हरिगीता
संकलित साहित्य Updated: 15 April 2021 07:30 IST

हरिगीता : अध्याय ७

भारतीय दार्शनिकों का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

अध्याय ६   अध्याय ८

श्रीभगवान् ने कहा - -
मुझमें लगा कर चित्त मेरे आसरे कर योग भी ।
जैसा असंशय पूर्ण जानेगा मुझे वह सुन सभी ॥१॥

विज्ञान- युत वह ज्ञान कहता हूँ सभी विस्तार में ।
जो जान कर कुछ जानना रहता नहीं संसार में ॥२॥

कोई सहस्रों मानवों में सिद्धि करना ठानता ।
उन यत्नशीलों में मुझे कोई यथावत् जानता ॥३॥

पृथ्वी, पवन, जल, तेज, नभ, मन, अहंकार व बुद्धि भी ।
इन आठ भागों में विभाजित है प्रकृति मेरी सभी ॥४॥

हे पार्थ! वह ' अपरा' प्रकृति का जान लो विस्तार है ।
फिर है ' परा' यह जीव जो संसार का आधार है ॥५॥

उत्पन्न दोनों से इन्हीं से जीव हैं जग के सभी ।
मैं मूल सब संसार का हूँ और मैं ही अन्त भी ॥६॥

मुझसे परे कुछ भी नहीं संसार का विस्तार है ।
जिस भांति माला में मणी, मुझमें गुथा संसार है ॥७॥

आकाश में ध्वनि, नीर में रस, वेद में ओंकार हूँ ।
पौरुष पुरुष में, चाँद सूरज में प्रभामय सार हूँ ॥८॥

शुभ गन्ध वसुधा में सदा मैं प्राणियों में प्राण हूँ ।
मैं अग्नि में हूँ तेज, तपियों में तपस्या ज्ञान हूँ ॥९॥

हे पार्थ! जीवों का सनातन बीज हूँ, आधार हूँ ।
तेजस्वियों में तेज, बुध में बुद्धि का भण्डार हूँ ॥१०॥

हे पार्थ! मैं कामादि राग- विहीन बल बलवान् का ।
मैं काम भी हूँ धर्म के अविरुद्ध विद्यावान् का ॥११॥

सत और रज, तम भाव मुझसे ही हुए हैं ये सभी ।
मुझमें सभी ये किन्तु मैं उनमें नहीं रहता कभी ॥१२॥

इन त्रिगुण भावों में सभी भूला हुआ संसार है ।
जाने न अव्यय- तत्त्व मेरा जो गुणों से पार है ॥१३॥

यह त्रिगुणदैवी घोर माया अगम और अपार है ।
आता शरण मेरी वही जाता सहज में पार है ॥१४॥

पापी, नराधम, ज्ञान माया ने हरा जिनका सभी ।
वे मूढ़ आसुर बुद्धि- वश मुझको नहीं भजते कभी ॥१५॥

अर्जुन! मुझे भजता सुकृति- समुदाय चार प्रकार का ।
जिज्ञासु, ज्ञानीजन, दुखी- मन, अर्थ- प्रिय संसार का ॥१६॥

नित- युक्त ज्ञानी ष्रेष्ठ, जो मुझमें अनन्यासक्त है ।
मैं क्योंकि ज्ञानी को परम प्रिय, प्रिय मुझे वह भक्त है ॥१७॥

वे सब उदार, परन्तु मेरा प्राण ज्ञानी भक्त है ।
वह युक्त जन, सर्वोच्च- गति मुझमें सदा अनुरक्त है ॥१८॥

जन्मान्तरों में जानकर, ' सब वासुदेव यथार्थ है' ।
ज्ञानी मुझे भजता, सुदुर्लभ वह महात्मा पार्थ है ॥१९॥

निज प्रकृति- प्रेरित, कामना द्वारा हुए हत ज्ञान से ।
कर नियम भजते विविध विध नर अन्य देव विधान से ॥२०॥

जो जो कि जिस जिस रूप की पूजा करे नर नित्य ही ।
उस भक्त की करता उसी में, मैं अचल श्रद्धा वही ॥२१॥

उस देवता को पूजता फिर वह, वही श्रद्धा लिये ।
निज इष्ट- फल पाता सकल, निर्माण जो मैने किये ॥२२॥

ये मन्दमति नर किन्तु पाते, अन्तवत फल सर्वदा ।
सुर- भक्त सुर में, भक्त मेरे, आ मिलें मुझमें सदा ॥२३॥

अव्यक्त मुझको व्यक्त, मानव मूढ़ लेते मान हैं ।
अविनाशि अनुपम भाव मेरा वे न पाते जान हैं ॥२४॥

निज योगमाया से ढका सबको न मैं, दिखता कहीं ।
अव्यय अजन्मा मैं, मुझे पर मूढ़ नर जानें नहीं ॥२५॥

होंगे, हुए हैं, जीव जो मुझको सभी का ज्ञान है ।
इनको किसी को किन्तु कुछ मेरी नहीं पहिचान है ॥२६॥

उत्पन्न इच्छा द्वेष से जो द्वन्द्व जग में व्याप्त हैं ।
उनसे परंतप ! सर्व प्राणी मोह करते प्राप्त हैं ॥२७॥

पर पुण्यवान् मनुष्य जिनके छुट गये सब पाप हैं ।
दृढ़ द्वन्द्व- मोह- विहीन हो भजते मुझे वे आप हैं ॥२८॥

करते ममाश्रित जो जरा- मृति- मोक्ष के हित साधना ।
वे जानते हैं ब्रह्म, सब अध्यात्म, कर्म महामना ॥२९॥

अधि- भूत, दैव व यज्ञ- युत, जो विज्ञ मुझको जानते ॥
वे युक्त- चित मरते समय में भी मुझे पहिचानते ॥३०॥

सातवां अध्याय समाप्त हुआ ॥७॥

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