पहला भाग: अन्तरंग भाग
स्वामी सहजानन्द सरस्वती Updated: 15 April 2021 07:30 IST

पहला भाग: अन्तरंग भाग : महात्मा और दुरात्मा

स्वामी सहजानन्द सरस्वती लिखित भगवद गीता का हिंदी में सार

स्वभाव के प्रभाव   संन्यास और लोकसंग्रह

(पुराने लोगों ने कहा है कि महात्मा उसी को कहते हैं जो दिल-दिमाग में सोचे-विचारे जो कुछ वही जबान से भी बोले और वैसा ही काम भी करे। चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए और लोग हजार खुश या रंज हों, उसे किसी की परवाह नहीं होती। वह निर्भय और लापरवाह हो के एक ही तरह की बात सोचता-विचारता, बोलता और करता है।) विपरीत इसके दुरात्मा या दुष्ट सोचता-विचारता कुछ, कहता कुछ दूसरा ही और काम करता है तीसरे ही ढंग का। लोगों के दबाव, डर, भय और लाभ वगैरह का उस पर क्षण-क्षण में असर होता है। उसकी आत्मा पतित और कमजोर जो होती है - 'मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम । मनस्यन्यद्वचस्य न्यत्कर्मण्यन्यद्दुरात्मनाम।' इसका सारांश यह है कि दिमाग का काम है सोचना-विचारना; दिल का काम है किसी बात को पकड़ रखना, उससे चिपक जाना, उसी पर डटे रहना; जबान का काम है बात बोलना और हाथ-पाँव वगैरह का काम है अमल करना। महान पुरुष में इन चारों - दिमाग, दिल, जबान और हाथ-पाँव आदि - का सामंजस्य होता है, इनकी एकता होती है, इनका मेल होता है। उसके दिल, दिमाग, जबान और अमल में एक ही बात पाई जाती है। जरा भी अंतर नहीं मिलता। शील-मुरव्वत, भय-प्रीति, लाज-शर्म या हानि-लाभ का कोई भी खयाल उसे डिगा नहीं सकता। वह पर्वत की तरह अडिग हो के मौत के मुख में जाता हुआ भी जो कुछ सोचता-विचारता उसे ही बेधड़क बोलता और तदनुकूल ही आचरण करता है। प्रह्लाद, ध्रुव, ईसा, हुसेन, मंसूर, आदि की गणना ऐसे ही महापुरुषों में है।

लेकिन दुरात्मा या छोटे आदमियों की ऐसी हालत होती है कि शील-मुरव्वत, हानि-लाभ, लाज-शर्म, डर दबाव आदि के चलते कदम-कदम पर बदलते रहते हैं - क्षण में कुछ और क्षण में कुछ करते रहते हैं। वे गिरे होने के कारण सांसारिक प्रलोभनों से ऊँचे उठ नहीं सकते। यह ठीक है कि उनमें भी सभी तरह के लोग होते हैं। कोई बिलकुल ही गिरे एवं दबे होते हैं तो कोई उनसे जरा ऊपर होते हैं और तीसरे होते हैं दूसरों से भी जरा और ऊपर। इसी प्रकार नीचे और ऊपर हजारों होते हैं। बात असल यह है कि महात्मापन के लिए उक्त जिन चारों का मेल जरूरी है उनमें यदि तीन या दो का ही मेल हो सका, या चारों का मेल भी पूरा-पूरा न हो सका और यही बात तीन और दो के मेल में भी हुई तो वे लोग महात्मा तो हो सकते नहीं। वे तो नीचे जा पड़े। मगर उसी हिसाब से उनका पतन कम या बेश माना जाएगा। मेल में जितनी ज्यादा कमी होगी पतन उतना ही अधिक होगा। विपरीत इसके मेल जितना ही अधिक होगा उतना ही वे अपेक्षाकृत ऊपर या ऊँचे माने जाएँगे।

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