लघुपाठ
धर्मानंद कोसंबी Updated: 15 April 2021 07:30 IST

लघुपाठ : गिरिमानन्दसुत्तं 2

धर्मानंद कोसंबी लिखित बुद्ध साहित्य

गिरिमानन्दसुत्तं 1   गिरिमानन्दसुत्तं 3

कतमा चानन्द अनत्तसञ्ञा | इधानन्द भिक्खु, अरञ्ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्ञागारगतो वा इति पटिसंचिक्खति | चक्खुं अनत्ता | रूपं अनत्ता | सोतं अनत्ता | सद्दा अनत्ता | घानं अनत्ता | गन्धा अनत्ता | जिव्हा अनत्ता | रसा अनत्ता | कायो अनत्ता | फोट्ठब्बा अनत्ता | मनो अनत्ता | धम्मा अनत्ता ति || इति इमेसु छसु अज्झत्तिक बाहिरेसु आयतनेसु अनत्तानुपस्सी विहरति || अयं वुच्चतानन्द अनत्तसञ्ञा ||

हे आनन्दस कोणती अनात्म्याची संज्ञा ? एकादा भिक्षु अरण्यांत झाडाखालीं किंवा एकान्त स्थळीं जाऊन असा विचार करितो कीं, चक्षु अनात्मा | रूप अनात्मा | श्रोत्र अनात्म | शब्द अनात्मा | घ्राण अनात्मा | गन्ध अनात्मा | जिह्ला अनात्मा | रस अनात्मा | काय अनात्मा | स्पर्श्य पदार्थ अनात्मा | मन अनात्मा | मनोधर्म अनात्मा | याप्रमाणे आध्यात्मिक सहा व बाह्य सहा आयतनें अनात्म आहेत असें जाणतो || हे आनन्द, हिला अनात्म्याची संज्ञा म्हणतात ||

कतमा चानन्द असुभसञ्ञा | इधानन्द भिक्खु इममेव कायं उद्धं पादतला अधो केसमत्थका तचपरियन्तं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्चवेक्खति अत्थि इमस्मिं काये केसा | लोभा | नखा | दन्ता | तचो | मंसं | नहारू | अट्ठी | अट्ठिमिआ | वक्कं | हृद्यं | यकनं | किलोमकं | पिहृकं | पप्फासं | अन्तं | अन्तगुणं | उदरियं | करीसं | पित्तं | सेम्हं | पुब्बो | लोहितं | सेदो | मेदो | अस्सु | वसा | खेलो | सिंघाणिका | लसिका | मुत्तं ति || इति इमस्मिं काये असुभानुपस्सी विहरति || अयं वुच्चतानन्द असुभसञ्ञा ||

हे आनन्द, कोणती अशुभाची संज्ञा ? एकादा भिक्षु पादतलांच्या वर, डोक्याच्या केसांखाली आणि त्वचेनें वेढलेला हा  देह अनेक अशुचि पदार्थानीं भरला आहे असें जाणतो | ह्या देहांत केस | लोभ | नखें | दात | त्वचा | मांस | स्नायू | हाडें | अस्थिमज्जा | वृक्क (मूत्राशय) | हृद्य | यकृत | क्लोम | प्लिहा | फुप्फुस | आंतडें | आंतडयांची दोरी | और्द्य | विष्टा | पित्त |कफ | पूं | रक्त | स्वेद | मेद | आसवें | वसा | थुंकी | शेंबूड | लसिका (सांध्यातील स्निग्ध पदर्थ) | मूत्र | हे पदार्थ आहेत || याप्रमाणें ह्या देहांत अशुभ पदार्थ आहेत असें जाणतो || हे आनन्द, हिला अशुभाची संज्ञा म्हणतात ||

कतमा चानन्द आदीनवसञ्ञा | इधानन्द भक्खु अरञ्ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्ञागारगतो वा इति पटिसंचिक्खति | बहु दुक्खो खो अयं कायो बहुआदीनवो | इति इमस्मिं काये विविधा आबाधा उप्पज्जन्ति|  सेय्यथिंदं | चक्खुरोगो | सोतरोगो | धानरोगो | कण्णरोगो | मुखरोगो | दन्तरोगो | कासो | ससो| पिनासो | डाहो | जरो | कुच्छिरागो | मुच्छा | पक्खदिका | सूला | विसूचिका | कुट्ठं | गण्डो | किलासो | सासो | अपमारो | दहु | कण्डु | कच्छु | नखसा | वितच्छिका | लोहितं | पित्तं | मधुमेहो | अंसा | पिटका | भगंदळा | पित्तसमुट्ठाना आबाधा | सेम्हसमुट्ठाना आबाधा | वातसमुट्ठाना आबाधा | सन्निपातिका आबाधा | उतुपरिणामजा आबाधा | विसमपरिहारजा आबाधा | ओपक्कमिका आबाधा | कम्मविपाकजा आबाधा| सीतं | उण्हं | जिघच्छा पिपासा | उच्चारो | पस्सावो ति || अति इमस्मिं कायो आदीनवानुपस्सी विहरति || अयं वुच्चतानन्द आदीनवसञ्ञा ||
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