रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : अयोध्या काण्ड दोहा १३१ से १४०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

अयोध्या काण्ड दोहा १२१ से १३०   अयोध्या काण्ड दोहा १४१ से १५०

दोहा

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥१३१॥

चौपाला

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए । बचन सप्रेम राम मन भाए ॥
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक । आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥
चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ॥
सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥
नदी पुनीत पुरान बखानी । अत्रिप्रिया निज तपबल आनी ॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि । जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं । करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥
चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥

दोहा

चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥१३२॥

चौपाला

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ॥
लखन दीख पय उतर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥
नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना ॥
चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठभेरी ॥
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना । चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥
कोल किरात बेष सब आए । रचे परन तृन सदन सुहाए ॥
बरनि न जाहि मंजु दुइ साला । एक ललित लघु एक बिसाला ॥

दोहा

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥१३३॥

मासपारायण , सत्रहँवा विश्राम

चौपाला

अमर नाग किंनर दिसिपाला । चित्रकूट आए तेहि काला ॥
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ॥
बरषि सुमन कह देव समाजू । नाथ सनाथ भए हम आजू ॥
करि बिनती दुख दुसह सुनाए । हरषित निज निज सदन सिधाए ॥
चित्रकूट रघुनंदनु छाए । समाचार सुनि सुनि मुनि आए ॥
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा । कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ॥
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं । सुफल होन हित आसिष देहीं ॥
सिय सौमित्र राम छबि देखहिं । साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥

दोहा

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ॥१३४॥

चौपाला

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥
कंद मूल फल भरि भरि दोना । चले रंक जनु लूटन सोना ॥
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता । अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता ॥
कहत सुनत रघुबीर निकाई । आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे । प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे ॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े । पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ॥
राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ॥
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी । बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ॥

दोहा

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय ॥१३५॥

चौपाला

धन्य भूमि बन पंथ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥
धन्य बिहग मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ॥
हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा ॥
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥
हम सब भाँति करब सेवकाई । करि केहरि अहि बाघ बराई ॥
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥
हम सेवक परिवार समेता । नाथ न सकुचब आयसु देता ॥

दोहा

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥१३६॥

चौपाला

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥
राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥
बिदा किए सिर नाइ सिधाए । प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ॥
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई । बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ॥
जब ते आइ रहे रघुनायकु । तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ॥
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना ॥मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥
गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी । त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी ॥

दोहा

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥१३७॥

चौपाला

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥
फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी ॥
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि राम बनु सकल सिहाहीं ॥
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥
सब सर सिंधु नदी नद नाना । मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू । मंदर मेरु सकल सुरबासू ॥
सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥
बिंधि मुदित मन सुखु न समाई । श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥

दोहा

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥१३८॥

चौपाला

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥
परसि चरन रज अचर सुखारी । भए परम पद के अधिकारी ॥
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन । मंगलमय अति पावन पावन ॥
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू । सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥
पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन । जौं सत सहस होंहिं सहसानन ॥
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥
सेवहिं लखनु करम मन बानी । जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥

दोहा

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥१३९॥

चौपाला

राम संग सिय रहति सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ॥
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी । प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी ॥
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी । हरषित रहति दिवस जिमि कोकी ॥
सिय मनु राम चरन अनुरागा । अवध सहस सम बनु प्रिय लागा ॥
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा । प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा ॥
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर । असनु अमिअ सम कंद मूल फर ॥
नाथ साथ साँथरी सुहाई । मयन सयन सय सम सुखदाई ॥
लोकप होहिं बिलोकत जासू । तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू ॥

दोहा

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥१४०॥

चौपाला

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं । सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं ॥
कहहिं पुरातन कथा कहानी । सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।
जब जब रामु अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेहु सीलु सेवकाई ॥
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी । धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी ॥
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं । जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं ॥
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु । धीर कृपाल भगत उर चंदनु ॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता ॥

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