हरिगीता
संकलित साहित्य Updated: 15 April 2021 07:30 IST

हरिगीता : अध्याय १८

भारतीय दार्शनिकों का सर्वश्रेष्ठ दर्शन

अध्याय १७  

अर्जुन बोले

संन्यास एवं त्याग-तत्त्व, पृथक महाबाहो, कहो ॥
इच्छा मुझे है हृषीकेश, समस्त इनका ज्ञान हो ॥१॥

श्रीभगवान् बोले

सब काम्य-कर्म का न्यास ही संन्यास ज्ञानी मानते ॥
सब कर्मफल के त्याग ही को त्याग विज्ञ बखानते ॥२॥

हैं दोषवत् सब कर्म कहते त्याज्य कुछ विद्वान् हैं ॥
तप दान यज्ञ न त्यागिये कुछ दे रहे यह ज्ञान हैं ॥३॥

हे पार्थ, सुन जो ठीक मेरा त्याग हेतु विचार है ॥
हे पुरुषव्याघ्र, कहा गया यह त्याग तीन प्रकार है ॥४॥

मख दान तप ये कर्म करने योग्य, त्याज्य न हैं कभी ॥
मख दान तप विद्वान् को भी शुद्ध करते हैं सभी ॥५॥

ये कर्म भी आसक्ति बिन हो, त्यागकर फल नित्य ही ॥
करने उचित हैं पार्थ, मेरा श्रेष्ठ निश्चित मत यही ॥६॥

निज नियत कर्म न त्यागने के योग्य होते हैं कभी ॥
यदि मोह से हो त्याग तो, वह त्याग तामस है सभी ॥७॥

दुख जान काया-क्लेश भय से, कर्म यदि त्यागे कहीं ॥
वह राजसी है त्याग, उसका फल कभी मिलता नहीं ॥८॥

फल-संग तज जो कर्म नियमित कर्म अपना मान है ॥
माना गया वह त्याग शुभ, सात्त्विक सदैव महान है ॥९॥

नहिं द्वेष अकुशल कर्म से, जो कुशल में नहिं लीन है ॥
संशय-रहित त्यागी वही है सत्त्वनिष्ठ प्रवीन है ॥१८.१०॥

संभव नहीं है देहधारी त्याग दे सब कर्म ही ॥
फल कर्म के जो त्यागता, त्यागी कहा जाता वही ॥१८.११॥

पाते सकामी देह तज, फल शुभ अशुभ मिश्रित सभी ॥
त्यागी पुरुष को पर न होता है, त्रिविध फल ये कभी ॥१८.१२॥

हैं पाँच कारण जान लो सब कर्म होने के लिए ॥
सुन मैं सुनाता सांख्य के सिद्धान्त में जो भी दिए ॥१८.१३॥

आधार कर्ता और सब साधन पृथक् विस्तार से ॥
चेष्टा विविध विध, दैव, ये हैं हेतु पाँच प्रकार के ॥१८.१४॥

तन मन वचन से जन सभी जो कर्म जग में कर रहे ॥
हों ठीक या विपरीत उनके पाँच ये कारण कहे ॥१८.१५॥

जो मूढ़ अपने आपको ही किन्तु कर्ता मानता ॥
उसकी नहीं है शुद्ध बुद्धि, न ठीक वह कुछ जानता ॥१८.१६॥

जो अहंकृत-भाव बिन, नहिं लिप्त जिसकी बुद्धि भी ॥
नहिं मारता वह मारकर भी, है न बन्धन में कभी ॥१८.१७॥

नित ज्ञान ज्ञाता ज्ञेय करते कर्म मे हं ऐ प्रेरणा ॥
है कर्मसंग्रह करण, कर्ता, कर्म तीनों से बना ॥१८.१८॥

सुन ज्ञान एवं कर्म, कर्ता भेद गुण अनुसार हैं ॥
जैसे कहे हैं सांख्य में, वे सर्व तीन प्रकार हैं ॥१८.१९॥

सब भिन्न भूतों में अनश्वर एक भाव अभिन्न ही ॥
जिस ज्ञान से जन देखता है, ज्ञान सात्त्विक है वही ॥२०॥

जिस ज्ञान से सब प्राणियों में भिन्नता का भान है ॥
सबमें अनेकों भाव दिखते, राजसी वह ज्ञान है ॥२१॥

जो एक ही लघुकार्य में आसक्त पूर्ण-समान है ॥
निःसार युक्ति-विहीन है वह तुच्छ तामस ज्ञान है ॥२२॥

फल-आश-त्यागी नित्य नियमित कर्म जो भी कर रहा ॥
बिन राग द्वेष, असंग हो, वह कर्म सात्त्विक है कहा ॥२३॥

आशा लिए फल की अहंकृत-बुद्धि से जो काम है ॥
अति ही परिश्रम से किया, राजस उसी का नाम है ॥२४॥

परिणाम, पौरुष, हानि, हिंसा का न जिसमें ध्यान है ॥
वह तामसी है कर्म जिसके मूल में अज्ञान है ॥२५॥

बिन अहंकार, असंग, धीरजवान्, उत्साही महा ॥
अविकार सिद्धि असिद्धि में सात्त्विक वही कर्ता कहा ॥२६॥

हिंसक, विषय-भय, लोभ-हर्ष-विषाद-युक्त मलीन है ॥
फल कामना में लीन, कर्ता राजसी वह दीन है ॥२७॥

चंचल, घमण्डी, शठ, विषादी, दीर्घसूत्री, आलसी ॥
शिक्षा-रहित, पर-हानि-कर, कर्ता कहा है तामसी ॥२८॥

होते त्रिविध ही हे धनंजय, बुद्धि धृति के भेद भी ॥
सुन भिन्न-भिन्न समस्त गुण-अनुसार कहता हूँ अभी ॥२९॥

जाने प्रवृत्ति निवृत्ति बन्धन मोक्ष कार्य अकार्य भी ॥
हे पार्थ, सात्त्विक बुद्धि है जो भय अभय जाने सभी ॥३०॥

जिस बुद्धि से निर्णय न कार्य अकार्य बीच यथार्थ है ॥
जाने न धर्म अधर्म को वह राजसी मति पार्थ, है ॥३१॥

तम-व्याप्त हो जो बुद्धि, धर्म अधर्म ही को मानती ॥
वह तामसी, जो नित्य अर्जु न, अर्थ उलटे जानती ॥३२॥

जब अचल धृति से क्रिया, मन प्राण इन्द्रिय की सभी ॥
धारण करे नित योग से, धृति शुद्ध सात्त्विक है तभी ॥३३॥

आसक्ति से फल-कामना-प्रिय धर्म अर्थ व काम है ॥
धारण किये जिससे उसी का राजसी धृति नाम है ॥३४॥

तामस वही धृति पार्थ, जिससे स्वप्न, भय, उन्माद को ॥
तजता नहीं दुर्ब उद्धि मानव, शोक और विषाद को ॥३५॥

अब सुन त्रिविध सुख-भेद भी जिसके सदा अभ्यास से ॥
सब दुःख का कर अन्त अर्ज उन, जन उसी में जा बसे ॥३६॥

आरम्भ में विषवत् सुधा सम किन्तु मधु परिणाम है ॥
जो आत्मबुद्धि-प्रसाद-सुख, सात्त्विक उसी का नाम है ॥३७॥

राजस वही सुख है कि जो इन्द्रिय-विषय-संयोग से ॥
पहिले सुधा सम, अन्त में विष-तुल्य हो फल-भोग से ॥३८॥

आरम्भ एवं अन्त में जो मोह जन को दे रहा ॥
आलस्य नीन्द प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा ॥३९॥

इस भूमि पर आकाश अथवा देवताओं में कहीं ॥
हो प्रकृति के इन तीन गुण से मुक्त ऐसा कुछ नहीं ॥४०॥

द्विज और क्षत्रिय वैश्य शूद्रों के परंतप, कर्म भी ॥
उनके स्वभावज ही गुणों अनुसार बाँटे हैं सभी ॥४१॥

शम दम क्षमा तप शुद्धि आस्तिक बुद्धि व विज्ञान भी ॥
द्विज के स्वभावज कर्म हैं, तन-मन-सरलता ज्ञान भी ॥४२॥

धृति शूरता तेजस्विता रण से न हटना धर्म है ॥
चातुर्य स्वामीभाव देना दान क्षत्रिय कर्म है ॥४३॥

कृषि धेनु-पालन वाणिज्य, वैश्य का ही कर्म है ॥
नित कर्म शूद्रों का स्वभावज लोक-सेवा धर्म है ॥४४॥

करता रहे जो कर्म निज-निज सिद्धि पाता है वही ॥
निज-कर्म-रत नर सिद्धि किस भाँति पाता नित्य ही ॥४५॥

जिससे प्रवृत्ति समस्त जीवों की तथा जग व्याप्त है ॥
निज कर्म से, नर पूज उसको सिद्धि करता प्राप्त है ॥४६॥

निज धर्म निर्ग उण श्रेष्ठ है, सुन्दर सुलभ पर-धर्म से ॥
होता न पाप स्वभाव के अनुसार करने कर्म से ॥४७॥

निज नियत कर्म सदोष हों, तो भी उचित नहिं त्याग है ॥
सब कर्म दोषों से घिरे, जैसे ए धुएँ से आग है ॥४८॥

वश में किये मन, अनासक्त, न कामना कुछ व्याप्त हो ॥
नैष्कम्र्य-सिद्धि महान तब, संन्यास द्वारा प्राप्त हो ॥४९॥

जिस भाँति पाकर सिद्धि होती ब्रह्म-प्राप्ति सदैव ही ॥
संक्षेप में सुन ज्ञान की अर्ज उन, परा-निष्ठा वही ॥५०॥

कर आत्म संयम धैर्य से अतिशुद्ध मति में लीन हो ॥
सब त्याग शब्दादिक विषय, नित राग-द्वेष-विहीन हो ॥५१॥

एकान्तसेबी अल्प-भोजी, तन मन वचन को वश किए ॥
हो ध्यान-युक्त सदैव ही, वैराग्य का आश्रय लिए ॥५२॥

बल अहंकार घमण्ड संग्रह क्रोध काम विमुक्त हो ॥
ममता-रहित नर शान्त, ब्रह्म-विहार के उपयुक्त हो ॥५३॥

जो ब्रह्मभूत प्रसन्न-मन है, चाह-चिन्ता-हीन है ॥
सम भाव सबमें साध, होता भक्ति में लवलीन है ॥५४॥

मैं कौन कैसा, भक्ति से उसको सभी यह ज्ञान हो ॥
मुझमें मिले तत्काल, मेरी जब तत्त्व से पहचान हो ॥५५॥

करता रहे सब कर्म भी, मेरा सदा आश्रय धरे ॥
मेरी कृपा से प्राप्त वह अव्यय सनातन पद करे ॥५६॥

मन से मुझे सारे समर्पित कर्म कर, मत्पर हुआ ॥
मुझमें निरंतर चित्त धर, सम-बुद्धि में तत्पर हुआ ॥५७॥

रख चित्त मुझमें, मम कृपा से दुःख सब तर जायेगा ॥
अभिमान से मेरी न सुनकर, नाश केवल पायेगा ॥५८॥

‘मैं नहीं करूँगा युद्ध’ तुम अभिमान से कहते अभी ॥
यह व्यर्थ निश्चय है, प्रकृति तुमसे करा लेगी सभी ॥५९॥

करना नहीं जो चाहता है, मोह में तल्लीन हो ॥
वह सब करेगा स्वभावजन्य कर्म के आधीन हो ॥६०॥

ईश्वर हृदय में प्राणियों के बस रहा है नित्य ही ॥
सब जीव यन्त्रारूढ़ सा, माया से घुमाता है वही ॥६१॥

इस हेतु ले उसकी शरण, सब भाँति से सब ओर से ॥
शुभ शान्ति लेगा नित्य-पद, उसकी कृपा की कोर से ॥६२॥

तुझसे कहा अतिगुप्त ज्ञान, समस्त यह विस्तार से ॥
जिस भाँति जो चाहे वही कर पार्थ, पूर्ण विचार से ॥६३॥

अब अन्त में अतिगुप्त हे कौन्तेय, कहता बात हूँ ॥
अतिप्रिय मुझे तू, अस्तु हित की बात कहता तात हँ ऊ ॥६४॥

रख मन मुझी में, कर यजन, मम भक्त बन, कर वन्दना ॥
मुझमें मिलेगा, सत्य प्रण तुझसे, मुझे तू प्रिय घना ॥६५॥

तज धर्म सारे एक मेरे ही शरण को प्राप्त हो ॥
मैं मुक्त पापों से करूँगा, तू न चिन्ता व्याप्त हो ॥६६॥

निन्दा करे मेरी, न सुनना चाहता, बिन भक्ति है ॥
उसको न देना ज्ञान यह, जिसमें नहीं तप शक्ति है ॥६७॥

यह गुप्त ज्ञान महान भक्तों से कहेगा जो सही ॥
मुझमें मिले पा भक्ति मेरी, असंशय, नर वही ॥६८॥

उससे अधिक प्रिय कार्य-कर्ता विश्व में मेरा नहीं ॥
उससे अधिक मुझको न प्यारा दूसरा होगा कहीं ॥६९॥

मेरी तुम्हारी धर्म-चर्चा जो पढ़े गा ध्यान से ॥
मैं मानता पूजा मुझे है, ज्ञानयज्ञ विधान से ॥७०॥

बिन दोष ढूँढे जो सुनेगा, नित्य श्रद्धायुक्त हो ॥
वह पुण्यवानों का परम शुभ लोक लेगा मुक्त हो ॥७१॥

अर्जुन, कहो तुमने सुना यह ज्ञान सारा ध्यान से ॥
अब भी छूटे हो या नहीं, उस मोहमय अज्ञान से ॥७२॥

अर्जुन बोले

अच्युत, कृपा से आपकी, अब मोह सब जाता रहा ॥
संशय रहित हूँ, सुधि आई, करूँगा हरि का कहा ॥७३॥

संजय बोले

इस भाँति यह रोमांचकारी और श्रेष्ठ रहस्य भी ॥
श्रीकृष्ण अर्जु न का सुना संवाद है मैंने सभी ॥७४॥

साक्षात् योगेश्वर स्वयं श्रीकृष्ण का वर्णन किया ॥
यह श्रेष्ठ योग-रहस्य व्यास-प्रसाद से सब सुन लिया ॥७५॥    

श्रीकृष्ण अर्जु न का निराला पुण्यमय संवाद है ॥
हर बार देता हर्ष है, आता मुझे जब याद है ॥७६॥

जब याद आता उस अनोखे रूप का विस्तार है ॥
होता तभी विस्मय तथा आनन्द बारम्बार है ॥७७॥

श्रीकृष्ण योगेश्वर जहाँ, अर्जुन धनुर्धारी जहाँ ॥     
वैभव, विजय, श्री, नीति सब मत से हमारे हैं वहाँ ॥७८॥

अट्ठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥१८

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥


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