हरिगीता
संकलित साहित्य Updated: 15 April 2021 07:30 IST

हरिगीता : अध्याय ३

भारतीय दार्शनिकों का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

अध्याय २   अध्याय ४

अर्जुन ने कहा - -
यदि हे जनार्दन! कर्म से तुम बुद्धि कहते श्रेष्ठ हो ।
तो फिर भयंकर कर्म में मुझको लगाते क्यों कहो ॥१॥

उलझन भरे कह वाक्य, भ्रम- सा डालते भगवान् हो ।
वह बात निश्चय कर कहो जिससे मुझे कल्याण हो ॥२॥

श्रीभगवान् ने कहा - -
पहले कही दो भाँति निष्ठा, ज्ञानियों की ज्ञान से ।
फिर योगियों की योग- निष्ठा, कर्मयोग विधान से ॥३॥

आरम्भ बिन ही कर्म के निष्कर्म हो जाते नहीं ।
सब कर्म ही के त्याग से भी सिद्धि जन पाते नहीं ॥४॥

बिन कर्म रह पाता नहीं कोई पुरुष पल भर कभी ।
हो प्रकृति- गुण आधीन करने कर्म पड़ते हैं सभी ॥५॥

कर्मेंद्रियों को रोक जो मन से विषय- चिन्तन करे ।
वह मूढ़ पाखण्डी कहाता दम्भ निज मन में भरे ॥६॥

जो रोक मन से इन्द्रियाँ आसक्ति बिन हो नित्य ही ।
कर्मेन्द्रियों से कर्म करता श्रेष्ठ जन अर्जुन! वही ॥७॥

बिन कर्म से नित श्रेष्ठ नियमित- कर्म करना धर्म है ।
बिन कर्म के तन भी न सधता कर नियत जो कर्म है ॥८॥

तज यज्ञ के शुभ कर्म, सारे कर्म बन्धन पार्थ! हैं ।
अतएव तज आसक्ति सब कर कर्म जो यज्ञार्थ हैं ॥९॥

विधि ने प्रजा के साथ पहले यज्ञ को रच के कहा ।
पूरे करे यह सब मनोरथ, वृद्धि हो इससे महा ॥१०॥

मख से करो तुम तुष्ट सुरगण, वे करें तुमको सदा ।
ऐसे परस्पर तुष्ट हो, कल्याण पाओ सर्वदा ॥११॥

मख तृप्त हो सुर कामना पूरी करेंगे नित्य ही ।
उनका दिया उनको न दे, जो भोगता तस्कर वही ॥१२॥

जो यज्ञ में दे भाग खाते पाप से छुट कर तरें ।
तन हेतु जो पापी पकाते पाप वे भक्षण करें ॥१३॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से हैं, अन्न होता वृष्टि से ।
यह वृष्टि होती यज्ञ से, जो कर्म की शुभ सृष्टि से ॥१४॥

फिर कर्म होते ब्रह्म से हैं, ब्रह्म अक्षर से कहा ।
यों यज्ञ में सर्वत्र- व्यापी ब्रह्म नित ही रम रहा ॥१५॥

चलता न जो इस भाँति चलते चक्र के अनुसार है ।
पापायु इन्द्रियलम्पटी वह व्यर्थ ही भू- भार है ॥१६॥

उसको न कोई लाभ है करने न करने से कहीं ।
हे पार्थ! प्राणीमात्र से उसको प्रयोजन है नहीं ॥१८॥

अतएव तज आसक्ति, कर कर्तव्य कर्म सदैव ही ।
यों कर्म जो करता परम पद प्राप्त करता है वही ॥१९॥

जनकादि ने भी सिद्धि पाई कर्म ऐसे ही किये ।
फिर लोकसंग्रह देख कर भी कर्म करना चाहिये ॥२०॥

जो कार्य करता श्रेष्ठ जन करते वही हैं और भी ।
उसके प्रमाणित- पंथ पर ही पैर धरते हैं सभी ॥२१॥

अप्राप्त मुझको कुछ नहीं, जो प्राप्त करना हो अभी ।
त्रैलोक्य में करना न कुछ, पर कर्म करता मैं सभी ॥२२॥

आलस्य तजके पार्थ! मैं यदि कर्म में वरतूँ नहीं ।
सब भाँति मेरा अनुकरण ही नर करेंगे सब कहीं ॥२३॥

यदि छोड़ दूँ मैं कर्म करना, लोक सारा भ्रष्ट हो ।
मैं सर्व संकर का बनूँ कर्ता, सभी जग नष्ट हो ॥२४॥

ज्यों मूढ़ मानव कर्म करते नित्य कर्मासक्त हो ।
यों लोकसंग्रह- हेतु करता कर्म, विज्ञ विरक्त हो ॥२५॥

जो आत्मरत रहता निरन्तर, आत्म- तृप्त विशेष है ।
संतुष्ट आत्मा में, उसे करना नहीं कुछ शेष है ॥१७॥

ज्ञानी न डाले भेद कर्मासक्त की मति में कभी ।
वह योग- युत हो कर्म कर, उनसे कराये फिर सभी ॥२६॥

होते प्रकृति के ही गुणों से सर्व कर्म विधान से ।
मैं कर्म करता, मूढ़- मानव मानता अभिमान से ॥२७॥

गुण और कर्म विभाग के सब तत्व जो जन जानता ।
होता न वह आसक्त गुण का खेल गुण में मानता ॥२८॥

गुण कर्म में आसक्त होते प्रकृतिगुण मोहित सभी ।
उन मंद मूढ़ों को करे विचलित न ज्ञानी जन कभी ॥२९॥

अध्यात्म- मति से कर्म अर्पण कर मुझे आगे बढ़ो ।
फल- आश ममता छोड़कर निश्चिन्त होकर फिर लड़ो ॥३०॥

जो दोष- बुद्धि विहीन मानव नित्य श्रद्धायुक्त हैं ।
मेरे सुमत अनुसार करके कर्म वे नर मुक्त हैं ॥२१॥

जो दोष- दर्शी मूढ़मति मत मानते मेरा नहीं ।
वे सर्वज्ञान- विमूढ़ नर नित नष्ट जानों सब कहीं ॥३२॥

वर्ते सदा अपनी प्रकृति अनुसार ज्ञान- निधान भी ।
निग्रह करेगा क्या, प्रकृति अनुसार हैं प्राणी सभी ॥३३॥

अपने विषय में इन्द्रियों को राग भी है द्वेष भी ।
ये शत्रु हैं, वश में न इनके चाहिये आना कभी ॥३४॥

ऊँचे सुलभ पर- धर्म से निज विगुण धर्म महान् है ।
परधर्म भयप्रद, मृत्यु भी निज धर्म में कल्याण है ॥३५॥

अर्जुन ने कहा - -
भगवन्! कहो करना नहीं नर चाहता जब आप है ।
फिर कौन बल से खींच कर उससे कराता पाप है ॥३६॥

श्रीभगवान् ने कहा - -
पैदा रजोगुण से हुआ यह काम ही यह क्रोध ही ।
पेटू महापापी कराता पाप है वैरी यही ॥३७॥

ज्यों गर्भ झिल्ली से, धुएँ से आग, शीशा धूल से ।
यों काम से रहता ढका है, ज्ञान भी ( आमूल) से ॥३८॥

यह काम शत्रु महान्, नित्य अतृप्त अग्नि समान है ।
इससे ढका कौन्तेय! सारे ज्ञानियों का ज्ञान है ॥३९॥

मन, इन्द्रियों में, बुद्धि में यह वास वैरी नित करे ।
इनके सहारे ज्ञान ढक, जीवात्म को मोहित करे ॥४०॥

इन्द्रिय- दमन करके करो फिर नाश शत्रु महान् का ।
पापी सदा यह नाशकारी ज्ञान का विज्ञान का ॥४१॥

हैं श्रेष्ठ इन्द्रिय, इन्द्रियों से पार्थ! मन मानो परे ।
मन से परे फिर बुद्धि, आत्मा बुद्धि से जानो परे ॥४२॥

यों बुद्धि से आत्मा परे है जान इसके ज्ञान को ।
मन वश्य करके जीत दुर्जय काम शत्रु महान् को ॥४३॥

तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥३॥

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