हरिगीता
संकलित साहित्य Updated: 15 April 2021 07:30 IST

हरिगीता : अध्याय १६

भारतीय दार्शनिकों का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

अध्याय १५   अध्याय १७

श्रीभगवान् बोले

भय-हीनता, दम, सत्त्व की संशुद्धि, दृढ़ता ज्ञान की ॥
तन-मन सरलता, यज्ञ, तप स्वाध्याय, सात्त्विक दान भी ॥१॥

मृदुता, अहिंसा, सत्य करुणा, शान्ति, क्रोध-विहीनता ॥
लज्जा, अचंचलता, अनिन्दा, त्याग तृष्णाहीनता ॥२॥

धृति, तेज, पावनता, क्षमा, अद्रोह, मान-विहीनता ॥
ये चिन्ह उनके पार्थ, जिनको प्राप्त दैवी-सम्पदा ॥३॥

मद, मान, मिथ्याचार, क्रोध, कठोरता, अज्ञान भी ॥
ये आसुरी सम्पत्ति में जन्मे हुए पाते सभी ॥४॥

दे मोक्ष दैवी, बान्धती है आसुरी सम्पत्ति ये ॥
मत शोक अर्जुन, कर हुआ तू दैव-संपद् को लिये ॥५॥

दो जाति के है लोग, दैवी आसुरी संसार में ॥
सुन आसुरी अब पार्थ, दैवी कह चुका विस्तार में ॥६॥

क्या है प्रवृत्ति निवृत्ति जग में, जानते आसुर नहीं ॥
आचार, सत्य विशुद्धता होती नहीं उनमें कहीं ॥७॥

कहते असुर झूठा जगत्, बिन ईश बिन आधार है ॥
केवल परस्पर योग से, बस भोग-हित संसार है ॥८॥

इस दृष्टि को धर, मूढ़ नर, नष्टात्म, रत अपकार में ॥
जग-नाश हित वे क्रूर-कर्मी जन्मते संसार में ॥९॥

मद मान दम्भ-विलीन, काम अपूर का आश्रय लिए ॥
वर्तें अशुचि नर मोह वश, होकर असत् आग्रह किए ॥१०॥

उनमें मरण पर्यन्त चिन्ताएँ अनन्त सदा रहें ॥
वे भोग-विषयों में लगे, आनन्द उस को ही कहें ॥११॥

आशा कुबन्धन में बन्धे, धुन क्रोध एवं काम की ॥
सुख-भोग हित अन्याय से इच्छा करें धन धाम की ॥१२॥

यह पा लिया, अब वह मनोरथ सिद्ध कर लूंगा सभी ॥
यह धन हुआ मेरा, मिलेगा और भी आगे अभी ॥१३॥

यह शत्रु मैंने आज मारा, कल हनूंगा और भी ॥
भोगी, सुखी, बलवान, ईश्वर, सिद्ध हूँ, मैं ही सभी ॥१४॥

श्रीमान् और कुलीन मैं हूँ, कौन मुझसा और है ॥
मख, दान, सुख भी मैं करूँगा, मूढ़ता-मोहित कहे ॥१५॥

भूले अनेकों कल्पना में मोह-बन्धन बीच हैं ॥
वे काम-भोगों में फँसे, पड़ते नरक में नीच हैं ॥१६॥

धन, मान, मद में मस्त, ऐसे निज प्रशंसक अज्ञ हैं ॥
वे दम्भ से विधिहीन करते नाम ही के यज्ञ हैं ॥१७॥

बल, कामक्रोध, घमण्ड वश, निन्दा करें मद से तने ॥
सब में व अपने में बसे मुझ देव के द्वेषी बने ॥१८॥

जो हैं नराधम क्रूर द्वेषी लीन पापाचार में ॥
उनको गिराता नित्य आसुर योनि में संसार में ॥१९॥

वे जन्म-जन्म सदैव आसुर योनि ही पाते रहें ॥
मुझको न पाकर अन्त में अति ही अधोगति को गहें ॥२०॥

ये काम लालच क्रोध तीनों ही नरक के द्वार हैं ॥
इस हेतु तीनों आत्म-नाशक, त्याज्य सर्व प्रकार हैं ॥२१॥

इन नरक द्वारों से पुरुष जो मुक्त पार्थ, सदैव ही ॥
शुभ आचरण निज हेतु करता, परमगति पाता वही ॥२२॥

जो शास्त्र-विधि को छोड़, करता कर्म मनमाने सभी ॥
वह सिद्धि, सुख अथवा परमगति को न पाता है कभी ॥२३॥

इस हेतु कार्य-अकार्य-निर्णय मान शास्त्र-प्रमाण ही ॥
करना कहा जो शास्त्र में है, जानकर वह, कर वही ॥२४॥

ॐ तत्सदिति षोडशोऽध्यायः

सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥१६॥

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