रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : अयोध्या काण्ड दोहा १७१ से १८०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

अयोध्या काण्ड दोहा १६१ से १७०   अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०

दोहा

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥१७१॥

चौपाला

अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥

दोहा

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग ॥१७२॥

चौपाला

बैखानस सोइ सोचै जोगु । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ॥
सोचनीय सबहि बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥
सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥
भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥

दोहा

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥१७३॥

चौपाला

सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥
करहु सीस धरि भूप रजाई । हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥
परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥

दोहा

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥१७४॥

चौपाला

अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू । तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू ॥
बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥
करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥
कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥
सौंपेहु राजु राम कै आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥

दोहा

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥१७५॥

चौपाला

कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥
सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥
बन रघुपति सुरपति नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ॥
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥

छंद

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ॥
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥

सोरठा

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥१७६॥

मासपारायण , अठारहवाँ विश्राम
चौपाला

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का ॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू । धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोषु न जी कें ॥
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥

दोहा

 

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥१७७॥

चौपाला

हित हमार सियपति सेवकाई । सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥
मैं अनुमानि दीख मन माहीं । आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥
सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥
बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ॥
सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥
जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥
जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आँक मोर हित एहू ॥
मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥

दोहा

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥१७८॥

चौपाला

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू । चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥
मोहि समान को पाप निवासू । जेहि लगि सीय राम बनबासू ॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा । बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ॥
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू । बैठ बात सब सुनउँ सचेतू ॥
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू । रहे प्रान सहि जग उपहासू ॥
राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ॥
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई । निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई ॥

दोहा

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥१७९॥

चौपाला

कैकेई भव तनु अनुरागे । पाँवर प्रान अघाइ अभागे ॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे । देखब सुनब बहुत अब आगे ॥
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू ॥
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकेईं सब कर काजू ॥
एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥
कैकई जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ॥
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई ॥

दोहा

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥१८०॥

चौपाला

कैकइ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई ॥
दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ॥
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका ॥
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ॥
मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ॥
मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ॥
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहि दूषन काहू ॥
संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ॥

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