रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : उत्तरकाण्ड - दोहा ७१ से ८०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

उत्तरकाण्ड - दोहा ६१ से ७०   उत्तरकाण्ड - दोहा ८१ से ९०

दोहा

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ॥

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥७१ -क॥

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि ।

छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥७१ -ख॥

चौपाला

जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥

सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥

सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूपो बल धामा ॥

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ॥

निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥

इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

दोहा

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥७२ -क॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥७२ -ख॥

चौपाला

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

नयन दोष जा कहँ जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥

मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥

ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

दोहा

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥७३ -क॥

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥७३ -ख॥

चौपाला

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई । कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥

जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही । सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥

ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ । परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥

संसृत मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना ॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी ॥

जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई । मातु चिराव कठिन की नाईं ॥

दोहा

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर ।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥७४ -क॥

तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि ।

तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥७४ -ख॥

चौपाला

राम कृपा आपनि जड़ताई । कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ॥

जब जब राम मनुज तनु धरहीं । भक्त हेतु लील बहु करहीं ॥

तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ । बालचरित बिलोकि हरषाऊँ ॥

जन्म महोत्सव देखउँ जाई । बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई ॥

इष्टदेव मम बालक रामा । सोभा बपुष कोटि सत कामा ॥

निज प्रभु बदन निहारि निहारी । लोचन सुफल करउँ उरगारी ॥

लघु बायस बपु धरि हरि संगा । देखउँ बालचरित बहुरंगा ॥

दोहा

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ ।

जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ ॥७५ -क॥

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर ।

सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर ॥७५ -ख॥

चौपाला

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक । रामचरित सेवक सुखदायक ॥

नृपमंदिर सुंदर सब भाँती । खचित कनक मनि नाना जाती ॥

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई । जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥

बालबिनोद करत रघुराई । बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा । अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥

नव राजीव अरुन मृदु चरना । पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥

ललित अंक कुलिसादिक चारी । नूपुर चारू मधुर रवकारी ॥

चारु पुरट मनि रचित बनाई । कटि किंकिन कल मुखर सुहाई ॥

दोहा

रेखा त्रय सुन्दर उदर नाभी रुचिर गँभीर ।

उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर ॥७६॥

चौपाला

अरुन पानि नख करज मनोहर । बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥

कंध बाल केहरि दर ग्रीवा । चारु चिबुक आनन छबि सींवा ॥

कलबल बचन अधर अरुनारे । दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे ॥

ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥

नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥

बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥

पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥

रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥

मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥

किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥

दोहा

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।

जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं ॥७७ -क॥

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।

कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥७७ -ख॥

चौपाला

एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥

सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥

नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥

ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥

जौं सब कें रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥

माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुनखानी ॥

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥

मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

दोहा

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥७८ -क॥

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ ॥

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥७८ -ख॥

चौपाला

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥

हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर ॥

भ्रम ते चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥

जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

तब मैं भागि चलेउँ उरगामी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥

जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥

दोहा

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।

जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥७९ -क॥

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि ।

गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥७९ -ख॥

चौपाला

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥

मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥

उदर माझ सुनु अंडज राया । देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥

अति बिचित्र तहँ लोक अनेका । रचना अधिक एक ते एका ॥

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा । अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥

अगनित लोकपाल जम काला । अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥

सागर सरि सर बिपिन अपारा । नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥

सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर । चारि प्रकार जीव सचराचर ॥

दोहा

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।

सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥८० -क॥

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक ।

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥८० -ख॥

चौपाला

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥८० -ख॥

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता । भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता ॥

नर गंधर्ब भूत बेताला । किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥

देव दनुज गन नाना जाती । सकल जीव तहँ आनहि भाँती ॥

महि सरि सागर सर गिरि नाना । सब प्रपंच तहँ आनइ आना ॥

अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा । देखेउँ जिनस अनेक अनूपा ॥

अवधपुरी प्रति भुवन निनारी । सरजू भिन्न भिन्न नर नारी ॥

दसरथ कौसल्या सुनु ताता । बिबिध रूप भरतादिक भ्राता ॥

प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा । देखउँ बालबिनोद अपारा ॥

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