रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : अयोध्या काण्ड दोहा १९१ से २००

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

अयोध्या काण्ड दोहा १८१ से १९०   अयोध्या काण्ड दोहा २०१ से २१०

दोहा

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ॥१९१॥

चौपाला

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ॥
जीवत पाउ न पाछें धरहीं । रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं ॥
दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू ॥
एतना कहत छींक भइ बाँए । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए ॥
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ॥
रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ॥
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ॥
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ॥

दोहा

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ॥१९२॥

चौपाला

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ । बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ॥
अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कंद मूल फल खग मृग मागे ॥
मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाए ॥
देखि दूरि तें कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ॥
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥
राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ॥
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ॥

दोहा

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ ॥१९३॥

चौपाला

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती । लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ॥
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ॥
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा । जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ॥
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता । मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥
राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जगु पावन कीन्हा ॥
करमनास जलु सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ॥
उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥

दोहा

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥१९४॥

चौपाला

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई । केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ॥
राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं ॥
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ॥
देखि भरत कर सील सनेहू । भा निषाद तेहि समय बिदेहू ॥
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा । भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ॥
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥
कुसल मूल पद पंकज पेखी । मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ॥
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें । सहित कोटि कुल मंगल मोरें ॥

दोहा

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥१९५॥

चौपाला

कपटी कायर कुमति कुजाती । लोक बेद बाहेर सब भाँती ॥
राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ॥
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ॥
कहि निषाद निज नाम सुबानीं । सादर सकल जोहारीं रानीं ॥
जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ॥
निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी ॥
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू । भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ॥
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई । प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ॥

दोहा

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ॥१९६॥

चौपाला

सृंगबेरपुर भरत दीख जब । भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ॥
सोहत दिएँ निषादहि लागू । जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ॥
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा । दीखि जाइ जग पावनि गंगा ॥
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ॥
करहिं प्रनाम नगर नर नारी । मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ॥
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी । रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ॥
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥
जोरि पानि बर मागउँ एहू । सीय राम पद सहज सनेहू ॥

दोहा

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ॥१९७॥

चौपाला

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा । भरत सोधु सबही कर लीन्हा ॥
सुर सेवा करि आयसु पाई । राम मातु पहिं गे दोउ भाई ॥
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी । जननीं सकल भरत सनमानी ॥
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई । आपु निषादहि लीन्ह बोलाई ॥
चले सखा कर सों कर जोरें । सिथिल सरीर सनेह न थोरें ॥
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ । नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ॥
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए ॥
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ॥

दोहा

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ॥१९८॥

चौपाला

कुस साँथरी íनिहारि सुहाई । कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ॥
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई । बनइ न कहत प्रीति अधिकाई ॥
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे । राखे सीस सीय सम लेखे ॥
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी । कहत सखा सन बचन सुबानी ॥
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना । जथा अवध नर नारि बिलीना ॥
पिता जनक देउँ पटतर केही । करतल भोगु जोगु जग जेही ॥
ससुर भानुकुल भानु भुआलू । जेहि सिहात अमरावतिपालू ॥
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई । जो बड़ होत सो राम बड़ाई ॥

दोहा

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ॥१९९॥

चौपाला

लालन जोगु लखन लघु लोने । भे न भाइ अस अहहिं न होने ॥
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे । सिय रघुबरहि प्रानपिआरे ॥
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ । तात बाउ तन लाग न काऊ ॥
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती । निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती ॥
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर । रूप सील सुख सब गुन सागर ॥
पुरजन परिजन गुर पितु माता । राम सुभाउ सबहि सुखदाता ॥
बैरिउ राम बड़ाई करहीं । बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥
सारद कोटि कोटि सत सेषा । करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥

दोहा

सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ॥२००॥

चौपाला

राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ॥
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती । जोगवहिं जननि सकल दिन राती ॥
ते अब फिरत बिपिन पदचारी । कंद मूल फल फूल अहारी ॥
धिग कैकेई अमंगल मूला । भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ॥
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी । सबु उतपातु भयउ जेहि लागी ॥
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ । साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ॥
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ करिअ कत बादि बिषादू ॥
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ॥

छंद

बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी।
तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ॥
तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ।
परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ ॥

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