हरिगीता
संकलित साहित्य Updated: 15 April 2021 07:30 IST

हरिगीता : अध्याय २

भारतीय दार्शनिकों का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

अध्याय १   अध्याय ३

संजय ने कहा - -
ऐसे कृपायुत अश्रुपूरित दुःख से दहते हुए ।
कौन्तेय से इस भांति मधुसूदन वचन कहते हुए ॥१॥

श्रीभगवान् ने कहा - -
अर्जुन! तुम्हें संकट- समय में क्यों हुआ अज्ञान है ।
यह आर्य- अनुचित और नाशक स्वर्ग, सुख, सम्मान है ॥२॥

अनुचित नपुंसकता तुम्हें हे पार्थ! इसमें मत पड़ो ।
यह क्षुद्र कायरता परंतप! छोड़ कर आगे बढ़ो ॥३॥

अर्जुन ने कहा - -
किस भाँति मधुसूदन! समर में भीष्म द्रोणाचार्य पर ।
मैं बाण अरिसूदन चलाऊँ वे हमारे पूज्यवर ॥४॥

भगवन्! महात्मा गुरुजनों का मारना न यथेष्ट है ।
इससे जगत् में मांग भिक्षा पेट- पालन श्रेष्ठ है ॥५॥

इन गुरुजनों को मार कर, जो अर्थलोलुप हैं बने ॥ ।
उनके रुधिर से ही सने, सुख- भोग होंगे भोगने ॥५॥

जीते उन्हें हम या हमें वे, यह न हमको ज्ञात है ।
यह भी नहीं हम जानते, हितकर हमें क्या बात है ॥६॥

जीवित न रहना चाहते हम, मार कर रण में जिन्हें ॥ ।
धृतराष्ट्र- सुत कौरव वही, लड़ने खड़े हैं सामने ॥ ॥६॥

कायरपने से हो गया सब नष्ट सत्य- स्वभाव है ।
मोहित हुई मति ने भुलाया धर्म का भी भाव है ॥
आया शरण हूँ आपकी मैं शिष्य शिक्षा दीजिये ॥
निश्चित कहो कल्याणकारी कर्म क्या मेरे लिये ॥७॥

धन- धान्य- शाली राज्य निष्कंटक मिले संसार में ।
स्वामित्व सारे देवताओं का मिले विस्तार में ॥
कोई कहीं साधन मुझे फिर भी नहीं दिखता अहो ॥
जिससे कि इन्द्रिय- तापकारी शोक सारा दूर हो ॥८॥

संजय ने कहा - -
इस भाँति कहकर कृष्ण से, राजन! ' लड़ूंगा मैं नहीं' ।
ऐसे वचन कह गुडाकेश अवाच्य हो बैठे वहीं ॥९॥

उस पार्थ से, रण- भूमि में जो, दुःख से दहने लगे ।
हँसते हुए से हृषीकेश तुरन्त यों कहने लगे ॥१०॥

श्रीभगवान् ने कहा - -
निःशोच्य का कर शोक कहता बात प्रज्ञावाद की ।
जीते मरे का शोक ज्ञानीजन नहीं करते कभी ॥११॥

मैं और तू राजा सभी देखो कभी क्या थे नहीं ।
यह भी असम्भव हम सभी अब फिर नहीं होंगे कहीं ॥१२॥

ज्यों बालपन, यौवन जरा इस देह में आते सभी ।
त्यों जीव पाता देह और, न धीर मोहित हों कभी ॥१३॥

शीतोष्ण या सुख- दुःख- प्रद कौन्तेय! इन्द्रिय- भोग हैं ।
आते व जाते हैं सहो सब नाशवत संयोग हैं ॥१४॥

नर श्रेष्ठ! वह नर श्रेष्ठ है इनसे व्यथा जिसको नहीं ।
वह मोक्ष पाने योग्य है सुख दुख जिसे सम सब कहीं ॥१५॥

जो है असत् रहता नहीं, सत् का न किन्तु अभाव है ।
लखि अन्त इनका ज्ञानियों ने यों किया ठहराव है ॥१६॥

यह याद रख अविनाशि है जिसने किया जग व्याप है ।
अविनाशि का नाशक नहीं कोई कहीं पर्याप है ॥१७॥

इस देह में आत्मा अचिन्त्य सदैव अविनाशी अमर ।
पर देह उसकी नष्ट होती अस्तु अर्जुन! युद्ध कर ॥१८॥

है जीव मरने मारनेवाला यही जो मानते ।
यह मारता मरता नहीं दोनों न वे जन जानते ॥१९॥

मरता न लेता जन्म, अब है, फिर यहीं होगा कहीं ।
शाश्वत, पुरातन, अज, अमर, तन वध किये मरता नहीं ॥२०॥

अव्यय अजन्मा नित्य अविनाशी इसे जो जानता ।
कैसे किसी का वध कराता और करता है बता ॥२१॥

जैसे पुराने त्याग कर नर वस्त्र नव बदलें सभी ।
यों जीर्ण तन को त्याग नूतन देह धरता जीव भी ॥२२॥

आत्मा न कटता शस्त्र से है, आग से जलता नहीं ।
सूखे न आत्मा वायु से, जल से कभी गलता नहीं ॥२३॥

छिदने न जलने और गलने सूखनेवाला कभी ।
यह नित्य निश्चल, थिर, सनातन और है सर्वत्र भी ॥२४॥

इन्द्रिय पहुँच से है परे, मन- चिन्तना से दूर है ।
अविकार इसको जान, दुख में व्यर्थ रहना चूर है ॥२५॥

यदि मानते हो नित्य मरता, जन्मता रहता यहीं ।
तो भी महाबाहो! उचित ऐसी कभी चिन्ता नहीं ॥२६॥

जन्मे हुए मरते, मरे निश्चय जनम लेते कहीं ।
ऐसी अटल जो बात है उसकी उचित चिन्ता नहीं ॥२७॥

अव्यक्त प्राणी आदि में हैं मध्य में दिखते सभी ।
फिर अन्त में अव्यक्त, क्या इसकी उचित चिन्ता कभी ॥२८॥

कुछ देखते आश्चर्य से, आश्चर्यवत कहते कहीं ।
कोई सुने आश्चर्यवत, पहिचानता फिर भी नहीं ॥२९॥

सारे शरीरों में अबध आत्मा न बध होता किये ।
फिर प्राणियों का शोक यों तुमको न करना चाहिये ॥३०॥

फिर देखकर निज धर्म, हिम्मत हारना अपकर्म है ।
इस धर्म- रण से बढ़ न क्षत्रिय का कहीं कुछ धर्म है ॥३१॥

रण स्वर्गरूपी द्वार देखो खुल रहा है आप से ।
यह प्राप्त होता क्षत्रियों को युद्ध भाग्य- प्रताप से ॥३२॥

तुम धर्म के अनुकूल रण से जो हटे पीछे कभी ।
निज धर्म खो अपकीर्ति लोगे और लोगे पाप भी ॥३३॥

अपकीर्ति गायेंगे सभी फिर इस अमिट अपमान से ।
अपकीर्ति, सम्मानित पुरुष को अधिक प्राण- पयान से ॥३४॥

' रण छोड़कर डर से भगा अर्जुन' कहेंगे सब यही ।
सम्मान करते वीरवर जो, तुच्छ जानेंगे वही ॥३५॥

कहने न कहने की खरी खोटी कहेंगे रिपु सभी ।
सामर्थ्य- निन्दा से घना दुख और क्या होगा कभी ॥३६॥

जीते रहे तो राज्य लोगे, मर गये तो स्वर्ग में ।
इस भाँति निश्चय युद्ध का करके उठो अरिवर्ग में । २ । ३७॥

जय- हार, लाभालाभ, सुख- दुख सम समझकर सब कहीं ।
फिर युद्ध कर तुझको धनुर्धर ! पाप यों होगा नहीं । २ । ३८॥

है सांख्य का यह ज्ञान अब सुन योग का शुभ ज्ञान भी ।
हो युक्त जिससे कर्म- बन्धन पार्थ छुटेंगे सभी ॥३९॥

आरम्भ इसमें है अमिट यह विघ्न बाधा से परे ।
इस धर्म का पालन तनिक भी सर्व संकट को हरे ॥४०॥

इस मार्ग में नित निश्चयात्मक- बुद्धि अर्जुन एक है ।
बहु बुद्धियाँ बहु भेद- युत उनकी जिन्हें अविवेक है ॥४१॥

जो वेदवादी, कामनाप्रिय, स्वर्गइच्छुक, मूढ़ हैं ।
' अतिरिक्त इसके कुछ नहीं' बातें बढ़ाकर यों कहें ॥४२॥

नाना क्रिया विस्तारयुत, सुख- भोग के हित सर्वदा ।
जिस जन्मरूपी कर्म- फल- प्रद बात को कहते सदा ॥४३॥

उस बात से मोहित हुए जो भोग- वैभव- रत सभी ।
व्यवसाय बुद्धि न पार्थ ! उनकी हो समाधिस्थित कभी ॥४४॥

हैं वेद त्रिगुणों के विषय, तुम गुणातीत महान हो !
तज योग क्षेम व द्वन्द्व नित सत्त्वस्थ आत्मावान् हो ॥४५॥

सब ओर करके प्राप्त जल, जितना प्रयोजन कूप का ।
उतना प्रयोजन वेद से, विद्वान ब्राह्मण का सदा ॥४६॥

अधिकार केवल कर्म करने का, नहीं फल में कभी ।
होना न तू फल- हेतु भी, मत छोड़ देना कर्म भी ॥४७॥

आसक्ति सब तज सिद्धि और असिद्धि मान समान ही ।
योगस्थ होकर कर्म कर, है योग समता- ज्ञान ही ॥४८॥

इस बुद्धियोग महान से सब कर्म अतिशय हीन हैं ।
इस बुद्धि की अर्जुन! शरण लो चाहते फल दीन हैं ॥४९॥

जो बुद्धि- युत है पाप- पुण्यों में न पड़ता है कभी ।
बन योग- युत, है योग ही यह कर्म में कौशल सभी ॥५०॥

नित बुद्धि- युत हो कर्म के फल त्यागते मतिमान हैं ।
वे जन्म- बन्धन तोड़ पद पाते सदैव महान हैं ॥५१॥

इस मोह के गंदले सलिल से पार मति होगी जभी ।
वैराग्य होगा सब विषय में जो सुना सुनना अभी ॥५२॥

श्रुति- भ्रान्त बुद्धि समाधि में निश्चल अचल होगी जभी ।
हे पार्थ! योग समत्व होगा प्राप्त यह तुझको तभी ॥५३॥

अर्जुन ने कहा - -
केशव! किसे दृढ़- प्रज्ञजन अथवा समाधिस्थित कहें ।
थिर- बुद्धि कैसे बोलते, बैठें, चलें, कैसे रहें ॥५४॥

श्रीभगवान् ने कहा - -
हे पार्थ! मन की कामना जब छोड़ता है जन सभी ।
हो आप आपे में मगन दृढ़- प्रज्ञ होता है तभी ॥५५॥

सुख में न चाह, न खेद जो दुख में कभी अनुभव करे ।
थिर- बुद्धि वह मुनि, राग एवं क्रोध भय से जो परे ॥५६॥

शुभ या अशुभ जो भी मिले उसमें न हर्ष न द्वेष ही ।
निःस्नेह जो सर्वत्र है, थिर- बुद्धि होता है वही ॥५७॥

हे पार्थ! ज्यों कछुआ समेते अङ्ग चारों छोर से ।
थिर- बुद्धि जब यों इन्द्रियाँ सिमटें विषय की ओर से ॥५८॥

होते विषय सब दूर हैं आहार जब जन त्यागता ।
रस किन्तु रहता, ब्रह्म को कर प्राप्त वह भी भागता ॥५९॥

कौन्तेय! करते यत्न इन्द्रिय- दमन हित विद्वान् हैं ।
मन किन्तु बल से खैंच लेती इन्द्रियाँ बलवान हैं ॥६०॥

उन इन्द्रियों को रोक, बैठे योगयुत मत्पर हुआ ।
आधीन जिसके इन्द्रियाँ, दृढ़प्रज्ञ वह नित नर हुआ ॥६१॥

चिन्तन विषय का, सङ्ग विषयों में बढ़ाता है तभी ।
फिर संग से हो कामना, हो कामना से क्रोध भी ॥६२॥

फिर क्रोध से है मोह, सुधि को मोह करता भ्रष्ट है ।
यह सुधि गए फिर बुद्धि विनशे, बुद्धि- विनशे नष्ट है ॥६३॥

पर राग- द्वेष- विहीन सारी इन्द्रियाँ आधीन कर ।
फिर भोग करके भी विषय, रहता सदैव प्रसन्न नर ॥६४॥

पाकर प्रसाद पवित्र जन के, दुःख कट जाते सभी ।
जब चित्त नित्य प्रसन्न रहता, बुद्धि दॄढ़ होती तभी ॥६५॥

रहकर अयुक्त न बुद्धि उत्तम भावना होती कहीं ।
बिन भावना नहिं शांति और अशांति में सुख है नहीं ॥६६॥

सब विषय विचरित इन्द्रियों में, साथ मन जिसके रहे ।
वह बुद्धि हर लेती, पवन से नाव ज्यों जल में बहे ॥६७॥

चहुँ ओर से इन्द्रिय- विषय से, इन्द्रियाँ जब दूर ही ।
रहती हटीं जिसकी सदा, दृढ़- प्रज्ञ होता है वही ॥६८॥

सब की निशा तब जागता योगी पुरुष हे तात! है ।
जिसमें सभी जन जागते, ज्ञानी पुरुष की रात है ॥६९॥

सब ओर से परिपूर्ण जलनिधि में सलिल जैसे सदा ।
आकर समाता, किन्तु अविचल सिन्धु रहता सर्वदा ॥
इस भाँति ही जिसमें विषय जाकर समा जाते सभी ।
वह शांति पाता है, न पाता काम- कामी जन कभी ॥७०॥

सब त्याग इच्छा कामना, जो जन विचरता नित्य ही ।
मद और ममता हीन होकर, शांति पाता है वही ॥७१॥

यह पार्थ! ब्राह्मीस्थिति इसे पा नर न मोहित हो कभी ।
निर्वाण पद हो प्राप्त इसमें ठैर अन्तिम काल भी ॥७२॥

दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥२॥

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