें समान , श्रेष्ठ और अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं तथा ऊपर कहे हुए अस्त्र , वाहन और भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करनेवाले मनुष्यादि प्राणियोंका अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये , बैठे , खडे हुए संक्रान्ति होती है , उसी प्रकार सोये , बैठे और खडे हुए प्राणियोंका अनिष्ट होता है ॥२५८ - २६० - १ - २॥
नक्षत्रोंकी अन्धाक्षादि संज्ञाएँ—रोहिणी नक्षत्रसे आरम्भ करके चार - चार नक्षत्रोंको क्रमश : अन्ध , मन्दनेत्र , मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुन : आगे इसी क्रमसे सूर्यके नक्षत्रतक गिनकर नक्षत्रोंकी अन्ध आदि चार संज्ञाएँ समझे।
संक्रान्तिकी विशेष संज्ञा—स्थिर राशियों वृष , सिंह , वृश्च्क और कुम्भ - में सृर्यकी संक्रान्तिका नाम ‘ विष्णुपदी ‘, द्विस्वभाव राशियों मिथुन , कन्या , धनु और मीन - में ‘ षडशीतिमुखा ‘, तुला और मेषमें ‘ विषुव ‘ विषुवत्‌ , मकरमें ‘ सौम्यायन ‘ और कर्कमें ‘ याम्यायन ‘ संज्ञा होती है ॥२६१ - २६३॥
पुण्यकाल—याम्यायन और स्थिर राशियोंकी विष्णुपद संक्रान्तिमें संक्रान्तिकालसे पूर्व १६ घडी , द्विस्वभाव राशियोंकी षडशितिमुखा और सौम्यायन - संक्रान्तिमे संक्रान्तिकालके पश्चात्‌ १६ घडी तथा विषवत्‌ मेष , तुला संक्रान्तिमें मध्य संक्रान्ति - कालसे ८ पूर्व और ८ पश्चात - की १६ घडीका समय पुण्यदायक होता है ॥२६४॥
सूर्योदयसे पूर्वकी तीन घडी प्रात :- संध्या तथा सूर्यास्तके बादकी तीन घडी सायं - संध्या कहलाती है। यदि सायं - सध्यामें याम्यायन या सौम्यायन कोई संक्रान्ति हो तो पूर्व दिनमें और प्रात :- संध्यामें संक्रान्ति हो तो पूर्व दिनमें और प्रात :- संध्यामें संक्रान्ति हो तो पर दिनमें सूर्योदयके बाद पुण्यकाल होता है ॥२६५॥
जब सूर्यकी संक्रान्ति होती है , उस समय प्रत्येक मनुष्यके लिये जैसा शुभया अशुभ चन्द्रमा होता है , उसीके अनुसार इस महीनेमें मनुष्योंको चन्द्रमाका शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता है ॥२६६॥ किसी संक्रान्तिके बाद सूर्य जितने अंश भोगकर उस संक्रान्तिके आगे अयनसंक्रान्ति करे , उतने समयतक संक्रान्ति या ग्रहणका जो नक्षत्र हो , वह तथा उसके आगे - पीछेवाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्योंमें अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों दोषों - की शान्तिके लिये तिलोंकी ढेरीपर तीन त्रिशूलवाला त्रिकोण - चक्र लिखे और उसपर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणोंको दान दे ॥२६७ - २६९॥
ग्रह - गोचर—ताराके बलसे चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमाके बली होनेपर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्यके बली होनेसे अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं ॥२७०॥
मुनीश्वर ! अपनी जन्मराशियोंसे ३ , ११ , १० , ६ स्थानमें सूर्य शुभ होता है ; परंतु यदि क्रमश : जन्मराशिसे ही ९ , ५ , ४ तथा १२ वें स्थानमें स्थित शनिके अतिरिक्त अन्य ग्रहोंसे वह विद्ध न हो तभी शुभ होता है। इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशिसे ७ , ६ , ११ , १ , १० तथा ३ में शुभ होते हैं : यदि क्रमश : २ , १२ , ८ , ५ , ४ और ९ वेंमें स्थित बुधसे भिन्न ग्रहोंसे विद्ध न हों। मङ्गल जन्मराशिसे ३ , ११ , ६ में शुभ हैं ; यदि क्रमश : १२ , ५ तथा ९ वें स्थानमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध न हों। शनि भी अपनी जन्मराशिसे इन्हीं ३ , ११ , ६ स्थानोंमें शुभ हैं ; यदि क्रमश : १२ , ५ , ९ स्थानोंमें स्थित सूर्यके सिवा अन्य ग्रहोंसे विद्ध न हों। बुध अपनी जन्मराशिसे २ , ४ , ६ , ८ , १० और ११ स्थानोंमेम शुभ हों ; यदि क्रमश : ५ , ३ , ९ , १ , ८ और १२ स्थानोंमें स्थित चन्द्रमाके सिवा अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। मुनीश्वर ! गुरु जन्मराशिसे २ , ११ , ९ , ५ और ७ इन स्थानोंमें शुभ होते हैं ; यदि क्रमश : १२ , ८ , १० , ४ और ३ स्थानोंमें स्थित अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशिसे १ , २ , ३ , ४ , ५ , ८ , ९ , १२ तथा ११ स्थानोंमें शुभ होते हैं ; यदि क्रमश : ८ , ७ , १ , १० , ९ , ५ , ११ , ६ , ३ स्थानोंमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध न हों ॥२७१ - २७६॥
जो ग्रह गोचरमें वेधयुक्त हो जाता है , वह शुभ या अशुभ फलको नहीं देता : इसलिये वेधका विचार करके ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिये ॥२७७॥ वामवेढ होने वेध - स्थानमें ग्रह और शुभ स्थानमें अन्य ग्रहके होने - से दुष्ट अशुभ ग्रह भी शुभकारक हो जाता है। यदि दुष्ट ग्रह भी शुभग्रहसे दृष्ट हो तो शुभकारक हो जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पापग्रहसे दृष्ट हो तो अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रुसे देखे जाते हों अथवा नीच राशिमें या अपने शत्रुकी राशिमें हों तो निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो वह भी अपने शुभ या अभुभ फलको नहीं देता है। ग्रह यदि दुष्ट - स्थानमें हो तो यत्नपूर्वक उसक शान्ति कर लेनी चाहिये। हानि और लाभ ग्रहोंके ही अधीन हैं , इसलिये ग्रहोंको विशेष यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये ॥२७८ - २८० - १ - २॥
सूर्य आदि नवग्रहोंकी तुष्टिके लिये क्रमश : मणि पद्मराग - लाल , मुक्त मोती , विद्रुम मूँगा , मरकत पन्ना , पुष्पराग पोखराज , वज्र हीरा , नीलम , गोमेद - रत्न एवं वैदूर्य लहसनिया धारण करना चाहिये ॥२८१ - २८२॥
चन्द्र - शुद्धिमें विशेषता—शुक्लपक्षके प्रथम दिन प्रतिपदामें जिस व्यक्तिके चन्द्रमा शुभ होते हैं , उसके लिये शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दोनों ही शुभद होते हैं। अन्यथा यदि शुक्ल प्रतिपदामें चन्द्रमा अशुभ हो तो दोनों पक्ष अशुभ ही होते हैं। पहले जो जन्मराशिसे २ , ९ , ५ वें चन्द्रमाको अशुभ कहा गया है , वह केवल कृष्णपक्षमें ही होता है। शुक्ल पक्षमें २ , ९ तथा ५ वें स्थानमें स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है , यदि वह ६ , ८ , १२ वें स्थानोंमें स्थित अन्य ग्रहोंसे विद्ध न हो ॥२८३ - २८४॥
तारा - विचार—अपने - अपने जन्मनक्षत्रसे नौ नक्षत्रोंतक गिने तो क्रमश : १ जन्म , २ सम्पत्‌ , ३ विपत्‌ , ४ क्षेम , ५ प्रत्यरि , ६ साधक , ७ वध , ८ मित्र तथा ९ परम मित्र - इस प्रकार ९ ताराएँ होती हैं। फिर इसी प्रकार आगे गिननेपर १० से १८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमश : वे ही ९ ताराएँ होंगी। इनमें १ , ३ , ५ और ७वीं तारा अपने नामके अनुसार अनिष्ट फल देनेवाली होती हैं। इन चारों ताराओंमें इनके दोषकी शान्तिके लिये ब्राह्मणोंको क्रमश : शाक , गुड , लवण और तिलसहित सुवर्णका दान देना चाहिये। कृष्णपक्षमें तारा बलवती होती है और शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बलवान्‌ होता है ॥२८५ - २८७॥
चन्द्रमाकी अवस्था—प्रत्येक राशिमें चन्द्रमाकी बारह - बारह अवस्थाएँ होती हैं , जो यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्योंमें अपने नामके सदृश ही फल देती हैं।
अवस्थाका ज्ञान—अभीष्ट दिनमें गत नक्षत्र - संख्याको ६० से गुणा करके उसमें वर्तमान नक्षत्रकी भुक्त भयात घडीको जोड दे , योगफलको चारसे गुणा करके गुणनफलमें ४५ का भाग दे। जो लब्धि आवे , उसमें पुन : १२ से भाग देनेपर १ आदि शेषके अनुसार मेषादि राशियोंमें क्रमश : प्रवास , नष्ट , मृत , जय , हास्य , रति , मुदा , सुप्त , भुक्त , ज्वर , कम्प और सुस्थिति - ये बारह गत अवस्थाएँ सूचित होती हैं। ये अपने - अपने नामके समान फल देनेवाले होती हैं ॥२८८ - २८९॥
मेषादि लग्नोंमेम कर्तव्य—पट्ट - बन्धन राजसिंहासन , राजमुकुट आदि धारण , यात्रा , उग्र कर्म , संधि , विग्रह , आभूषणधारण , धातु , खानसम्बन्धी कार्य और युद्धकर्म - ये सब मेष लग्नमें आरम्भ करनेसे सिद्ध होते हैं ॥२९०॥
वृष लग्नमें विवाह मङ्गप्रवेश , कृषि , वाणिज्य तथा पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९१॥ मिथुन लग्नमें कला , विज्ञान शिल्प , आभूषण , युद्ध संश्रव कीर्ति साधक कर्म , राज - कार्य , विवाह , राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिये ॥२९२॥
कर्क लग्नमें वापी , कूप , तडाग , जल रोकनेके लिये बाँध , जल निकालनेके लिये नाली बनाना , पौष्टिक कर्म , चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य करने चाहिये ॥२९३॥ सिंह लग्नमें ईख तथा धान्यसम्बन्धी सब कार्य , वाणिज्य क्रय - विक्रय , हाट , कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म , स्थिर कार्य , साहस , युद्ध तथा आभूषणा बनाना आदि कार्य सम्पन्न होते हैं ॥२९४॥ कन्या लग्नमें विद्यारम्भ , शिल्पकर्म , ओषधिनिर्माण एवं सेवन , आभूषण - निर्माण और उसका धारण , समस्त चर और स्थिर कार्य , पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिये ॥२९५॥ तुला लग्नमें कृषिकर्म , व्यापार , यात्रा , पशुपालन , विवाह - उपनयनादि संस्कार तथा तौलसम्बन्धी जितने कार्य हैं , वे सब सिद्ध होते हैं ॥२९६॥ बृश्चिक लग्नमें गृहारम्भादि समस्त स्थिर कार्य , राजसेवा , राज्याभिषेक , गोपनीय और स्थिर कर्मोंका आरम्भ करना चाहिये ॥२९७॥ धनु लग्नमें उपनयन , विवाह , यात्रा , अश्वकृत्य , गजकृत्य , शिल्पकला तथा चर , स्थिर और मिश्रित कार्योंको करना चाहिये ॥२९८॥ मकर लग्ममें धनुष बनाना , उसमें प्रत्यञ्चा बाँधना , बाण छोडना , अस्त्र बनाना और चलाना , कृषि , गोपालन , अश्वकृत्य , गजकृत्य तथा पशुओंका क्रय - विक्रय और दास आदिकी नियुक्ति - ये सब कार्य करने चाहिये ॥२९९॥ कुम्भ लग्नमें कृषि , वाणिज्य , पशुपालन , जलाशय , शिल्पकर्म , कला आदि , जलपात्र कलश आदि तथा अस्त्र - शस्त्रका निर्माण आदि कार्य करना चाहिये ॥३००॥ मीन लग्नमें उपनयान , विवाह , राज्याभिषेक , जलाशयकी प्रतिष्ठा , गृहप्रवेश , भूषण , जलपात्रनिर्माण तथा अश्वसम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं ॥३०१॥
इस प्रकार मेषादि लग्नोंके शुद्ध शुभ स्वामीसे युक्त या दृष्ट रहनेसे शुभ कार्य सिद्ध होते हैं। पापग्रहसे युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं , शुभ कर्म नहीं ॥३०२॥
वृष , मिथुन , कर्क , कन्या , मीन , तुला और धनु - ये शुभग्रहकी राशि होनेके कारण शुभ हैं तथा अन्य मेष , सिंह , वृश्चिक , मकर और कुम्भ - ये पापराशियाँ हैं ॥३०३॥ लग्नपर जैसे शुभ या अशुभ ग्रहोंका योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है। यदि लग्नमें ग्रहके योग या दृष्टिका अभाव हो तो लग्न अपने स्वभावके अनुकूल फल देता है ॥३०४॥ किसी लग्नके आरम्भमें कार्यका आरम्भ होनेपर उसका पूर्ण फल मिलता है। लग्नके मध्यमें मध्यम और अन्तमें अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नोंमें समझनी चाहिये ॥३०५॥ कार्यकर्ताके लिये सर्वत्र पहले लग्नबल , उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिये। चन्द्रमा यदि बली हो और सप्तम भावमें स्थित हो तो सब ग्रह बलवान्‌ समझे जाते हैं ॥३०६॥ चन्द्रमाका बल आधार और अन्य ग्रहोंके बल आधेय हैं। आधारके बलपर ही आधेय स्थिर रहता है ॥३०७॥ यदि चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देनेवाले हो जाते हैं। लेकिन धन - स्थानके स्वामीको छोडकर ही यह नियम लागू होता है ; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमाके अशुभ होनेपर भी अपने शुभ फलको ही देता है ॥३०८॥
लग्नके जितने अंश उदित हो गये क्षितिजसे ऊपर आ गये हों , उनमें जो ग्रह हो वह लग्नके फलको देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्नके जितने भावांश हों , उनके भीतर रहनेवाला ग्रह लग्नभावका फल देता है तथा उससे आगे - पीछे हो तो लग्नराशिमें रहता हुआ भी आगे - पीछेके भावका फल देता है। लग्नके कथित अंशसे जो ग्रह आगे बढ जाता है , वह द्वितीय भावका फल देता है। इस प्रकार सब भावोंमें ग्रहोंकी स्थिति और फलकी कल्पना करनी चाहिये। सब गुणोंसे युक्त लग्न तो थोडे दिनोंमें नहीं मिल सकता ; अत : स्वल्प दोष और अधिक गुणोंसे युक्त लग्नको ही सब कार्योंमें सर्वदा ग्रहण करना चाहिये : क्योंकि आधिक दोषोंसे युक्त कालको ब्रह्माजी भी शुद्ध नहीं कर सकते ; इसलिये थोडे दोषसे युक्त होनेपर भी अधिक गुणवाला लग्न - काल हितकर होता है ॥३०९ - ३११ - १ - २॥
स्त्रियोंके प्रथम रजोदर्शन :— अमावास्या , रिक्ता ४ , ९ , १४ , ८ , ६ , १२ और प्रतिपदा - इन तिथियोंमें परिघ योगके पूर्वार्धमें , व्यतीपात और वैधृतिमें , संध्याके समय , सूर्य और चन्द्रके ग्रहणकालमें तथा विष्टि भद्रा - में स्त्रीका प्रथम मासिकधर्म अशुभ होता है। रवि आदि वारोंमें प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमश : रोगयुक्त , पतिकी प्रिया , दुःखयुक्ता पुत्रवती , भोगवती , पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है ॥३१२ - ३१४॥ भरणी , कृत्तिका , आर्द्रा , पूर्वा फाल्गुनी , आश्लेषा , विशाखा , ज्येष्ठा , पूर्वाषाढ और पूर्व भाद्रपद - ये नक्षत्र तथा चैत्र , कार्तिक , आषाढ और पौष - ये मास प्रथम मासिकधर्ममें अनिष्टकारक कहे गये हैं। भद्रा , सूर्यकी संक्रान्ति , निद्रा - अवस्था - रात्रिकाल , सूर्य़ग्रहण तथा चन्द्र - ग्रह्ण - ये सब प्रथम मासिकधर्ममें शुभ नहीं हैं। अशुभ योग , निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिनमें प्रथम मासिकधर्म हो तो वह स्त्री कुलटा स्वभाववाली होती है ॥३१५ - ३१६॥ इसलिये इन सब दोषोंकी शान्तिके लिये विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह तिल , घृत और दूर्वासे गायत्री - मन्त्रद्वारा १०८ बार आहुति करे तथा सुवर्णदान , गोदान एवं तिलदान करे ॥३१७॥
गर्भाधान - संस्कार—मासिकधर्मके आरम्भसे चार रात्रियाँ गर्भाधानमें त्याज्य हैं। सम रात्रियोंमें जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांशमें हो , लग्नपर पुरुषग्रह रवि , मङ्गल तथा बृहस्पति - की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम २ , ४ , ६ , ८ , १० , १२ तिथियोंमें , रेवती , मूल , आश्लेषा और मघा - इन नक्षत्रोंको छोडकर अन्य नक्षत्रोंसे उपवीती और अनग्न सवस्त्र होकर स्त्रीका सङ्ग करे ॥३१८ - ३१९॥
पुंसवन और सीमन्तोन्नयन—प्रथम गर्भ स्थिर हो जानेपर तृतीय या द्वितीय मासमें पुंसवन कर्म करे। उसी प्रकार ४ , ६ या ८ वेम मासमें उस मासमे स्वामी जब बली हों तथा स्त्री - पुरुष दोनोंको चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो तो सीमन्त - कर्म करना चाहिये। रिक्ता तिथि और पर्वको छोडकर अन्य तिथियोंमें ही उसको करनेकी विधि है। मङ्गल , बृहस्पति तथा रविवारमें , तीक्ष्ण और मिश्रसंज्ञक नक्षत्रोंको छोडकर अन्य नक्षत्रोंमें जब चन्द्रमा विशमराशि और विषमराशिके नवमांशमें हो , लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध ग्रहवर्जित हो , स्त्री - पुरुषके जन्म - लग्नसे अष्टम राशिलग्न न हो तथा लग्नमें शुभग्रहका योग और दृष्टि हो , पापग्रहकी दृष्टि न हो एवं शुभग्रह लग्नसे ५ , १ , ४ , ७ , ९ , १० में और पापग्रह ६ , ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२ , ८ तथा लग्नसे अन्य स्थानोंमें हो तो उक्त दोनों कर्म पुंसवन और सीमन्तोन्नयन करने चाहिये ॥३२० - ३२४॥ यदि एक भी बलवान्‌ पापग्रह लग्नसे १२ , ५ और ८ और ८ भावमें हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भका नाश कर देता है ॥३२५॥
जातकर्म और नामकर्म—जन्मके समयमें ही जातकर्म कर लेना चाहिये। किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक बीतनेपर भी उक्त लग्नमें पितरोंका पूजन नान्दीमुख कर्म करके बालकका जातकर्म - संस्कार अवश्य करना चाहिये एवं सूतक बीतनेपर अपने - अपने कुलकी रीतिके अनुसार बालकका नामकरण - संस्कार भी करना चाहिये। भलीभाँति सोच - विचारकर देवता आदिका वाचक , मङ्गलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिये। यदि देश - कालादि - जन्य किसी प्रतिबन्धसे समयपर कर्म न हो सके तो समयके बाद जब गुरु और शुक्रका उदय हो , तब उत्तरायणमें चर , स्थिर , मृदु और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्रोंमें शुभग्रहके वार सोम , बुध , ग्रुरु और शुक्र - में पिता और बालकके चन्द्रबल और ताराबल प्राप्त होनेपर शुभ लग्न और शुभ नवांशमें , लग्नसे अष्टम भावमें कोई ग्रह न हो तब बालकका जातकर्म और नामकर्म - संस्कार करने चाहिये ॥३२६ - ३२९ - १ - २॥
अन्न - प्राशन—बालकोंका जन्मसे ६ वें या ८ वें मासमें और बालिकाओंका जन्मसे ५ वें या ७ वें मासमें अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है। परंतु रिक्ता ४ , ९ , १४ , तिथिक्षय , नन्दा १ , ६ , ११ , १२ , ८ - इन तिथियोंको छोडकर अन्य तिथियोंमें शुभ दिनमें चर , स्थिर , मृदु और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रमें लग्नसे अष्टम और दशम स्थान शुद्ध ग्रहरहित होनेपर शुभ नवांशयुक्त शुभ राशिलग्नमें , लग्नपर शुभग्रहका योग या दृष्टि होनेपर जब पापग्रह लग्नसे ३ , ६ , ११ भावमें और शुभग्रह १ , ४ , ७ , १० , ५ , ९ भावमें हो तथा चन्द्रमा १२ , ६ , ८ स्थानसे भिन्न स्थानमें हो तो पूर्वाह्न - समयमें बालकोंका अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है ॥३३० - ३३४॥
चूडाकरण—बालकोंके जन्मसमयसे तीसरे या पाँचवें वर्षमें अथवा अपने कुलके आचार - व्यवहारके अनुसार अन्य वर्षमासमें भी उत्तरायणमें , जब गुरु और शुक्र उदित हों अस्त न हों , पर्व तथा रिक्तासे अन्य तिथियोंमें , शुक्र , गुरु , सोमवारमें , अश्विनी , पुनर्वसु , पुष्य , मृगशिरा , ज्येष्ठा , रेवती , हस्त , चित्रा , स्वाती , श्रवण , धनिष्ठा और शतभिषा - इन नक्षत्रोंमें अपने - अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार चूडाकरणकर्म करना चाहिये। राजाओंके पट्टबन्धन , बालकोंके चूडाकरण , अन्नप्राशन और उपनयनमें जन्म - नक्षत्र प्रशस्त उत्तम होत है। अन्य कर्मोंमें जन्म - नक्षर अशुभ कहा गया है। लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध हो , शुभ राशि लग्न हो , उसमें शुभग्रहका नवमांशा हो तथा जन्मराशि या जन्मलग्नसे अष्टम राशिलग्न नहो , चन्द्रमा लग्नसे ६ , ८ , १२ स्थानोंस भिन्न स्थानोंमें हो , शुभग्रह २ , ५ , ९ , १ , ४ , ७ , १० भावमें हों तथा पापग्रह ३ , ६ , ११ भावमें हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥३३५ - ३३९ - १ - २॥
सामान्य क्षौर - कर्म—तेल लगाकर तथा प्रात : और सायं संध्याके समयमें क्षौर नहीं कराना चाहिये। इसी प्रकार मङ्गलवारको तथा रात्रिमें बी क्षौरका निषेध है। दिनमें भी भोजनके बाद क्षौर नहीं कराना चाहिये। युद्धयात्रामें भी क्षौर कराना वर्जित है। शय्यापर बैठकर या चन्दनादि लगाकर क्षौर नहीं कराना चाहिये। जिस दिन कहींकी यात्रा करनी हो , उस दिन भी क्षौर न करावे तथा क्षौर करानेके बाद उससे नवें दिन भी क्षौर न करावे। राजाओंके लिये क्षौर करानेके बाद उससे ५ वें - ५ वें दिन क्षौर करानेका विधान है। चूडाकरणमें जो नक्षत्र - वार आदि कहे गये हैं , उन्हीं नक्षत्रों और वार आदिमें अथवा कभी भी क्षौरमें विहित नक्षत्र और वारके उदय मुहूर्त एवं क्षण - में क्षौर कराना शुभ होता है ॥३४० - ३४१ - १ - २॥
क्षौरकर्ममें विशेष—राजा अथवा ब्राह्मणोंकी आज्ञासे यजँमें , माता - पिताके मरणमें , जेलसे छूटनेपर तथा विवाहके अवसरपर निषिद्ध नक्षत्र , वार एवं तिथि आदिमें भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है। समस्त मङ्गल कार्योंमें , मङ्गलार्थ इष्ट देवताके समीप क्षुरोंको अर्पण करना चाहिये ॥३४२ - ३४३॥
उपनयन—जिस दिन उपनयनका मुहूर्त स्थिर हो , उससे पूर्व ९ वें , ७ वे , ५ वें या तीसरे दिन उनपयनके लिये विहित नक्षत्र या उस नक्षत्रके मुहूर्त - में शुभ वार और शुभ लग्नमें अपने घरोंको चँदोवा , पताका और तोरण आदिसे अच्छि तरह अलंकृत करके , ब्राह्मणोंद्वारा आशीर्वचन , पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य कराकर , सौभाग्यवती स्त्रियोंके साथ , माङ्गलिक बाजा बजवाते और मङ्गलगान करते - कराते हुए घरसे पूर्वोत्तर - दिशा ईशानकोण - में जाकर पवित्र स्थानसे चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुन ; उसी प्रकार गीत - वाद्यके साथ घर लौट आवे। वहाँ मिट्टी या बाँसके बर्तनमें उस मिट्टीको रखकर उसमें अनेक अवस्तुओंसे युक्त और भाँति - भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित पवित्र जल डाये। इसी प्रकार और भी अपने कुलके अनुरूप आचारक पालन करे ॥३४४ - ३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्मसे आठवें वर्षमें ब्राह्मण - बालकोंका , ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय बालकोंका और बारहवें वर्षमें वैश्य - बालकोंका मौञ्जीबन्धन यज्ञोपवीत - संस्कार होना चाहिये ॥३४८॥ जन्मसे पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत - संस्कार करनेपर बालक वेद - शास्त्र - विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है। इसलिये उसमें ब्राह्मण - बालकका उपनयन - संस्कार करना चाहिये ॥३४९॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी वे बालकके लिये शुभदायक होते हैं। अत : शास्त्रोक्त वर्षमें उपनयनसंस्कार अवश्य करना चाहिये। शास्त्रने जिस वर्षमें उपनयनकी आञा नहीम दी है , उसमें वह संस्कार नहीं करना चाहिये ॥३५०॥ गुरु , शुक्र तथा अपने वेदकी शाखाके स्वामी - ये दृश्य हों - अस्त न हुए हों तो उत्तरायणमें उपनयनसंस्कार करना उचित है । बृहस्पति , शुक्र , मङ्गल और बुध - ये क्रमश : ऋक्‌ , जयु :, साम और अथर्ववेदके अधिपति है ॥३५१॥ शरद्‌ , ग्रीष्म और वसन्त - ये व्युत्क्रमसे द्विजातियोंके उपनयनका मुख्य काल हैं अर्थात्‌ शरद्‌ ऋतु वैश्योंके , ग्रीष्म क्षत्रियोंके और वसन्त ब्राह्मणोंके उपनयनका मुख्य काल है। माघ आदि पाँच महीनोंमें उन सबके लिये उपनयनका साधारण काल है ॥३५२॥ माघ मासमें जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्मका ज्ञाता होता है। फाल्गुनमें यज्ञोपवीत धारण करनेवाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान्‌ होता है। चैत्रमें उपनयन होनेपर ब्रह्मचारी वेद - वेदाङ्गोंका पारगामी विद्वान्‌ होता है ॥३५३॥ वैशाख मासमें जिसका उपनयन हो , वह धनवान तथा वेद , शास्त्र एवं विविध विद्याओंमें निपुण होता है और ज्येष्ठमें यज्ञोपवीत लेनेवाला द्विज विधिज्ञोंमें श्रेष्ठ और बलवान्‌ होता है ॥३५४॥
शुक्लपक्षमें द्वितीया , पञ्चमी , त्रयोदशी , दशमी और सप्तमी तिथियाँ यज्ञोपवीतसंस्कारके लिये ग्राह्य हैं। शेष तिथियोंको मध्यम माना गया है। क्रुष्णपक्षमें द्वितीया , तृतीय और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियाँ अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५ - ३५६॥ हस्त , चित्रा , स्वाती , रेवती , पुष्य , आर्द्रा , पुनर्वसु , तीनों उत्तरा , श्रवण , धनिष्ठा , शतभिषा , अश्विनी , अनुराधा तथा रोहिणी - ये नक्षत्र उपनयन - संस्कारके लिये उत्तम हैं ॥३५७॥ जन्मनक्षत्रसे दसवाँ ‘ कर्म ‘ संज्ञक हैं , सोलहवाँ ‘ संघात ‘ नक्षत्र हैं , अठारहवाँ ‘ समुदय ‘ नक्षत्र है , तेईसवाँ ‘ विनाश ‘ कारक है और पचीसवाँ ‘ मानस ‘ है। इनमें शुभ कर्म नहीं आरम्भ करने चाहिये। गुरु , बुध और शुक्र - इन तीनोंके वार उपनयनमें प्रशस्त हैं। सोंमवार और रविवर ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मङ्गल और शनैश्चर निन्दित हैं। दिनके तीन भाग करके उसके आदि भागमें देव - सम्बन्धी कर्म यज्ञ - पूजनदि करने चाहिये ॥३५८ - ३६०॥ द्वितीय भागमें मनुष्य - सम्बन्धी कार्य आतिथि - सत्यकार आदि करनेका विधान है और तृतीय भागमें पैतृक कर्म श्राद्ध - तर्पणादि - का अनुष्ठान करना चाहिये। गुरु , शुक्र और अपनी वैदिक शाखाके अधिपति अपनी नीच राशिमें या उसके किसी अंशमें हों अथवा अपने शत्रकी राशिमें या उअसके किसी अंशमें हों अथवा अपने शत्र्की राशिमें या उसके किसी अंशमें स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेनेवाला द्विज कला और शीलसे रहित होता है। इसी प्रकार अपनी शाखाके अधिपति , गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रु - गृहमेम या उसके किसी अंशमें स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत यज्ञोपवीत ग्रहण करनेवाला द्विज महापातकी होता है। गुरु , शुक्र एवं अपनी शाखाके अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंशमें हों , अपनी राशि या उसके किसी अंशमें हों अथवा केन्द्र १ , ४ , ७ , १० या त्रिकोण ५ , ९ - में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान्‌ तथा वेद - वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान्‌ होता है ॥३६१ - ३६४॥ यदि गुरु , शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थानमें हों और मृत्यु आठवाँ स्थान शुद्ध हो तो उस समय व्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद - शास्त्रमें ‘ निष्णात ‘ होता है ॥३६५॥ गुरु , शुक्र अथवा शाखाधिपति यदि अपने अधिमित्रगृहमें या उसके उच्च गृहमें अथवा उसके अंशमें स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धनसे सम्पन्न होता है ॥३६६॥ शाखाधिपतिका दिन हो , बालकको शाखाधिपतिका बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपतिका ही लग्न हो - ये तीन बातें उपनयन - संस्कारमें दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उसके चतुर्थांशमें चन्द्रमा हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला बालक विद्यामें निपुण होता है : किंतु यदि वह पापग्रहके अंशमें
अथवा अपने अंशमें हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखी रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्रमें विद्यमान चन्द्रमा कर्कके अंश - विशेषमें स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद , शास्त्र तथा धन - धान्य - समृद्धिसे सम्पन्न ओता है ॥३६९॥ शुभ लग्न हो , शुभग्रहका अंश चल रहा हो , मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्यु - स्थान शुभग्रहोंसे संयुक्त हो अथवा उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो , अभीष्ट स्थानमें स्थित बृहस्पति , सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान्‌ ग्रहोंसे लग्नस्थान संयुक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदिके बलसे पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहोंद्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो और वह इक्कीस महादोषोंसे रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहोंसे संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ॥३७० - ३७२॥ वे शुब राशियाँ शुभ ग्रहके नवांशमें हों तो व्रतबन्ध यज्ञोपवीत - में ग्राह्य हैं , किंतु कर्कराशिका अंश शुभ ग्रहसे युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥३७३॥ इसलिये वृष और मिथुनके अशं तथा तुला और कन्याके अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगा नवांश होनेपर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥३७४॥ तीसरे , छठे और ग्यारहवें स्थानमें पापग्रह हों , छठा , आठवाँ और बारहवाँ स्थान शुभग्रहसे खाली हो और चन्द्रमा छठे , आठवें , लग्न तथा बारहवें स्थानमें न हों तो उपनयन शुभ होता है ॥३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थानमें होकर भी यदि व्रती पुरुषके व्रतबन्ध - मुहूर्त - सम्बन्धी लग्नमें स्थित हो तो वह उस बालकको निर्धन और क्षयका रोगी बना देता है ॥३७६॥ यदि सूर्य केन्द्रस्थानमें प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाले बालकोंके पिताका नाश हो जाता है। पाँच दोषोंसे रहित लग्न उपनयनमें शुभदायक होता है ॥३७७॥ वसन्त ऋतुके सिवा और कभी कृष्णपक्षमें , गलग्रहमें अनध्यायके दिन , भद्रामें तथा षष्ठीको बालकका उपनयन - संस्कार नहीं होना चाहिये ॥३७८॥ त्रयोदशीसे लेकर चार , सप्तमीसे लेकर तीन दिन और चतुर्थी ये आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९॥
क्षुरिका - बन्धनकर्म—अब मैं क्षत्रियोंके लिये क्षुरिका - बन्धन कर्मका वर्णन करूँगा , जो विवाहके पहले सम्पन्न होता है। विवाहके लिये कहे हुए मासोंमें , शुक्लपक्षमें , जबकि बृहस्पति , शुक्र और मङ्गल अस्त न हों , चन्द्रमा और ताराका बल प्राप्त हो , उस समय मौञ्जीबन्धनके लिये बतायी हुई तिथियोंमें , मङ्गलवारको छोडकर शॆष सभी दिनोंमें यह कर्म किया जाता है। कर्ताका लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदयसे रहित न हो , अष्टम , शुद्ध हो ; चन्द्रमा छठे , आठवें और बारहवेंमें न होकर लग्नमें स्थित हों ; शुभग्रह दूसरे , पाँचवें , नवें , लग्न , चतुर्थ , सप्तम और दशम स्थानोंमें हों ; पापग्रह तीसरे , ग्यारहवें और छठे स्थानमें हों तो देवताओं और पितरोंकी पूजा करके क्षुरिका - बन्धनकर्म करना चाहिये ॥३८० - ३८३॥ अहले देवताओंके समीप क्षुरिका कटार - की भलीभाँति पूजा करे। तत्पश्चात्‌ शुभ लक्षणोंसें युक्त उस शुरिकाको उत्तम लग्नमें अपनी कटिमें बाँधे ॥३८४॥ क्षुरिकाको लम्बाईके आधे मध्यभाग पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिकाके विभाग करे। वे छेदखण्ड विभाग क्रमसे ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञाएँ हैं - ध्वज , धूम्र , सिंह , श्वा , वृष , गर्दभ , गज और ध्वाडक्ष। ध्वज नामक आयमें शत्रुका नाश होता है ॥३८५॥ धूम्र आयमें घात , सिंह नामक आयमें जय , श्वा कुत्ता नामक आयमें रोग , वृष आयमें धनलाभ , गर्दभ आयमें अत्यन्त दुःखकी प्राप्ति , गज आयमें अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वाडक्ष नामक आयमें धनका नाशा होता है। खङग और छुरीकए मापको अपने अङ्गलसे गिने ॥३८६ - ३८७॥ मापके अङ्गुलोंमेंसे ग्यारहसे अधिक हो तो ग्यारह घटा दे। फिर शेष अङ्गुलोंके क्रमश : फल इस प्रकार हैं ॥३८८॥ पुत्र - लाभ , शत्रुवध , स्त्रीलाभ , शुभगमन , अर्थहानि , अर्थवृद्धि , प्रीति , सिद्धि , जय और सुति ॥३८९॥
छुरी या तलवारमें यदि ध्वज अथवा वृष आय - विभागके पूर्वभाग में नष्ट भङ्ग हो , तथा सिंह और गज - आयके मध्यभागमें तथा कुक्कुर और काक - आयके अन्तिम भागमें एवं धूम्र और गर्दभ आयके अन्तिम भागमें एवं धूम्र और गर्दभ आयके अन्तिम भागमें नष्ट हो जाय तो शुभ नहीं होता है। अत : ऐसी छुरी या तलवारका परित्याग कर देना चाहिये ; यह बात अर्थत : सिद्ध होती है ॥३९ - १ - २॥
समावर्तन—उत्तरायणमें जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों , चित्रा , उत्तराफाल्गुनी , उत्तराषाढ उत्तर भाद्रपद , पुनर्वसु , पुष्य , रेवती , श्रवण , अनुराधा , रोहिणी - ये नक्षत्र हों तथा रवि , सोम , बुध , गुरु और शुक्रवारमेंसे कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पाँच ग्रहोंकी राशि , लग्न और नवमांशमें , प्रतिपदा , पर्व , रिक्ता , अमावास्या , तथा सप्तामीसे तीन तिथि - इन सब तिथियोंको छोडकर अन्य तिथियोंमें गुरुकुलसे अध्ययन समाप्त करके घरको लौटनेवाले जितेन्द्रिय द्विजकुमारका समावर्तन - संस्कार मुण्डन - हवन आदि करना चाहिये ॥३९१ - ३९३ - १ - २॥
विवाहकथना—व
देवताओंकी स्थापना शुभदायक होती है । जिस देवताकी जो तिथि है , उसमें उस देवताकी और २ , ३ , ५ , ६ , ७ , १० , ११ , १२ , १३ तथा पूर्णिमा - इन तिथियोंमें सब देवताओंकी स्थापना शुभ होती है । तीनों उत्तरा , पुनर्वस , मृगशिरा , रेवती , हस्त , चित्रा , स्वाती , पुष्य , अश्विनी , रोहिणी , शतभिषा , श्रवण , अनुराधा और धनिष्ठा - इन नक्षत्रोंमें तथा मङ्गलवारको छोडकर अन्य वारोंमें देव - प्रतिष्ठा करनी चाहिये। स्थापना करनेवाले यजमान - के लिये सूर्य , तारा और चन्द्रमा बलवान्‌ हों , उस दिनके पूर्वाह्णमें , शुभ समय , शुभ लग्न और शुभ नवमांशमें तथा यजमानकी जन्मराशिसे अष्टम राशिको छोडकर अन्य लग्नोंमें देवताओंकी प्रतिष्ठ शुभदायक होती है ॥५२४ - ५२९॥
मेष आदि सब राशियाँ शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ठ समझी जाती हैं । प्रत्येक कार्यसें पञ्चाङ्ग तिथि , वार , नक्षत्र , योग और करण शुभ होने चाहिये और लग्नसे अष्टम स्थान भी शुभ ग्रहवर्जित होना आवश्यक है ॥५३०॥ १ लग्नमें चन्द्रमा , सूर्य , मङ्गल , राहु , केतु और शनि कर्ताके लिये घातक होते हैं । अन्य बुध , गुरु और शुक्र लग्नमें धन , धान्य और सब सुखोंको देनेवाले होते हैं । २ द्वितीय भावमें पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले और शुभग्रह धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं । ३ तृतीय भावमें शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र - पौत्रादि सुखको बढानेवाले होते हैं । ४ चतुर्थ भावमें शुभग्रह शुभफत और पापग्रह पाप - फलको देते हैं । ५ पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक और शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हैं । ६ षष्ठ भावमें शुभग्रह शत्रुको बढानेवाले और पापग्रह शत्रुके लिये घातक होते हैं । ७ सप्तम भावमें , पापग्रह रोगकारक और शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता यजमान - के लिये घातक होते हैं । ९ नवम भावमें पापग्रह हों तो वे धर्मको नष्ट करनेवाले हैं और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं । १० दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक और शुभग्रह सुयशकी वृद्धि करनेवाले होते हैं । ११ एकादश स्थानमें पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकारसे लाभकारक ही होते हैं । १२ लग्नसे द्वादश स्थानमें पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय खर्च - को बढानेवाले होते हैं ॥५३१ - ५३६॥
प्रतिष्ठामें अन्य विशेष बात — प्रतिष्ठा करानेवाले पुरोहित या आचार्य - को अर्थज्ञान न हो तो यजमानका अनिष्ट होता है । मन्त्रोंका अशुभ उच्चारण हो तो ऋत्विजों यज्ञ करानेवालों - का और कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्त्रीका अनिष्ट होता है । इसलिये नारद ! देव - प्रतिष्ठाके समान दूसरा शत्रू भी नहीं है । यदि लग्नमें अधिक गुण हों और थोडे - से दोष हों तो उसमें देवताओंकी पतिष्ठा कर अलेनी चाहिये । इससे कर्ता यजमान - के अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती है । मुने ! अब मैं संक्षेपसे ग्राम , मन्दिर तथा गृह आदिके निर्माणकी बात बताता हूँ ॥५३७ - ५३९॥
गृहनिर्माणके विषयमें ज्ञातव्य बातें — गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध , वर्ण , रस तथा आकृतिके द्वारा क्षेत्र भूमि - की परीक्षा कर लेनी चाहिये । यदि उस स्थानकी मिट्टीमें मधु शहद - के समान गन्ध ओ तो ब्राह्मणोंके , पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियोंके , आम्ल खटाई - के समान गन्ध हो तो वैश्योंके और मांसकी - सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रोंके बसनेयोग्य जानना चाहिये । वहाँकी मिट्टीका रंग श्वेतत हो तो ब्राह्मणोंके , लाल हो तो क्षत्रियोंके , पीत पीला हो तो वैश्योंके और कृष्ण काला हो तो वह शूद्रोंके निवासके योग्य है । यदि वहाँके मिट्टीका स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणोंके , कडुवा मिर्चके समान हो तो क्षत्रियोंके , तिक्त हो तो वैश्योंके और कषाय कसैला स्वाद हो तो उस स्थानको शूद्रोंके निवास करनेयोग्य समझना चाहिये ॥५४० - ५४१॥ ईशान , पूर्व और उत्तर दिशामें प्लव नीची भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देनेवाली होती है । अन्य दिशाओंमें प्लव नीची भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती है ॥५४२॥
गृहभूमि - परीक्षा — जिस स्थानमें घर बनाना हो वहाँ अरत्नि कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक के बराबर । फिर उस उसी खोदी हुई मिट्टीसे भरे । यदि भरनेसे मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थानमें वास करनेसे समपत्तिकी वृद्धि होती है । यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहनेसे सम्पत्तिकी हानि होती है । यदि सारी मिट्टीसे वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल समझना चाहिये ॥५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्निके मापका कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जलसे पूरित कर दे और प्रात : काल देखे ; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो उस स्थानमें वृद्धि होगी । यदि कीचड गीली मिट्टी ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्डकी भूमिमें दरार पड गयी हो तॊ उस स्थानमें वास करनेसे हानि होगी ॥५४४॥
मुने ! इस प्रकार निवास करनेयोग्य स्थानकी भलीभाँति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमिमें दिक्‌साधन भूमिमें वृत्त गोल रेखा बनावे । वृत्तके मध्य भागमें द्वादशाङ्गुल शङ्कु बारह विभाग या पर्वसे युक्त एक सीधी लकडी - की स्थापना करे और दिक्‌साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे । फिर कर्ताके नामके अनुसर षडवर्ग शुद्ध क्षेत्रफल वास्तु भूमिकी लम्बाई - चौडाईका गुणनफल ठीक करके अभीष्ट लम्बाई - चौडाईके बराबर दिशासाधित रेखानुसार चतुर्भुज बनावे । उस चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार चहारदीवारी बनावे । लम्बाई और चौडाईमें पूर्व आदि चारों दिशाओंमें आठ - आठ द्वारके भाग होते हैं । प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्कित फल हैं । जैसे पूर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक १ - हानि , २ - निर्धनता , ३ - धनलाभ , ४ - राजसम्मान , ५ - बहुत धन , ६ - अति चोरी , ७ - अति क्रोध तथा ८ - भय - ये क्रमश : आठ द्वारोंके फल हैं । दक्षिण दिशामें क्रमश : १ - मरण , २ - बन्धन , ३ - भय , ४ - धनलाभ , ५ - धनवृद्धि , ६ - निर्भयता , ७ - व्याधिभय तथा ८ - निर्बलता - ये पूर्वसे पश्चिमतकके आठ द्वारोंके फल हैं । पश्चिम दिशामें क्रमशा : १ - पुत्रहानि , २ - शत्रुवृद्धि , ३ - लक्ष्मीप्राप्ति , ४ - धनालभ , ५ - सौभाग्य , ६ - अति दौर्भाग्य , ७ - दु : ख तथा ८ - शोक - ये दक्षिणसे उत्तरतकके आठ द्वारोंके फल हैं । इसी प्रकार उत्तर दिशामें पश्चिमसे पूर्वतक १ - स्त्री - हानि , २ - निर्बलता , ३ - हानि , ४ - धान्यलाभ , ५ - धनागम , ६ - सम्पत्ति - वृद्धि , ७ - भय तथा ८ - रोग - ये क्रमश : आठ द्वारोंके फल हैं ॥५४५ - ५५२॥
इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंके गृहादिमें भी द्वार और उसके फल समझने चाहिये । द्वारका जितना विस्तार चौडाई हो , उससे दुगुनी ऊँची किवाडें बनाकर उन्हें घरमें चहारदीवारीके दक्षिण या पश्चिम भागमें लगावे ॥५५३॥ चहारदीवारीके भीतर जितनी भूमि हो , उसके इक्यासी पद समान खण्ड बनावे । उनके बीचके नौ खण्डोंमें ब्रह्माका स्थान समझे । यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित है । चहारदीवारीसे मिले हुए जो चारों ओरके ३२ भाग हैं , वे पिशाचांश कहलाते हैं । उनमें घर बनाना दुःख , शोक और भय देनेवाला होता है । शेष अंशों पदों - में घर बनाये जायँ तो पुत्र , पौत्र और धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं ॥५५५ . १ / २॥
वास्तुभृमिकी दिशा - विदिशाओंकी रेखा वास्तुकी शिरा कहलाती है। एवं ब्रह्मभाग , पिशाचभाग तथा शिराका जहाँ - जहाँ योग हो , वहाँ - वहाँ वास्तुकी मर्मसन्धि समझनी चाहिये । वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह - प्रवेशमें अनिष्टकारक समझी जाती है ॥५५७ . १ / २॥
( गृहारम्भमें प्रशस्त मास ) — मार्गशीर्ष , फाल्गुन , वैशाख , माघ , श्रावण और कार्तिक - ये मास गृहारम्भमें पुत्र , आरोग्य और धन देनेवाले होते हैं ॥५५८ . १ / २॥
( दिशाओंमें वर्ग वर्ग और वर्गेश — पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमश : अकारादि आठ वर्ग होते हैं । इन दिशावर्गोंके क्रमश : गरुड , मार्जार , सिंह , श्वान , सर्प , मूषक , गज और शशक ( खरगोश )- ये योनियाँ होती हैं । इन योनि - वर्गोंमें अपने पाँचवें वर्गवाले परस्पर शत्रु होते हैं ॥५५९ - ५६०॥
( जिस ग्राममें या जिस दिशामें घर बनाना हो , वह साध्य तथा घर बनानेवाला साधक , कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है । इसको ध्यानमें रखना चाहिये । ) साध्य ( ग्राम )- की वर्ग - संख्याको लिखकर , उसके पीछे ( बायें भागमें ) साधककी वर्ग - संख्या लिये । उसमें आठका भाग देकर जो शेष बचे , वह साधकका धन होता है । इसके विपरीत विधिसे अर्थात्‌ साधककी वर्ग - संख्याके बायें भागमें साध्यकी वर्ग - संख्या रखकर जो संख्या बने , उसमें आठसे भाग देकर शेष ) साधकका ऋण होता है । इस प्रकार ऋणकी संख्या अल्प और धन - संख्या अधिक हो तो शुभ माने ( अर्थात्‌ उस ग्राम या उस दिशामें बनाया हुआ घर रहने योग्य है , ऐसा समझे ) ॥५६१ ( क - ख ) ॥
इसी प्रकार साधकके नक्षत्र साध्यके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो उसको चारसे गुणा करके गुणनफलमें सातसे भाग दे तो शेष साधकका धन होता है ॥५६२॥
( वास्तुभूमि तथा घरके धन , ऋण , आय , नक्षत्र , वार और अंशके ज्ञानका साधन —) वास्तुभूमि या घरकी चौडाईको लम्बाईसे गुणा करनेपर गुणनफल ‘ पद ‘ कहलाता है । उस ( पद - को ( ६ स्थानोंसें
रखकर ) क्रमश : ८ , ३ , ९ , ८ , ९ , ६ से गुणा करे और गुणनफलमें क्रमश : १२ , ८ , ८ , २७ , ७ , ९ से भाग दे । फिर जो शेष बचें , वे क्रमश : धन , ऋण , आय , नक्षत्र , वार तथा अंश होते हैं । धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है । यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम ( १ , ३ , ५ , ७ ) आय शुभ और सम ( २ , ४ , ६ , ८ ) आय अशुभ होता है । घरका जो नक्षत्र हो , वहाँसे अपने नामके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो , उसमें ९ से भाग दे । फिर यदि शेष ( तारा ) ३ बचे तो धनका नाश होता है । ५ बचे तो यशकी हानि होती है और ७ बचे तो गृहर्ताका ही मरण होता है । घरकी राशि और अपनी राशि गिननेपर परस्पर २ , १२ हो तो धनहानि होती है : ९ , ५ हो तो पुत्रकी हानि होती है और ६ , ८ हो तो अनिष्ट होता है ; अन्य संख्या हो तो समझना चाहिये सूर्य और मङ्गलके वार तथा अंश हो तो उस घरमें अग्निभय होता है । अन्य वार - अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि होती है ॥५६३ - ५६७॥
( वास्तुपुरुषकी स्थिति — भादों आदि तीन - तीन मासोंमें क्रमश : पूर्व आदि दिशाओंकी ओर मस्तक करके बायीं करवटसे सोये हुए महासर्पस्वरूप ‘ चर ‘ नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रमसे विचरण करते रहते हैं । जिस समय जिस दिशामें वास्तुपुरुषका मस्तक हो , उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा बनाना चाहिये । मुखसे विपरीत दिशामें घरका दरवाजा बनानेसे रोग , शोक और भय होते हैं । किंतु यदि घरमें चारों दिशाओंमें द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥५६८ - ५७०॥
गृहारम्भकालमें नींवके भीतर हाथभरके गड्ढेमें स्थापित करनेके लिये सोना , पवित्र स्थानकी रेणु ( धूलि ), धान्य और सेवारसहित ईंट घरके भीतर संग्रह करके रखे । घरकी जितनी लंबाई हो , उसके तीन अङ्गुल नीचे ( वास्तुपुरुषके पुच्छभागकी ओर ) कुक्षि रहती है । उसमें शङ्कुका न्यास करनेसे पुत्र आदिकी वृद्धि होती है ॥५७१ - ५७२॥
( शाङ्कुप्रमाण —) खदिर ( खैर ), अर्जन , शाल ( शाखू ), युगपत्र ( कचनार ) रक्तचन्दन , पलाश , रक्तशाल , विशाल आदि वृक्षोंसे किसीकि लकडीसे शङ्क बनता है । ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये क्रमश : २४ , २३ , २० और १६ अङ्गुलके शङ्क होने चाहिये । उस शङ्कुके बराबर - बराबर तीन भाग करके ऊपरवाले भागमें चतुष्कोण , मध्यवाले भागमें अष्टकोण और नीचेवाले ( तृतीय ) भागमें बिना कोणका ( गोलाकार ) उसका स्वरूप होना उचित है । इस प्रकार उत्तम लक्षणोंसे युक्त कोमल और छेदरहितु शङ्क शुभ दिनमें बनावे। उसको षडवर्गद्वारा शुद्ध सूत्रसे सूत्रित भूमि ( गृहक्षेत्र - में मृदु , ध्रुव क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रोंमें , अमावास्या और रिक्ताको छोडकर अन्य तिथियोंमें , रविवार , मड्गलवार तथा चर लग्नको छोडकर अन्य वारों और अन्य ( स्थिर याया द्विस्वभाव ) लग्नोंमें , जब पापग्रह लग्नमें न हो , अष्टम स्थान शुद्ध ( ग्रहरहित ) हो ; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो , उस लग्नमें शुभग्रहका संयोग या दृष्टि हो ; ऐसे समय ( सुलग्न )- में ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए माङ्गलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियोंके मङ्गलगीत आदिके साथ मुहूर्त बतानेवाल देवज्ञ ( ज्योतिषके विद्वान्‌ ब्राह्मण ) के पूजन ( सत्कार )- पूर्वक कुक्षिस्थानमें शङ्कुखी स्थापना करे । लग्नसे केन्द्र और त्रिकोणमें शुभ ग्रह तथा ३ , ६ , ११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शुङ्कुस्थापन श्रेष्ठ है ।५७९ . १ / २॥
घरके छ : भे होते हैं - १ - एकशाला , २ - द्विशाला , ३ - त्रिशाला , ४ - चतुश्शाला , ५ - सप्तशाला तथा ६ - दाशशाला । इन छ्हों शालाओंमेंसे प्रत्येकके १६ भेद होते हैं । उन सब भेदोंके नाम क्रमश : इस प्रकार है - १ - ध्रुव , २ - धान्य ३ - जय , ४ - नन्द , ५ - खर , ६ - कान्त , ७ - मनेरम , ८ सुमुख , ९ दुर्मुख , १० क्रूर , ११ शत्रुर , १२ स्वर्णद , १३ क्षय , १४ आक्रन्द , १५ विपुल और १६ वाँ विजय नामक गृह होता है । चार अक्षरोंके प्रस्तारके भेदसे क्रमश : इन गृहोंकी गणना करनी चाहिये ॥५८२ . १ / २॥
( प्रस्तारभेद —) प्रथम ४ गुरु ( ऽ ) चिह्न लिखकर उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु ( । ) चिह्न लिखे । फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु या लटु चिह्न लिखना चाहिये । फिर उसके नीचे ( तीसरी पडक्तिमें ) प्रथम गुरु चिह्नके नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे ( दाहिने भागमें ) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिह्न लिखे तथा पीछे ( बायें भागमें ) गुरु चिह्नसे पूरा करे । इसी प्रकार पुन :- पुन : तबतक लिखता जाय जबतक कि पंक्ति ( प्रस्तार )- में सब चिह्न लघु न हो जाय । इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण ४ अक्षरोंसे १६ भेद होते हैं । प्रत्येक भेदमें चारों चिह्नोंको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्व आदि दिशा समझकर जहाँ - जहाँ लघु चिह्न पडे वहाँ - वहाँ घरका द्वार और अलिन्द ( द्वारके आगेका भाग = चबूतरा ) बनाना चाहिये । इस प्रकार पूर्वादि दिशाओंमें अलिन्दके भेदोंसे १६ प्रकारके घर होते हैं ॥५८४ . १ / २॥
वास्तुभूमिकी पूर्वदिशामें स्नानगृह , अग्निकोणमें पाकगृह ( रसोईघर ), दक्षिणमें शयनगृह , नैऋत्यकोणमें शस्त्रागार , पश्चिममें भोजनगृह , वायुकोणमें धन - धान्यादि रखनेका घर , उत्तरमें देवताओंका गृह और ईशानकोणमें जलका गृह ( स्थान ) बनाना चाहिये तथा आग्नेयकोणसे आरम्भ करके उक्त दो - दो घरोंके बीच क्रमश : मन्थन ( दूध - दहीसे घृत निकालने - का , घृअ रखनेका , पैखानेका , विद्याभ्यासका , स्त्रीसहवासका , औषधका और श्रृङ्गरकी सामग्री रखनेका घर बनाना शुभ कहा गया है । अत : इन सब घरोंमें उन - उन सब वस्तुओंको रखना चाहिये ॥५८८ . १ / २॥
( आयोंके नाम और दिशा —) पूर्वादि आठ दिशाओंमें क्रमसे ध्वज , धूम्र , सिंह , श्वान , वृक्ष , खर ( गदहा ), गज और ध्वांक्ष ( काक )- ये आठ आय होते हैं ॥५८९ . १ / २॥
( घरके समीप निन्द्य वृक्ष —) पाकर , गूलर , आम , नीम , बहेडा तथा काँटेवाले और दुग्धवाले सब वृक्ष , पीपल , कपित्थ ( कैथ ), अगस्त्य वृक्ष , सिन्धुवार ( निर्गुण्डी ) और इमली - ये सब वृक्ष घरके समीप निन्दित कहे गये हैं । विशेषत : घरके दक्षिण और पश्चिम - भागमें ये सब वृक्ष हों तो धन आदिका नाश करनेवाले होते हैं ॥५९९ . १ / २॥
( गृह - प्रमाण —) घरके स्तम्भ ( खम्भे ) घरके पैर होते हैं । इसलिये वे समसंख्या ( ४ , ६ , ८ आदि )- में होनेपर ही उत्तम कहे गये हैं ; विषम संख्यामें नहीं । घरको न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिये , न अधिक नीचा ही । इसलिये अपनी इच्छा ( निर्वाह )- के अनुसार भित्ति ( दीवार ) की ऊँचाई करनी चाहिये । घरके ऊपर जो घर ( दूसरा मंजिल ) बनाया जाता है , उसमें भी इस प्रकारका विचार करना चाहिये । घरोंकी ऊँचाईके प्रमाण आठ प्रकारके कहे गये हैं , जिनके नाम क्रमश : इस प्रकार हैं - १ - पाञ्चाल , २ - वैदेह , ३ - कौरव , ४ - कुजन्यक , ५ - भागध , ६ - शूरसेन , ७ गान्धार और ८ आवन्तिक । जहाँ घरकी ऊँचाई उसकी चौडाईसे सवागुनी अधिक होती है , वह भूतलसे ऊपरतकका पाञ्चालमान कहलाता है , फिर उसी ऊँचाईको उत्तरोत्तर सवागुनी बढानेसे वैदेह आदि सब मान होते हैं । इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनोंके लिये शुभ है । ब्राह्मणोंके लिये आवन्तिकमान , क्षत्रियोंके लिये गान्धारमान तथा वैश्योंके लिये कौजन्यमान है । इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये कौजन्यमान है । इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिलके मकानमें भी पानीका बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये ॥५९२ - ५९८॥
( घरमें प्रशस्त आय —) ध्वज अथवा गज आयमें ऊँट और हाथीके रहनेके लिये घर बनवावे तथा अन्य सब पशुओंके घर भी उसी ( ध्वज और गय ) आयमें बनाने चाहिये । द्वार , शय्या , आसन , छाता और ध्वजा - इन सबोंके निर्माणके लिये सिंह , वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिये ॥५९९ . १ / २॥
अब मैं नूतनगृहमें प्रवेअके लिये वास्तुपूजाकी विधि बताता हूँ - घरके मध्यभागमें तन्दुल ( चावल )- पर पूर्वसे पश्चिमकी ओर एक - एक हाथ लम्बी दस रेखाएँ खींचे । फिर उत्तरसे दक्षिणकी ओर भी उतनी ही लम्बी - चौडी दस रेखाएँ बनावे । इस प्रकार उसमें बराबर - बराबर ८१ पद ( कोष्ठ ) होते हैं । उनमें आगे बताये जानेवाले ४५ देवताओंका यथोक्र स्थानमें नामोल्लेख करे । बत्तीस देवता बाहर ( प्रान्तके कोष्ठोंमें ) और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं । उस ४५ देवताओंके स्थान और नामका क्रमश : वर्णन करता हूँ । किनारेके बत्तीस कोष्ठोंमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमश : बत्तीस देवता पूज्य हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं - कृपीट य्नि ( अग्नि ) १ , पर्जन्य २ , जयन्त , ३ , इन्द्र ४ , सूर्य ५ , सत्य ६ , भृश ७ , आकाश ८ , वायु ९ , पूषा १० , अनृत ( वितथ ) ११ , गृहक्षत १२ , यम १३ , गन्धर्व १४ , भृङ्गराज १५ , मृग १६ , पितर १७ , दौवारिक १८ , सुग्रीव १९ , पुष्प - दन्त २० , वरुण २१ , असुर २२ , शेष २३ , राजयक्ष्मा २४ , रोग २५ , अहि २६ , मुख्य २७ , भल्लाटक २८ , सोम २९ , सर्प ३० , अदिति ३१ , और दिति ३२ ,- ये चारों किनारोंके देवता हैं । ईशान अग्नि , नैऋत्य और वायुकोणके देवोंके समीप क्रमश : आप ३३ , सावित्र ३४ , जय ३५ , तथा रुद्र ३६ के पद हैं । ब्रह्माके चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमश : अर्यमा ३७ , सविता ३८ , विवस्वान्‌ ३९ , विबुधाधिप ४० , मित्र ४१ , राजयक्ष्मा ४२ , पृथ्वीधर ४३ , आपवत्स ४४ हैं और मध्यके नव पदोंमें ( ४५ ) ब्रह्माजीको स्थापित करना चाहिये । इस प्रकार सब पदोंमें ये पैंतालीस देवता पूजनीय होते हैं । जैसे ईशान - कोणमें आप , आपवत्स , पर्जन्य , अग्नि उर दिति - ये पाँच देव एकपद होते हैं , उसी प्रकार अन्य कोणोंके पाँच - पाँच देवता भी एक - पदके भागी हैं । अन्य जो बाह्य - पडक्तिके ( जयन्त , इन्द्र आदि ) बीस देवता हैं , वे सब द्विपद दो - दो पदोंके भागी ) हैं तथा ब्राह्मसे पूर्व , दक्षिण , पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा , विवस्वान्‌ , मित्र और पृथ्वीधर - ये चार देवता हैं , वे त्रिपद ( तीन - तीन पदोंके भागी ) हैं , अत : वास्तु - विधिके ज्ञाता विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्‌ , पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्‌ , द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्रोंद्वारा दूर्वा , दही , अक्षत , फूल , चन्द्रन , धूप , दीप और नैवेद्यादिसे विधिवत्‌ पूजन करे । अथवा ब्राह्ममन्त्रसे आवाहनादि षोडश ( या पञ्च ) उपचारोंद्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे ॥६०० - ६१३॥ नैवेद्यमें तीन प्रकारके ( भक्ष्य , भोज्य , लेह्य ) अन्न माङ्गलिक गीत और वाद्यके साथ अर्पण करे । अन्तमें ताम्बूल ( पान - सोपारी ) अर्पण करके वास्तुपुरुषकी इस प्रकार प्रार्थना करे ॥६१४॥
वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो ।
मद्‌गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा ॥
‘ भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष ! आपको मेरा नमस्कार है । प्रभो ! आप मेरे घरको धन - धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये । ‘
इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा करानेवाले ( पुरोहित )- को यशाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे । जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे वास्तुपूजा करता है , वह आरोग्य , पुत्र , धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है । जो मनुष्य वास्तुपूजा न करके नये घरमें प्रवेश करता है , वह नाना प्रकारके रोग , क्लेश और संकट प्राप्त करता है ॥६१५ - ६१८॥
जिसमें किंवाडें न लगी हों , जिसे ऊपरसे छत आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये ( पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके ) देवताओंको बलि ( नैवेद्य ) और ब्राह्मण आदिको भोजन न दिया गया हो , ऐसे नूतन गृहमें कभी प्रवेश न करे ; क्योंकि वह विपत्तियोंकी खान ( स्थान ) होता है ॥६१९॥
( यात्रा - प्रकरण —) अब मैं जिस प्रकारसे यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनोंके लिये अभीष्ट फलकी सिद्धि करानेवाली होती है , उस विधिका वर्णन करता हूँ । जिनके जन्म - समयका ठीक - ठीक ञान हैं , उन राजाओं तथा अन्य जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है । जिन मनुष्योंका जन्मसमय अज्ञात है , उनको तो घुणाक्षर न्यायसे ही कभी फलकी प्राप्ति जो जाती है , तथापि उनको भी प्रश्नलग्नसे तथा निमित्त और शकुन आदिद्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता है ॥६२० - ६२१॥
( यात्रामे निषिद्धि तिथियाँ —) षष्ठी , अष्टमी , द्वादशी , चतुर्थी , नवमी , चतुर्दशी , अमावास्या , पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपद - इन तिथियोंमें यात्रा करनेसे दरिद्रता तथा अनिष्टकी प्राप्ति होती है ॥६२२॥
( विहित नक्षत्र —) अनुराधा , पुनर्वसु , मृगशिरा , हस्त , रेवती , अश्विनी , श्रवण , पुष्य और धनिष्ठा - इन नक्षत्रोंमें यदि अपने जन्म - नक्षत्रसे सातवीं , पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फलको देनेवाली होती है ॥६२३॥
( दिशाशूल —) शनि और सोमवारके दिन पूर्व दिशाकी ओर न जाय , गुरुवारको दक्षिण न जाय , शुक्र और रविवारको पश्चिम न जाय तथा बुध और मङ्गलको उत्तर दिशाकी यात्रा न करे ॥६२४॥ ज्येष्ठा , पूर्वभाद्रपद , रोहिणी और उत्तराफाल्गुनी - ये नक्षत्र क्रमश : पूर्व , दक्षिण , पश्चिम और उत्तर दिशामें शूल होते हैं ।
( सर्वदिग्गमन नक्षत्र —) अनुराधा , ह्स्त , पुष्य और अश्विनी - ये चार नक्षत्र सब दिशाओंकी यात्रामें प्रशस्त हैं ॥६२५॥
( दिग्द्वार - नक्षत्र —) कृत्तिकासे आरम्भ करके सात - सात नक्षत्रसमूह पूर्वादि दिशाओंमें रह ते हैं । तथा अग्निकोणसे वायुकोणतक परिघदण्ड रहता है ; अत : इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये , जिससे परिघदण्डका लङ्घन न हो ॥६२६॥
पूर्वके नक्षत्रोंमें अग्निकोणकी यात्रा करे । इसी प्रकार दक्षिणके नक्षत्रोंमें अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तरके नक्षत्रोंमें वायुकोनकी यात्रा कर सकते हैं ।
( दिशाओंकी राशियाँ —) पूर्व आदि चार दिशाओंमें मेष आदि १२ राशियाँ पुन : ( तीन आवृत्तिसे ) आती हैं ॥६२७॥
( लालाटिकयोग —) जिस दिशामें यात्रा करनी हो , उस दिशाका स्वामी ललाटगत ( सामने ) हो तो यात्रा करनेवाला लौटकर नहीं आता है । पूर्व दिशामें यात्रा करनेवालेको लग्नमें यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है । यदि शुक्र लग्नसे ग्यारहवें या बारहवें स्थानमें हों तो अग्निकोणमें यात्रा करनेसे , मड्गल दशम भावमॆं हो तो दक्षिणयात्रा करनेसे , राहु नवें और आठवें भावमें हो तो नर्सृत्य कोणकी यात्रासे , शनि सप्तम भावमें हो तो पश्चित - यात्रासे , चन्द्रमा पाँचवें और छवे भावमें हो तो वायुकोणकी यात्रासे , बुध चतुर्थ भावमें भावमें होतो उत्तरकी यात्रासे , गुरु तीसरे और दूसरे भावमें हो तो ईशानकोणकी यात्रा करनेसे ललाटगत होते हैं । जो मनुष्य जीवनई इच्छा रखता हो , वह इस ललायोगको त्यागकर यात्रा करे ॥६२८ - ६३२॥
लग्नमें वक्रगति ग्रह या उसके षडवर्ग ( राशि - होरादि ) हों तो यात्रा करनेवाले राजाओंकी पराजय होती है ॥६३३॥
जब जिस अयन में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों , उस समय उस दिशाकी यात्रा शुभ फल देनेवाली होती है । यदि दोनों भिन्न अयनमें हों तो जिस अयनमें सूर्य हों उधर दिनमें तथा जिस अयनमें चन्द्रमा हों उधर रात्रिमें यात्रा शुभ होती है । अन्यथा यात्रा करनेसे यात्रीकी पराजय होती है ॥६३४॥
( शुक्रदोष —) शुक्र अस्त हों तो यात्रामें हानि होती है । यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है । सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है । किंतु वसिष्ठ , कश्यप , अत्रि , भरद्वाज और गौतम - इन पाँच गोत्रवालोंको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है । यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा राजओंमें युद्ध , होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका क्रोप होनेपर कहीं जाना पडे तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है । शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है । यदि शुक्र अपनी उच्चराशि ( मीन )- में हो तो यात्रामे विजय होती है ॥६३५ - ६३८॥
अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुकी राशिसे छठी राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी इस राशिमें हों , उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है । परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥६३९ - ६४०॥
द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर राशि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्नमें अशुभ है । यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है ॥६४१॥
धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके ( रेवतीपर्यन्त ) पाँच नक्षत्रोंमें गृहर्थ तृण - काष्ठोंका संग्रह , दक्षिणकी यात्रा , शय्या ( तकिया , पलङ्ग आदि )- का बनाना , घरको छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये ॥६४२॥
यदि यात्रालग्नमें जन्मलग्न , जन्मराशि या इन दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिसे ३ , ६ , ११ , १० वीं राशि हो तो शत्रुओंका नाश होता है ॥६४३॥
यदि शीर्षोदय ( मिथुन , सिंह , कन्या , तुला , कुम्भ ) तथा दिग्द्वार ( यात्राकी दिशा )- की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्नमें शुभग्रहके वर्ग ( राशि - होरादि ) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है ॥६४४॥
शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्राललग्नमें हो तो शत्रुका नाश होता है ॥६४५॥
मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग ( रास्ता ) टेढा हो जाता है । ( अर्थात्‌ बहुत घूमना पडता है । ) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है ॥६४६॥
जलचर राशि ( कर्क , मीन ) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी - न्द आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है ॥६४६ . १ / २॥
( लग्नभावोंकी संज्ञा —) १ - मूर्ति ( तन ), २ - कोष ( धन ), ३ - धन्वी ( पराक्रम , भ्राता ), ४ - वाहन ( सवारी , माता ), ५ - मन्त्र ( विद्या , संतान ), ६ - शुत्र ( रोगु , मामा ), ७ - मार्ग ( यात्रा , पति - पत्नी ), ८ - आयु ( मृत्यु ), ९ - मन ( अन्त : करण , भाग्य ), १० - व्यापार ( व्यवसाय , पिता ), ११ - प्राप्ति ( लाभ ), १२ - अप्राप्ति ( व्यय )- ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं ॥६४७ - ६४८॥
पापग्रह ( शनि , रवि , मङ्गल , राहु तथा केतु - ये ) तीसरे और ग्यारहवेंको छोडकर अन्य सब भावोंमें जानेसे भावफलको नष्ट कर देते हैं । तीसरे और ग्यारहवें भावमें जानेसे वे इन दोनों भावोंको पुष्ट करते हैं । सूर्य और मङ्गल ये दोनों दशम भावको भी नष्ट नहीं करते , अपितु दशम भावमें जानेसे उस भावफल ( व्यापार , पिता , राज्य तथा कर्म )- को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह ( चन्द्र , बुध , गुरु तथा शक्र ) जिस भावमें जाते हैं , उस भावफलको पुष्ट ही करते हैं ; केवल षष्ठ ( ६ ) भावमें जानेसे उस भावफल ( शत्रु और रोग )- को नष्ट करते हैं ॥६४९॥ शुभ ग्रहोंमें शुक्र सप्तम भावको और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम ( १ , ८ ) को पुष्ट नहीं करते हैं । ( अपितु नष्ट ही करते हैं। )
( आभिजित्‌ - प्रशंसा —) अभिजित्‌ मुहूर्त ( दिनका मध्यकाल = १२ बजेसे १ घडी आगे और १ घडी पीछे ) अभीष्ट फल सिद्ध करनेवाला योग है । यह दक्षिण दिशाकी यात्रा छोडाकर अन्य दिशाओंकी यात्रामें शुभ फल देता है । इस ( अभिजित्‌ मुहूर्त )- में पञ्चाङग ( तिथि - वारादि ) शुभ न हो तो भी यात्रामें वह उत्तम फल देवेवाला होता है ॥६५० - ६५१॥
( यात्रा - योग —) लग्न और ग्रहोंकी स्थितिसे नाना प्रकारके यात्रा - योग होते हैं । अब उन योगोंका वर्णन करता हूँ , क्योंकि राजाओं ( क्षत्रियों )- को योगबलसे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है । ब्राह्मणोंको नक्षत्रबलसे तथा अन्य मनुष्योंको मुहूर्तबलसे इष्टसिद्धि होती है । तत्करोंको शकुनबलसे अपने अभीष्टकी प्राप्ति होती है ॥६५२ . १ / २॥ शुक्र , बुध और बृहस्पति - इन तीनमेंसे कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो ‘ योग ‘ कहलाता है । यदि उनमेंसे दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो ‘ अधियोग ‘ कहलाता है तथा यदि तीनों लग्नसे केन्द्र ( १ , ४ , ७ , १० ) या त्रिकोण ( ९ , ५ )- में हों तो योगधियोग कहलाता है ॥६५३ . १ / २॥ योगमें यात्रा करनेवालोंकी कल्याण होता है । अधियोगमें यात्रा करनेसे विजय प्राप्त होती है और योगधियोगमें यात्रा करनेवालेको कल्याण , विजय तथा सम्प्पत्तिका भी लाभ होता है ॥६५४ . १ / २॥ लग्नसे दसवें स्थामें चन्द्रमा , षष्ठ स्थानमें शनि और लग्नमें सूर्य हों तो इस समयमें यात्र करनेवाले राजाको विजय तथा शत्रुकी सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥६५५ . १ / २॥ शुक्र , रवि , बुध , शनि और मङ्गल - ये पाँचों ग्रह क्रकसे लग्न चतुर्थ , सप्तम , तृतीय और षष्ठ भावमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सम्मुख आये हुए शत्रुगण आगमें पडी हुई लाहकी भाँति नष्ट हो जाते हैं ॥६५६ . १ / २॥ ब्रुहस्पति लग्नमें और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भावमें हों तो इस योगमें यात्रा करनेवाले राजाके शुत्रओंकी सेना यमराजके घर पहुँच जाती है ॥६५७ . १ / २॥ यदि लग्नमें शुक्र , ग्यारहवेंमें रवि और चतुर्थ भावमें चन्द्रमा हो तो इस योगमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है , जैसे हाथियोंके झुंडको सिंह ॥६५८ . १ / २॥
अपने उच्च ( मीन )- में स्थित शुक्र लग्नमें हो अथवा अपने उच्च ( वृष )- का चन्द्रमा लाभ ( ११ ) भावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुकी सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर देता है , जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्णने पूतनाको नष्ट कर दिता है , जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्णने पूतनाको नष्ट किया था ६५९ . १ / २॥ यदि यात्राके समय शुभग्रह केन्द्रमें या त्रिकोणमें हों तथा पापग्रह तीसरे , छठे और ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शात्रुकी लश्मी अभिसारिकाकी भाँति उसके समीप आ जात है ॥६६० . १ / २ गुरु , रवि और चन्द्रमा - ये क्रमश : लग्न , ६ और ८ में हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सामने दुर्जनोंकी मैत्रीके समान शत्रुओंकी सेना नहीं ठहरती है ॥६६१ . १ / २॥ यदि लग्नसे ३ , ६ , ११ मे पापग्रह हों और शुभ - ग्रह बलवान्‌ होकर अपने उच्चादि स्थानमें ( स्थित ) हों तो शत्रुकी भूकि यात्रा करनेवाले राजाके हाथमें आ जाती है ॥६६२ . १ / २॥ अपने उच्च ( कर्क )- में स्थित बृहस्पति यदि लग्नमें हों और चन्द्रमा ११ भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुको उसी प्रकार नष्ट कर देता है , जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था ॥६६३ . १ / २॥ शोर्षोदय ( मिथुन , सिंह , कन्या , तुला , वृश्चिक , कुम्भ ) राशिमें स्थित शुक्र यदि लग्नमें हों और गुरु ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाला पुरुष तारकासुरको कार्तिकेयकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है ॥६६ . १ / २॥ गुरु लग्नमें और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओंको वैसे ही भस्म कर देता है , जैसे वनको दावानल ॥६६५ . १ / २॥ यदि बुध लग्नमें और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्रमें हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्र करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको वैसे ही सीख लेता है , जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म - ऋतुमें क्षुद्र नदियोंको सोख लेती है ॥६६६ . १ / २॥ सम्पूर्ण शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अन्धकारको सूर्यकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है ॥६६७ . १ / २॥
शुभग्रह यदि अपनी राशिमें स्थित होकर केन्द्र ( १ , ४ , ७ , १० ), त्रिकोण ( ५ , ९ ) तथा आय ( ११ ) भावमें हो तो यात्रा करनेवाला राजा रूईको अग्निके समान अपने शत्रुओंको जलाकर भस्म कर देता है ॥६६८ . १ / २॥ चन्द्रमा दसवें भावमें और बृहस्पति केन्द्रमें हों तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणवसहित पञ्चाक्षर - मन्त्र ( ॐ नम : शिवाय ) पाप - समूहका नाश कर देता है ॥६६९ -. १ / २॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्नतें स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है , जैसे पापोंको श्रीभगवान्‌का स्मरण ॥६७० . १ / २॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांशमें हो तो यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार सपरिवार नष्ट क्रता है , जैसे इन्द्र पर्वतोंको ॥६७१ . १ / २॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्रकी राशिमें होकर केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो ऐसे समयमें यात्रा करनेवाला भूपाल सर्पोंको गरुडके समान अपने शत्रुओंको अवश्य नष्ट कर देता है ॥६७२ . १ / २॥ यदि एक भी शुभग्रह वर्गोत्तम नवमांशमें स्थित होकर केन्द्रमें हो त यात्रा करने - वाला नरेश पाप - समूहोंको गङ्गाजीके समान अपने शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर देता है ॥६७३ . १ / २॥ जो राजा शत्रुओंको जीतनेके लिये उपर्युक्त राजयोगोंमें यात्रा करता है , उसका कोपानल शत्रुओंकी स्त्रियोंके अश्रुजलसे शान्त होता है ॥६७४ . १ / २॥ आश्विन मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि ‘ विजय ‘ कहलाती हिअ । उसमें जो यात्रा करता है , उस अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त होती है अथवा शत्रुओंसे सन्धि ( मेल ) हो जाती है । किसी भी दशामें उसकी पराजय नहीं होती है ॥६७५ . १ / २॥
( मनोयज - प्रशंसा — यात्रा आदि सभी कार्योंमें निमित्त और शकुन आदि ( लग्न एवं ग्रहयोग )- की अपेक्षा भी मनोजय ( मनको वशमें तथा प्रसन्न रखना ) प्रबल है । इसलिये मनस्वी पुरुषोंके लिये यत्नपूर्वक फलसिद्धिमें मनोजय ही प्रधान कारण होता है ॥६७६ . १ / २॥
( यात्रामें प्रतिबन्ध —) यदि घरमें उत्सव , उपनयन , विवाह , प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवनकी इच्छा रखनेवालोंको बिना उत्सवको समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥६७७ . १ / २॥
( यायामें अपशकुन —) यात्राके समय यदि परस्पर हो भैंसों या चूहोंमें लडाई हो , स्त्रीसे कलह हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो , स्त्रीसे कलह हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो , वस्त्र आदि शरीरसे खिसककर गिर पडे , किसीपर क्रोध हो जाय या मुखसे दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशामें राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥३७८ . १ / २॥
( दिशा , वार तथा नक्षत्र दोहद —) यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशाकी यात्रा करे , तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशाको जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशाकी यात्रा करे तो निश्चिय ही वह शत्रुओंपर विजय पाता है । रविवारको सज्जिक ( मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही ), सोमवारको खीर , मङ्गलवारको काँजी , बुधवारको दूध , गुरुवारको दही , शुक्रवारको दूध तथा शनिवारको तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओंको जीत लेता है । अश्विनीमें कुल्माष ( उडदका एक भेद ), भरणीमें तिल , कृत्तिकामें उडद , रोहिणीमें गायका दही , मृगशिरामें गायका घी , आर्द्रामें गायका दूध , आश्लेषामें खीर , मघामें नीलकण्ठका दर्शन , हस्तमें षाष्टिक्य ( साठी धान्य )- के चावलका भात , चित्रामें प्रियङ्गु ( कँगनी ), स्वातीमें अपूप ( मालपूआ ), अनुराधामें फल ( आम , केला आदि ), उत्तराषाढमें शाल्य ( अगहनी धानका चावल ), अभिजित्‌में हविष्य , श्रवणमें कृशरात्र ( खिचडी ), धनिष्ठामें मूँग , शतभिषामें जौका आटा , उत्तरभाद्रपदमें खिचडी तथा रेवतीमें दही - भात खाकर राजा यदि हाथी , घोडे रथ या नरयान ( पालकी )- पर बैठकर यात्रा करे तो वह शत्रुओंपर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ॥६७९ - ६८४॥
( यात्राविधि — प्रज्वलित अग्निमें तिलोंसे इवन करके जिस दिशामें जाना हो , उस दिशाके स्वामीको उन्हींके समान रङ्गवाले वस्त्र , गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्‌पालोंके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे। फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणोंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेकर राजाको यात्रा करनी चाहिये ॥६८५ . १ / २॥
( दिक्‌पालोंके स्वरूपका ध्यान —) ( १ पूर्व दिशाके स्वामी ) देवराज इन्द्र शचीदेवीके साथ ऐरावतपर आरूढ हो बडी शोभा पा रहे हैं । उनके हाथमें वज्र है । उनकी कान्ति सुवर्ण - सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं । ( २ अग्निकोणके अधीश्वर ) अग्निदेवके सात हाथ , सात जिह्नाएँ और छ : मुख हैं । वे भेडपर सवार हैं , उनकी कान्ति लाल है , वे स्वाहादेवीके प्रियतम हैं तथा स्त्रुक्‌ - स्त्रुवा और नाना प्रकारके आयुध धारण करते हैं । ( ३ दक्षिण दिशाके स्वामी ) यमराजका दण्ड ही अस्त्र है । उनकी आँखें लाल हैं और वे भैंसेपर आरूढ हैं । उनके शरीरका रङ्ग कुछ लाली लिये हुए साँवला है । वे ऊपरकी और मुँह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं । ( ४ नैऋत्यकोणके अधिपति ) निऋतिका वर्ण नील है। वे अपने हाथोंमें ढाल और तलवार लिये रहते हैं ; मनुष्य ही उनका वाहन है । उनकी आँखें भयंकर तथा केश ऊपरकी ओर उठे हुए हैं । वे सामर्थ्यशाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बडी है । ( ५ पश्चिम दिशाके स्वामी ) वरुणकी अङ्गकान्ति पीली है । वे नागपाश धारण करते हैं । ग्राह उनका वाहन है । वे कालिकादेवीके प्राणनाथ हैं और रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं । ( ६ वायव्य कोणके अधिपति ) वायुदेव काले रङ्गके मृगपर आरूढ हैं । अञ्जनीके पति हैं , वे समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप हैं । उनकी दो भूजाएँ हैं और वे हाथमें दण्ड धारण करते हैं । इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करे । ( ७ उत्तर दिशाके स्वामी ) कुबेर घोडेपर सवार हैं । उनकी दो भुजाएँ हैं । वे हाथमें कलश धारण करते हैं । उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके सदृश है । वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वोंके राजा हैं । ( ८ ईशानकोणके स्वामी ) गौरीपति भगवान्‌ शङ्कर हाथमें पिनाक लिये वृषभपर आरूढ हैं । वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं । उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है । मार्थपर चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित होता है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं । ( इस प्रकार इन सब दिक्‌पालोंका ध्यान और पूजन करना चाहिये ) ॥६९३ . १ / २॥
( प्रस्थानविधि —) यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रा - लग्नमें राजा स्वयं न जा सके तो छत्र , ध्वजा , शस्त्र , अस्त्र या वाहनमेंसे किसी एक वस्तुको यात्राके निर्धारित समयमें घरसे निकालकर जिस दिशामें जाना हो , उसी दिशाकी ओर दूर रखा दे । अपने स्थानसे निर्गमस्थान ( प्रस्थान रखनेकी जगह ) २०० दण्ड ( चार हाथकी लग्गी )- से दूर होना उचित है । अथवा चालीस या कम - से - कम बारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक है । राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसीएक स्थानमें सात दिन न ठकरे । अन्य ( राज - मन्त्री तथा साधारण ) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छ : या पाँच दिन न ठहरे । यदि इससे अधिक ठहरना पडे तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचारकर यात्रा करे ॥६९६ . १ / २॥
असमयमें ( पौषसे चैत्रपर्यन्त ) बिजली चमके , मेघकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध ( दिव्य , आन्तरिक्ष और भौम ) उत्पात होने लग जाय तो राजाको सात राततक अन्य स्थानोंकी यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥६९७ . १ / २॥
( शकुन —) यात्राकालमें रला नामक पक्षी , चूहा , सियारिन , कौआ तथा कबूतर - इनके शब्द वामभागमें सुनायी दें तो शुभ होता है । छ्छुंदर , पिंगला ( उल्लू ), पल्ली और गदहा - ये यात्राके समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ हैं । कोयला , तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ जायँ तो श्रेष्ठ हैं । काले रंगको छोडकर अन्य सब रंगोंके चौपाये यदि वाम भागमें दीख पडें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमयमें कृकलास ( गिरगिट ) का दर्शन शुभ नहीं है ॥६९८ - ७००॥
यात्राकालमें सूअर , खरगोश , गोढा ( गोह ) और सर्पोंकी चर्चा शुभ होती है , किंतु किसी भूली हुई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो इनकी चर्चा अच्छी नहीं होती है । वानर और भालुओंकी चर्चाका विपरीत फल होता है ॥७०१॥
यात्रामें मोर , बकरा , नेवला , नीलकण्ठ और कबूतर दीख जायँ तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है ; परंतु लौटकर अपने नगरमें आने या घरमें प्रवेश करनेके समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ ही समझना चाहिये । यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव ( मुर्दा ) सामने दीख पडे तो यात्राके उद्देश्यकी सिद्धि होती है । परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहमें प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा दीख पडे तो वह घातक होता है ॥ ७०२ - ७०३॥
( अपशकुन —) यात्राके समय पतित , नपुंसक , जटाधारी , पागला , औषध आदि खाकर वमन ( उलटी ) करनेवाला , शरीरमें तेल लगानेवाला , वसा , हड्डी , चर्म , अङ्गार ( ज्वालारहित अग्नि ), दीर्घ रोगी , गुड , कपास ( रूई ), नमक , प्रश्न ( पूछने या टोकनेका शब्द ), तृण , गिरगिट , बन्ध्या स्त्री , कुबडा , गेरुआ वस्त्रधारी , खुले केशवाला , भूखा तथा नंशा - ये सब सामने उपस्थित हो जायँ तो अभीष्ट - सिद्धि नहीं होती है ॥७०४ - ७०५॥
( शुभ शकुन —) प्रज्वलित अग्नि , सु्न्दर घोडा , राजसिंहासन , सुन्दरी स्त्री , चन्दन आदिकी सुगन्ध , फूल , अक्षत , छत्र , चामर , होली या पालकी , राजा , खाद्य पदार्थ , ईख , फल , चिकनी मिट्टी , अन्न , शहद , घृत , दही , गोबर , चूना , धुला हुआ वस्त्र , शङ्ख , श्वेत बैल , ध्वजा , सौभाग्यवती स्त्री , भरा हुआ कलश , रत्न ( हीरा , मोती आदि ), भृङ्गार ( गडुआ ), गौ , ब्राह्मण , नगाडा , मृदङ्ग , दुन्दुभि , घण्टा तथा वीणा ( बाँसुरी ) आदि वाद्योंके शब्द , वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द - ये सब यात्राके समय यदि देखनेया सुननेमें आवें तो यात्रा करनेवाले लोगोंए सब कार्य सिद्ध करते हैं ॥७०६ - ७०९॥
( अपशकुन - परिहार —) यात्राके समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खडा होकर इष्टदेवका स्मरण करके फिर चले । दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा ( वस्त्र , द्रव्य आदिसे उनका सत्कार ) करके चले । यदि तीसरी बारा अपशकुन हो जात तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये ॥७१०॥
छींकके फल — यात्राके समय सभी दिशाओंकी छींक निन्दित है । गौकी छींक घातक होती है , किंतु बालक , वृद्ध , रोगी या कफवाले मनुष्यकी छींक निष्फल होती है ॥७११॥
परस्त्रियोंका स्पर्श करनेवाला तथा ब्राह्मण और देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा अपने छोडे हुए हाथी और घोडेकी बाँध लेनेवाला , शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले ; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योंपर कदापि हाथ न उठावे ॥७१२॥
( गृह - प्रवेश —) नये घरमें प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तमें करे । पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु - पूजा और बलि ( नैवेद्य ) अर्पण करके गृहमें प्रवेश करना चाहिये ॥७१३॥
( गृह - प्रवेशमें विहित मास —) माघ , फाल्गुन , वैशाख और ज्येष्ठ - इन चार मासोंमें गृहप्रवेश श्रेष्ठ होता है । तथा अगहन और कार्तिक इन दो मासोंमें मध्यम होता है ।
( विहित नक्षत्र —) मृगशिरा , पुष्य , रेवती , शतभिषा , चित्रा , अनुराधा और स्थिर - संज्ञक ( तीनों उत्तरा और रोहिणी ) नक्षत्रोंमें बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मङ्गलको छोडकर अन्य वारोंमें रिक्ता ( ४ , ९ , १४ ) तथा अमावास्या छोडकर अन्य तिथियोंमें दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है । चन्द्रबल और ताराबलसहित उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह्ण भागमें स्थिर राशिके नवमांशयुक्त स्थिर लग्नमें जब लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध ( ग्रहरहित ) हो , शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्रमें हों , पापग्रह ३ , ६ , ११ भावोंमें हों और चन्द्रमा लग्न , १२ , ८ , ६ इनसे भिन्न स्थानोंमें हों , तब गृह - प्रवेश करनेवाले यजमानकी जन्मराशि , जन्मलग्न या इन दोनोंसे उपचय ( ३ , ६ , १० , ११ वीं ) राशिके गृह - प्रवेश लग्नमें विद्यमान होनेपर सब प्रकारके सुख और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है । अन्यथा इससे विपरीत समयमें गृह - प्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है ॥७१४ - ७१९॥
( प्रवेश - विधि — जिस नूतन गृहमें प्रवेश करना , हो , उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा पुष्प - तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद - ध्वनि , शान्तिपाठ , सौभाग्यवती स्त्रियोंके माङ्गलिक गीत तथा वाद्य आदिके शब्दोंके साथ सूर्यको वाम भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिये ॥७२०॥
( वृष्टि - विचार —) वर्षा - प्रवेश ( आर्द्रा नक्षत्रमें सूर्यके प्रवेश )- के समय यदि शुक्लपक्ष हो , चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्नसे केन्द्र ( १ , ४ , ७ , १० )- में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों तो आधिक वृष्टि होती है । यदि उस समय चन्द्रमापर पापग्रहकी दृष्टि हो तो दीर्घकालमें अल्पवृष्टि समझनी चाहिये । ( इससे सिद्ध होता है कि यदि चन्द्रमापर पाप और शुभ दोनों ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है । ) जिस प्रकार चन्द्रमासे फल कहा गया है , उसी प्रकार उस समय शुक्रसे भी समझना चाहिये । ( अर्थात्‌ सूर्यके आर्द्रा - प्रवेशके समय चन्द्रमा और शुक्र दोनोंकी स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समझना चाहिये ) ॥७२१ - ७२२॥
वर्षाकालमें आर्द्रासे स्वातीतक सूर्यके रहनेपर चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तस स्थानमें अथवा शनिसे पञ्चम , नवम तथा सप्तम स्थानमें हो < उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि पडे तो उस समय अवश्य वर्षा होती है ॥७२३॥
यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती ( एक राशिमें स्थित ) हों तो लत्काल वर्षा होती है । किंतु उन दोनों ( बुध और शुक्र )- के बीचमें सूर्य हों तो वृष्टिका अभाव होता है ॥७२४॥
यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रोंमें शुक्र पूर्व दिशामें उदित हों और स्वातीसे तीन नक्षत्रों ( स्वाती , विशाखा , अनुराधा )- में शुक्र पश्चिम दिशामें उदित हों तो निश्चय ही वर्षा होती है । इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिये ॥७२५॥
यदि सूर्यके समीप ( एक राशिके भीतर होकर ) कोई ग्रह आगे या पीछे पडते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं ; किंतु उनकी गति वक्र न हुई हो तभी ऐसा होता है ॥७२६॥
दक्षिण गोल ( तुलासे मीनतक )- में शुक्र यदि सूर्यसे वाम भागमें पडे तो वृष्टिकारक होता है । उदय या अस्तके समय यदि आर्द्रामें सूर्यका प्रवेश हो तो भी वर्षा होती है ॥७२७॥
यदि सूर्यका आर्द्रा - प्रवेश सन्ध्याके समय हो तो शस्य ( धान )- की वृद्धि होती है । यदि रात्रिमें हो तो मनुष्योंको सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है । यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा , गुरु , बुध एवं शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमश : अल्पवृष्टि , धान्य - हानि , अनावृष्टि और धान्य - वृद्धि होती है ; इसमें संशय नहीं है । यदि ये चारों चन्द्र , बुध , गुरु और शुक्र प्रवेश - लग्नसे केन्द्रमें पडते हों तो ईति ( खेतीके टिड्डी आदि सब उपद्रव )- का नाश होता है ॥७२८ - ७२९॥
यदि सूर्य पूर्वाषाढ नक्षत्रमें प्रवेशके समय मेघोंसे आच्छन्न हों तो आर्द्रासे मूलतक प्रतिदिन वर्षा होती है ॥७३०॥
यदि रेवतीमें सूर्यके प्रवेश करते समय वर्षा हो जाय तो उससे द्स नक्षत्र ( रेवतीसे आश्लेषा )- तक वर्षा नहीं होती है । सिंह - प्रवेशमें अभिन्न हो एवं कन्या - प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है ॥७३१ . १ / २॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य , रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है । अश्विनीको सर्वधान्योंका नाशक कहा गया है । वर्षाकाल ( चातुर्मास्य )- में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरुसे सप्तम राशिंएं निर्बल हों तो आर्द्रासे सात नक्षत्रतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है । चन्द्रमण्डलमें परिवेष ( घेरा ) हो और उत्तर दिशामें बिजली दीख पडे या मेढकोंके शब्द सुनायी पडें तो निश्चय ही वर्षा होती है । पश्चिम भागमें लटका हुआ मेघ यदि आकाशके बीचमें होकर दक्षिण दिशामें जाय तो शीघ्र वर्षा होती है । बिलाव अपने नाखूनोंसे धरतीको खोदे , लोहे ( तथा ताँबे और कांसी आदि )- में मल जमने लगे अथवा बहुत - से बालक मिलकर सडकोंपर पुल बाँधें तो ये वर्षाके सूचक चिह्न हैं ।
चींटीकी पङक्ति छिन्न - भिन्न हो जाय , आकाशमें बहुतेरे जुगुनू दीख पडें तथा सर्पोंका वृक्षपर चढना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुर्वृष्टि - सूचक हैं ।
उदय या अस्त - समयमें यदि सूर्य या चन्द्रमाका रंग बदला हुआ जान पडे या उनकी कान्ति मधुके समान दीख पडे तथा बडे जोरकी हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है ॥७३८ . १ / २॥
( पृथ्वीके आधार कूर्मके अङ्ग - विभाग —) कूर्मदेवता पूर्वकी ओर मुख करके स्थित हैं , उनके नव अङ्गोंमें इस भारत भूमिके नौ विभाग करके प्रत्येक खण्डमें प्रदक्षिणक्रमसे विभिन्न मण्डलों ( देशों )- को समझे । अन्तर्वेदी ( मध्यभाग )- में पाञ्चालदेश स्थित है , वही कूर्मभगवान्‌का नाभिमण्डल है । मगध और लाट देश पूर्व दिशामें विद्यमान हैं , वे ही उनका मुखमण्डल हैं । स्त्री , कलिङग और किरात देश भुजा हैं । अवन्ती , द्रविड और भिल्लदेश उनका दाहिना पार्श्व हैं । गौड , कौंकण , शाल्व , आन्ध्र उओर पौण्ड देश - ये सब देश दोनों अगले पैर हैं । सिन्ध , काशी , महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र देश पुच्छ - भाग हैं । पुलिन्द चीन , यवन और गुर्जर - ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं । कुरु , काश्मीर , मद्र तथा मत्स्य - देश वाम पार्श्व हैं । खस ( नेपाल ) अङ्ग , वङ्ग , वाह्नीक और काम्बोज - ये दोनों हाथा हैं ॥७३९ - ७४४॥
इन नवों अङ्गोंमें क्रमश : कृत्तिका आदि तीन - तीन नक्षत्रोंका न्यास करे । जिस अङ्गके नक्षत्रमें पापग्रह रहते हैं , उस अङ्गके देशोंमें तबतक अशुभ फल होता है और जिस अङ्गके नक्षत्रोंमें शुभग्रह रहते हैं , उस अङ्गके देशोंमें शुभ फल होते हैं ॥७४५॥
( मूर्ति - प्रतिमा - विकार —) देवताओंकी प्रतिमा यदि नीचे गिर पडे , जले , बार - बार रोये , गावे , पसीनेसे तर हो जाय , हँसे , अग्नि , धुआँ , तेल , शोणित , दूध या जलका वमन करे , अधोमुख हो जाय , एक स्थानसे दूसरे स्थानमें चली जाय तथा इसी तरहकी अनेक अद्भुत बातें दीख पडें तो यह प्रतिमा - विकार कहलाता है । यह विकार अशुभ फलका सूचक होता है ।
( विविध विकार —) यदि आकाशमें गन्धर्वनगर ( ग्रामके समान आकार ), दिनमें ताराओंका दर्शन , उत्कापतन , काष्ठ , तृण और शोणितकी वर्षा , गन्धर्वोंका दर्शन , दिग्दाह , दिशाओंमें ‘ धूम छा जाना , दिन या रात्रिमें भूकम्प होना , बिना आगके स्फुल्लिङ्ग ( अङ्गार ) दीखना , बिना लकडीके आगका जलना , रात्रिमें इन्द्रधनुष या परिवेष ( घेरा ) दीखना पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ दीखायी पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ दिखायी देना तथा आगकी चिनगारियोंका प्रकट होना आदि बातें दिखायी देने लगें , गौ , हाथी और घोडोंके दो या तीन मस्तकवाला बच्चा पैदा हो , प्रात : काल एक साथ ही चारों दिशाओंमें अरूणोदय - सा प्रतीत हो , गाँवमें गीदडोंका दिनमें बास हो , धूम - केतुओंका दर्शन होने लगे तथा रात्रिमें कौओंका और दिनमें कबूतरोंका क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं । वृक्षोंमें बिना समयके फूल या फल दीख पडें तो उस वृक्षको काट देना चाहिये और उसकी शान्ति कर लेनी चाहिये । इस प्रकारके और भी जो बडे - बडे उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं , वे स्थान ( देश या ग्राम )- का नाश करनेवाले होते हैं । कितने ही उत्पात घातक होते हैं ; कितने ही शत्रुओंसे भय उपस्थित करते हैं । कितने ही उत्पातोंसे भय , यश , मृत्यु , हानि , कीर्ति , सुख - दु : ख और ऐश्वर्यकी भी प्राप्ति होती है । यदि वल्मीक ( दीमककी मिट्टीके ढेर )- पर शाह्द दीख पडे तो धनको हानि होती है । द्विजश्रेष्ठ ! इस तरहके सभी उत्पातोंमें यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधिसे शान्ति अवश्य कर लेनी चाहिये । नारदजी ! इस प्रकार संक्षेपसे मैंने ज्यौतिषशास्त्रका वर्णन किया है । अब वेदके छहों अङ्गोंमें श्रेष्ठ छन्दा : शास्त्रका परिचय देता हूँ ॥७४६ - ७५८॥ ( पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५६ )

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