रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास Updated: 15 April 2021 07:30 IST

रामचरितमानस : उत्तरकाण्ड - दोहा १०१ से ११०

गोस्वामी तुलसीदासने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की । संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

उत्तरकाण्ड - दोहा ९१ से १००   उत्तरकाण्ड - दोहा १११ से १२०

दोहा

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड ।

मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड ॥१०१ -क॥

तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान ।

देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥१०१ -ख॥

छंद

अबला कच भूषन भूरि छुधा । धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥

सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता । मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥१॥

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं । अभिमान बिरोध अकारनहीं ॥

लघु जीवन संबतु पंच दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ॥२॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा । नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ।

नहिं तोष बिचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥३॥

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता ॥

सब लोग बियोग बिसोक हुए । बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥४॥

दम दान दया नहिं जानपनी । जड़ता परबंचनताति घनी ॥

तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग मो बगरे ॥५॥

दोहा

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ।

गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥१०२ -क॥

कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग ।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥१०२ -ख॥

चौपाला

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥

त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥

कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥

दोहा

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।

गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास ॥१०३ -क॥

प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान ।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥१०३ -ख॥

चौपाला

नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥

सुद्ध सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥

बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥

तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥

बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥

नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥

दोहा

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।

भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥१०४ -क॥

तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस ।

परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥१०४ -ख॥

चौपाला

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥

गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥

बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥

परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥

तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥

बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥

संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥

जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥

दोहा

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।

हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥१०५ -क॥

सोरठा

गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।

मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥१०५ -ख॥

चौपाला

एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥

सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥

रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावँर कै केतिक बाता ॥

जासु चरन अज सिव अनुरागी । तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥

हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥

अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥

मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥

अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥

जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥

धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥

रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥

मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥

कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥

उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥

मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

दोहा

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥१०६ -क॥

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।

अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥१०६ -ख॥

चौपाला

मंदिर माझ भई नभ बानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥

जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥

तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥

जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥

बैठ रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥

महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥रहु अधमाधम अधगति पाई ॥

दोहा

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥

कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥१०७ -क॥

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।

बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥१०७ -ख॥

चौपाला

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥

करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ॥

चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

श्लोक

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥

दोहा

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु ।

पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥१०८ -क॥

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु ।

निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥१०८ -ख॥

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान ।

तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान ॥१०८ -ग॥

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥१०८ -घ॥

चौपाला

एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥

बिप्रगिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा ॥

तदपि तुम्हार साधुता देखी । करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥

छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥

मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥

जनमत मरत दुसह दुख होई । अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥

कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥

रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥

पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥

सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥

अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेहु संत अनंत समाना ॥

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥

जो इन्ह कर मारा नहिं मरई । बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥

अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

दोहा

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।

मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥१०९ -क॥

प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।

पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल ॥१०९ -ख॥

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।

जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥१०९ -ग॥

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस ।

एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥१०९घ॥

चौपाला

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ । तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥

एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥

चरम देह द्विज कै मैं पाई । सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥

खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला । करउँ सकल रघुनायक लीला ॥

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा । समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥

मन ते सकल बासना भागी । केवल राम चरन लय लागी ॥

कहु खगेस अस कवन अभागी । खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥

प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई । हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई ॥

भए कालबस जब पितु माता । मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥

जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ । आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥

बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा । कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥

सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा । अब्याहत गति संभु प्रसादा ॥

छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी । एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥

राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई । ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥

निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई । सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥

दोहा

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग ।

रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग ॥११० -क॥

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन ।

देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन ॥११० -ख॥

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज ।

मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज ॥११०ग॥

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान ।

सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान ॥११०घ॥

चौपाला

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥

ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि । मोहि परम अधिकारी जानी ॥

लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वेत अगुन हृदयेसा ॥

अकल अनीह अनाम अरुपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥

मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्बिकार निरवधि सुख रासी ॥

सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहि बेदा ॥

बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥

पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥

सोइ उपदेस कहहु करि दाया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥

मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥

उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ ॥

अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई ॥

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