भगवान बुद्ध (पूर्वार्ध)
धर्मानंद कोसंबी Updated: 15 April 2021 07:30 IST

भगवान बुद्ध (पूर्वार्ध) : श्रावकसंघ 15

गौतम बुद्धांचे चरित्र

श्रावकसंघ 14   श्रावकसंघ 16

स्त्रियांचा दर्जा

बुद्धाच्या धर्ममार्गांत स्त्रियांचा दर्जा पुरुषांएवढाच होता, हें सोमा भिक्षुणीच्या माराबरोबर झालेल्या खालील संवादावरून दिसून येईल.

दुपारच्या प्रहरीं सोमा भिक्षुणी श्रावस्तीजवळच्या अंधवनांत ध्यान करण्यासाठी बसली.  तेव्हा मार तिजपाशीं येऊन म्हणाला,

यन्तं इसीहि पत्तब्बं ठानं दुरभिसंभवं ।
न तं द्वंगुलपञ्ञाय सक्का पप्पोतुमित्थिया ॥

'जें (निर्वाण) स्थान ॠषींना मिळणें कठीण, तें (भात शिजला असतां तपासून पाहण्याची) दोन बोटांची जिची प्रज्ञा, त्या स्त्रीला मिळणें शक्य नाही.'

सोमा भिक्षुणी म्हणाली,

इत्थिभावो किं कयिरा चित्तम्हि सुसमाहिते ।
ञाणम्हि वत्तमानम्हि सम्मा धम्मं विपस्सतो ॥
यस्स नून सिया एवं इत्थाहं पुरिसो ति वा ।
किञ्च वा पन अस्मीति तं मारो वत्तुमरहति ॥*
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*  भिक्खुणीसंयुत्त, सुत्त २.
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'चित्त उत्तम प्रकारें समाधान पावलें असतां आणि ज्ञानलाभ झाला असतां सम्यकपणें धर्म जाणणार्‍या व्यक्तीला (निर्वाण मार्गांत) स्त्रीत्व कसें आड येणार ?  ज्या कोणाला मी स्त्री आहें, मी पुरुष आहें, किंवा मी कोणी तरी आहें, असा अहंकार* असेल, त्याला माराने या गोष्टी सांगाव्या !'
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*  अहंकार तीन प्रकारचा.  (१) मी श्रेष्ठ आहें हा मान.  (२) मी सदृश आहें हा मान आणि  (३) मी हीन आहें हा मान.  विभंग (P.T.S.)  पृ. ३४६ आणि ३५३.
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आपणाला सोमा भिक्षुणीने ओळखलें, असें जाणून मार दुःखित अन्तःकरणाने तेथेच अन्तर्धान पावला.

हा संवाद काव्यमय आहे.  तथापि त्यावरून बौद्ध संघांत स्त्रियांचा दर्जा कसा असे, हें स्पष्ट होतें.

निर्वाणमार्गांतील श्रावकांचे चार भेद

निर्वाणमार्गांत श्रावकांचे सोतापन्न, सकदागामी, अनागामी आणि अरहा, असे चार भेद असत.  सक्काय दिट्ठि (आत्मा हा भिन्न पदार्थ असून तो नित्य आहे अशी दृष्टि), विचिकिचदज्ञ (बुद्ध, धर्म आणि संघ यांजविषयीं शंका किंवा अविश्वास), सीलब्बतपरामास (स्नानादिक व्रतांनी आणि उपोषणांनी मुक्ति मिळेल असा विश्वास) या तीन संयोजनांचा (बंधनांचा) नाश केला असतां श्रावक सोतापन्न होतो; आणि त्या मार्गांत तो स्थिर झाला म्हणजे त्याला सोतापत्तिफलट्ठो* म्हणतात.  त्यानंतर कामराग (कामवासना), आणि पटिघ (क्रोध) हीं दोन संयोजनें शिथिल होऊन अज्ञान कमी झालें म्हणजे तो सकदागामी होतो; आणि त्या मार्गांत स्थिर झाल्यावर त्याला सकदागामिफलट्ठो म्हणतात.  या पांचही संयोजनांचा पूर्णपणें क्षय केल्यावर श्रावक अनागामी होतो; आणि त्या मार्गांत स्थिर झाल्यावर त्याला अनागामिफलट्ठो म्हणतात.  त्यानंतर रूपराग (ब्रह्मलोकादिप्राप्तीची इच्छा) अरूपराग (अरूप देवलोक प्राप्तीची इच्छा), मान (अहंकार), उद्धच्च (भ्रान्तचित्तता), आणि अविज्जा (अविद्या), या पांच संयोजनांचा क्षय करून तो अरहा (अर्हन्) होतो; आणि त्या मार्गांत स्थिर झाला म्हणजे त्याला अरहप्फलट्ठो (अर्हत्फलस्थ) म्हणतात.  याप्रमाणें श्रावकांचे चार किंवा आठ भेद करण्यांत येतात.
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*  फलट्ठो - फलस्थः
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