रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : अयोध्या काण्ड दोहा १ से १०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

अयोध्या काण्ड श्लोक   अयोध्या काण्ड दोहा ११ से २०

दोहा

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु ॥१॥
चौपाला
एक समय सब सहित समाजा । राजसभाँ रघुराजु बिराजा ॥
सकल सुकृत मूरति नरनाहू । राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू ॥
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें । लोकप करहिं प्रीति रुख राखें ॥
तिभुवन तीनि काल जग माहीं । भूरि भाग दसरथ सम नाहीं ॥
मंगलमूल रामु सुत जासू । जो कछु कहिज थोर सबु तासू ॥
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा । बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा ॥
श्रवन समीप भए सित केसा । मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा ॥
नृप जुबराज राम कहुँ देहू । जीवन जनम लाहु किन लेहू ॥

दोहा

यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ ॥२॥

चौपाला

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक । भए राम सब बिधि सब लायक ॥
सेवक सचिव सकल पुरबासी । जे हमारे अरि मित्र उदासी ॥
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही । प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही ॥
बिप्र सहित परिवार गोसाईं । करहिं छोहु सब रौरिहि नाई ॥
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥
अब अभिलाषु एकु मन मोरें । पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें ॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू । कहेउ नरेस रजायसु देहू ॥

दोहा

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार ॥३॥

चौपाला

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी । बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी ॥
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू । कहिअ कृपा करि करिअ समाजू ॥
मोहि अछत यहु होइ उछाहू । लहहिं लोग सब लोचन लाहू ॥
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं । यह लालसा एक मन माहीं ॥
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ । जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ ॥
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए । मंगल मोद मूल मन भाए ॥
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं । जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी । रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥

दोहा

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु ॥४॥

चौपाला

मुदित महिपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए ॥
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए । भूप सुमंगल बचन सुनाए ॥
जौं पाँचहि मत लागै नीका । करहु हरषि हियँ रामहि टीका ॥
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी । अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी ॥
बिनती सचिव करहि कर जोरी । जिअहु जगतपति बरिस करोरी ॥
जग मंगल भल काजु बिचारा । बेगिअ नाथ न लाइअ बारा ॥
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा । बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा ॥

दोहा

कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ ॥५॥

चौपाला

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी । आनहु सकल सुतीरथ पानी ॥
औषध मूल फूल फल पाना । कहे नाम गनि मंगल नाना ॥
चामर चरम बसन बहु भाँती । रोम पाट पट अगनित जाती ॥
मनिगन मंगल बस्तु अनेका । जो जग जोगु भूप अभिषेका ॥
बेद बिदित कहि सकल बिधाना । कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना ॥
सफल रसाल पूगफल केरा । रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा ॥
रचहु मंजु मनि चौकें चारू । कहहु बनावन बेगि बजारू ॥
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा । सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा ॥

दोहा

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग ॥६॥

चौपाला

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मंगल काजा ॥
सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं । भरत आगमनु सूचक अहहीं ॥
भए बहुत दिन अति अवसेरी । सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी ॥
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं । इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं ॥
रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती ॥

दोहा

एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु ॥७॥

चौपाला

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए । भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए ॥
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं । मंगल कलस सजन सब लागीं ॥
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी । मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी ॥
आनँद मगन राम महतारी । दिए दान बहु बिप्र हँकारी ॥
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा । कहेउ बहोरि देन बलिभागा ॥
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू ॥
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं । बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं ॥

दोहा

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ॥८॥

चौपाला

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ॥
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥
सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥
गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी ॥
सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू ॥
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती ॥
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू ॥
आयसु होइ सो करौं गोसाई । सेवक लहइ स्वामि सेवकाई ॥

दोहा

सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।
राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस ॥९॥

चौपाला

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ । बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ ॥
भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू ॥
राम करहु सब संजम आजू । जौं बिधि कुसल निबाहै काजू ॥
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ । राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ ॥
जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई ॥
करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भए उछाहा ॥
बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

दोहा

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद ॥१०॥

चौपाला

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना । पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना ॥
भरत आगमनु सकल मनावहिं । आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं ॥
हाट बाट घर गलीं अथाई । कहहिं परसपर लोग लोगाई ॥
कालि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा ॥
कनक सिंघासन सीय समेता । बैठहिं रामु होइ चित चेता ॥
सकल कहहिं कब होइहि काली । बिघन मनावहिं देव कुचाली ॥
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा । चोरहि चंदिनि राति न भावा ॥
सारद बोलि बिनय सुर करहीं । बारहिं बार पाय लै परहीं ॥

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