रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : अयोध्या काण्ड दोहा २९१ से ३००

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

अयोध्या काण्ड दोहा २८१ से २९०   अयोध्या काण्ड दोहा ३०१ से ३१०

दोहा

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ॥२९१॥

चौपाला

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे । लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे ॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं । आए इहाँ कीन्ह भल नाही ॥
रामहि रायँ कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ॥
हम अब बन तें बनहि पठाई । प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी । भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ॥
समउ समुझि धरि धीरजु राजा । चले भरत पहिं सहित समाजा ॥
भरत आइ आगें भइ लीन्हे । अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ । तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥

दोहा

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ॥
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥२९२॥

चौपाला

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी । बोले भरतु धीर धरि भारी ॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू । कुलगुरु सम हित माय न बापू ॥
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू । ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू ॥
सिसु सेवक आयसु अनुगामी । जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ॥
एहिं समाज थल बूझब राउर । मौन मलिन मैं बोलब बाउर ॥
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता । छमब तात लखि बाम बिधाता ॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥

दोहा

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि ॥२९३॥

चौपाला

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ । सहित समाज सराहत राऊ ॥
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे । अरथु अमित अति आखर थोरे ॥
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥
भूप भरत मुनि सहित समाजू । गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू ॥
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा । मनहुँ मीनगन नव जल जोगा ॥
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी । निरखि बिदेह सनेह बिसेषी ॥
राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥
सब कोउ राम पेममय पेखा । भउ अलेख सोच बस लेखा ॥

दोहा

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥२९४॥

चौपाला

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही । देबि देव सरनागत पाही ॥
फेरि भरत मति करि निज माया । पालु बिबुध कुल करि छल छाया ॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी । बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥
मो सन कहहु भरत मति फेरू । लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत मति सकइ निहारी ॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी । चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ॥
भरत हृदयँ सिय राम निवासू । तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥
अस कहि सारद गइ बिधि लोका । बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥

दोहा

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु ॥
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ॥२९५॥

चौपाला

करि कुचालि सोचत सुरराजू । भरत हाथ सबु काजु अकाजू ॥
गए जनकु रघुनाथ समीपा । सनमाने सब रबिकुल दीपा ॥
समय समाज धरम अबिरोधा । बोले तब रघुबंस पुरोधा ॥
जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई ॥
तात राम जस आयसु देहू । सो सबु करै मोर मत एहू ॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी । बोले सत्य सरल मृदु बानी ॥
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू । मोर कहब सब भाँति भदेसू ॥
राउर राय रजायसु होई । राउरि सपथ सही सिर सोई ॥

दोहा

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत ॥२९६॥

चौपाला

सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा । बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ॥
सोक कनकलोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥
भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे । रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई ॥
बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मंजु मराली ॥

दोहा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥२९७॥

चौपाला

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अतंरजामी ॥
सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥
समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई । मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥
राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥

दोहा

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥२९८॥

चौपाला

राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी । नीच निसील निरीस निसंकी ॥
तेउ सुनि सरन सामुहें आए । सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥

दोहा

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥२९९॥

चौपाला

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ । आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा । सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥
देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥
राखा मोर दुलार गोसाईं । अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥
अबिनय बिनय जथारुचि बानी । छमिहि देउ अति आरति जानी ॥

दोहा

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि ॥३००॥

चौपाला

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥
सो करि कहउँ हिए अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥
अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥
कृपासिंधु सनमानि सुबानी । बैठाए समीप गहि पानी ॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥

छंद

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।
मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥

. . .