category 'विष्णु पुराण द्वितीय सर्ग Vishnu Puran'

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १६

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १६

ब्राह्मण बोले - हे नरेश्वर ! तदनन्तर सहस्त्र वर्ष व्यतीत होनेपर महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये उसी नगरको गये ॥१॥ वहाँ पहूँचनेपर उन्होंने देखा कि वहाँका राजा बहुत -...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १५

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १५

श्रीपराशरजी बोले- हे मैत्रेय ! ऐसा कहनेपर, राजाको मौन होकर मन-ही-मन-सोच-विचार करते देख वे विप्रवर यह अद्वैत - सम्बन्धिनी कथा सुनाने लगे ॥१॥ ब्राह्मण बोले - हे राजाशार्दुल ! पूर्वकालमें...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १४

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १४

श्रीपराशरजी बोले - उनके ये परमार्थमय वचन सुनकर राजाने विनयावनत होकर उन विप्रवरसे कहा ॥१॥ राजा बोले - भगवान् ! आपने जो परमार्थमय वचन कहे हैं उन्हें सुनकर मेरी मनोवृत्तियाँ...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १३

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १३

श्रीमैत्रजी बोले - हे भगवान् ! मैंने पृथिवी, समुद्र, नदियों और ग्रहगणकी स्थिति आदिंके विषयमें जो कुछ पूछा था सो सब आपने वर्णन कर दिया ॥१॥ उसके साथ ही आपने...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १२

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १२

श्रीपराशरजी बोले - चन्द्रमाका रथ तीन पहिंयोवाला है, उसके वाम दक्षिण ओर कुन्दकुसुमके समान श्वेतगर्ण दस घोडे़ जुते हुए हैं । ध्रुवके आधारपर स्थित उस वेगशाली रथसे चन्द्रदेव भ्रमण करते...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ११

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ११

श्रीमैत्रेयजी बोले - भगवान् ! आपने जो कहा कि सूर्यमण्डलमें स्थित सातों गण शीत-ग्रीष्म आदिके कारण होते हैं, सो मैंने सुना ॥१॥ हे गुरो ! आपने सूर्यके रथमेजं स्थित और...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १०

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १०

श्रीपराशरजी बोले - आरोह और अवरोहके द्वारा सूर्यको एक वर्षमें जितनी गति हैं उस सम्पूर्ण मार्गकी दोनों काष्ठाओंका अन्तर एक सौ अस्सी मण्डल है ॥१॥ सूर्यका रथ ( प्रति मास...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ९

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ९

श्रीपराशरजी बोले- आकाशमें भगवान् विष्णुका जो शिशुमार ( गिरगिट अथवा गोधा ) के समान आकारवाला तारामय स्वरूप देखा जाता है, उसके पुच्छ-भागमें ध्रुव अवस्थित है ॥१॥ यह ध्रुव स्वयं घुमता...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ८

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ८

श्रीपराशरजी बोले - हे सुव्रत ! मैंने तुमसे यह ब्रह्माण्डकी स्थिति कही, अब सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति और उनके परिमाण सुनो ॥१॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ७

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ७

श्रीमैत्रेयजी बोले - ब्रह्मन् ! आपने मुझसे समस्त भूमण्डलका वर्णन किया ! हे मुने ! अब मैं भुवलोंक आदि समस्त लोकोंके विषयमें सुनना चाहता हूँ ॥१॥ हे महाभाग ! मुझे...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ६

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ६

श्रीपराशरजी बोले - हे विप्र ! तदनन्तर पृथिवी और जलके नीचे नरक हैं जिनमें पापी लोग गिराये जाते हैं । हे महामुने ! उनका विवरण सुनो ॥१॥ रौरव , सूकर,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ५

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ५

श्रीपराशरजी बोले - हे द्विज ! मैंने तुमसे यह पृथिवीका विस्तार कहा; इसकी ऊँचाई भी सत्तर सहस्त्र योजन कही जाती हैं ॥१॥ हे मुनिसत्तम ! अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान, महातल,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ४

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ४

श्रीपराशरजे बोले - जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरें हुए प्लक्षद्वीप स्थित है ॥१॥ जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और हे ब्रह्मन ! प्लक्षद्वीपका...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ३

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ३

श्रीपराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! जो समुद्रके उत्तर तथा हिमालयके दक्षिणमें स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है । उसमें भरतकी सन्तान बसी हुई है ॥१॥ हे महामुने !...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय २

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय २

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे ब्रह्मन ! अपने मुझसे स्वायम्भुवमनुके वंशका वर्णन किया । अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विवरण सुनना चाहता हूँ ॥१॥ हे मुने ! जितने भी सागर,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे भगवान् ! हे गुरो ! मैंने जगत्‌की सृष्टीके विषयमें जो कुछ पूछा था वह सब आपने मुझसे भली प्रकार कह दिया ॥१॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! जगत्‌की...