श्रीविष्णुपुराण - चतुर्थ अंश - अध्याय ११

श्रीपराशरजी बोले -
अब मैं ययातिके प्रथम पुत्र यदुके वंशका वर्णन करत हूँ, जिसमें कि मनुष्य, सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, राक्षस गृह्याक, किंपुरुष, अप्सरा, सर्प, पक्षी, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्रण, देवर्षि, मुमुक्षु तथा धर्म, अर्थ , काम और मोक्षके अभिलाशी पुरुषोंद्वारा,सर्वदा स्तुति किये जानेवाले, अखिललोक - विश्राम आद्यन्तहीन भगवान् विष्णुने अपने अपरिमित महत्वशाली अंशसे अवतार लिया था । इस विषयमें यह श्‍लोक प्रसिद्ध है ॥१-३॥
‘ जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्मने अवतार लिया था उस यदुवंशका श्रवण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता हैं ॥४॥
यदुके सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल और नटुष नामक चार पुत्र हुए । सहस्त्राजित्‌के शतजित और शतजित्‌के हैहय, हेहय तथा वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए ॥५-७॥
हैहयाका पुत्र धर्म, धर्मका धर्मनेत्र, धर्मनेत्रका कुन्ति, कुन्तिका सहजित तथा सहजितका पुत्र महिष्मान हुआ, जिसने माहिष्मतीपुरीको बसाया ॥८-९॥
महिष्मानके भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यके दुर्दम, दुर्दमके धनक तथा धनकके, कृतवीर्य कृताग्नि, कृतधर्म और कृतौजा नामक चार पुत्र हुए ॥१०॥
कृतवीर्यके सहस्त्र भुजाओंवाले सप्तद्वीपधिपति अर्जुनका जन्म हुआ ॥११॥
सहस्त्रार्जुनने अत्रिकुलमें उप्तन्न भगवदंशरूप श्रीदत्तात्रेयजीकी उपासना कर ‘ सहस्त्र भुजाएँ, अधर्माचरणका निवारण, स्वधर्मका सेवन, युद्धके द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विजय, धर्मानुसार प्रजा-पालन, शत्रुओंसे अपराजय तथा त्रिलोकप्रसिद्ध पुरुषसे मृत्यु ‘ ऐसे कई वर माँगे और प्राप्त किये थे ॥१२॥
अर्जुनने इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका पालन तथा दस हजार यज्ञॊंका अनुष्ठान किया था ॥१३-१४॥
उसके विषयमें यह श्‍लोक आजतक कहा जाता है ॥१५॥
‘ यज्ञ, दान, तप, विनय, और विद्यामें कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुनकी समता कोई भी राजा नहीं कर सकता’ ॥१६॥
उसके राज्यमें कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता था ॥१७॥
इस प्रकार उसने बल, पराक्रम, आरोग्य, और सम्पत्तिको सर्वथा सुरक्षित रखते हुए पचासी हजार वर्ष राज्य किया ॥१८॥
एक दिन जब वह अतिशय मद्यपानसे व्याकुल हुआ नर्मदा नदीमें जल - क्रिडा कर रहा था, उसकी राजधानी माहिष्मातीपुरीपर दिग्विजयके लिये आये हुए सम्पूर्ण देव , दानव, गन्धर्व और राजाओंके विजयमदसे उन्मत्त रावणने आक्रमण किया, उस समय उसने अनायास ही रावणको पशुके समान बाँधकर अपने नगरके एक निर्जन स्थानमें रख दिया ॥१९॥
इस सहस्त्रार्जुनक पचासी हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् नारायणके अंशावतार परशुरामजीने वध किया था ॥२०॥
इसके सौ पुत्रोंमेंसे शूर, शरसेन, वृषसेन, मधु और जयध्वज - ये पाँच प्रधान थे ॥२१॥
जयध्वजका पुत्र तालजंघ हुआ और तालजंघके तालजंघ नामक सौ पुत्र हुए इनमें सबसे बड़ा वीतिहोत्र तथा दुसरा भरत था ॥२२-२४॥
भरतके वृष, वृषके मधु और मधुके वृष्णि आदि सौ पुत्र हुए ॥२५-२७॥
वृष्णिके कारण यह वंश वृष्णि कहलाया ॥२८॥
मधुके कारण इसकी मधु-संज्ञा हुई ॥२९॥
और यदुके नामानुसार इस वंशके लोग यादव कहलाये ॥३०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे एकदशोऽध्यायः ॥११॥

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