रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : उत्तरकाण्ड - दोहा ३१ से ४०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

उत्तरकाण्ड - दोहा २१ से ३०   उत्तरकाण्ड - दोहा ४१ से ५०

दोहा

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास ।

पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥३१॥

चौपाला

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥

सुंदर उपबन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥

जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥

ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥

रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥

आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥

तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥

राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥

दोहा

देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह ।

स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥३२॥

चौपाला

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥

मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥

स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥

एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥

तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा ॥

कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥

आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा ॥

बड़े भाग पाइब सतसंगा । बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा ॥

दोहा

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ।

कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥३३॥

चौपाला

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥

जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥

जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥

जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥

ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥

तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥

सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय । बससि सदा हम कहुँ परिपालय ॥

द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । ह्रदि बसि राम काम मद गंजय ॥

दोहा

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम ।

प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥३४॥

चौपाला

देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि ॥

प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥

भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥

मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥

आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥

भूप मौलि मन मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥

मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥

रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥

तारन तरन हरन सब दूषन । तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन ॥

दोहा

बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ ।

ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ ॥३५॥

चौपाला

सनकादिक बिधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए ॥

पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं ॥

सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी । जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी ॥

अंतरजामी प्रभु सभ जाना । बूझत कहहु काह हनुमाना ॥

जोरि पानि कह तब हनुमंता । सुनहु दीनदयाल भगवंता ॥

नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं । प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं ॥

तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ ॥

सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना । सुनहु नाथ प्रनतारति हरना ॥

दोहा

नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह ।

केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह ॥३६॥

चौपाला

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई । मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई ॥

संतन्ह कै महिमा रघुराई । बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई ॥

श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई । तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई ॥

सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन । कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन ॥

संत असंत भेद बिलगाई । प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई ॥

संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता । अगनित श्रुति पुरान बिख्याता ॥

संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥

दोहा

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड ।

अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥३७॥

चौपाला

बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥

सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥

कोमलचित दीनन्ह पर दाया । मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥

सबहि मानप्रद आपु अमानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥

बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥

सीतलता सरलता मयत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥

दोहा

निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज ।

ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज ॥३८॥

चौपाला

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ । भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥

तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कलपहि घालइ हरहाई ॥

खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपति देखी ॥

जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥

काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥

बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥

झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥

बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अति हृदय कठोरा ॥

दोहा

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।

ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥३९॥

चौपाला

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥

काहू की जौं सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥

जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥

स्वारथ रत परिवार बिरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥

मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं । आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥

करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ॥

अवगुन सिंधु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥

बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥

दोहा

ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं ।

द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥४०॥

चौपाला

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥

नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥

करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वारथ रत परलोक नसाना ॥

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥

अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥

संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥

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