पहला भाग: अन्तरंग भाग
स्वामी सहजानन्द सरस्वती Updated: 15 April 2021 07:30 IST

पहला भाग: अन्तरंग भाग : संन्यास और त्याग

स्वामी सहजानन्द सरस्वती लिखित भगवद गीता का हिंदी में सार

गीता का योग   आत्मा का स्वरूप

अठारहवें अध्या य में 'नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित:' (7) और 'अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिना क्वचित्' (12) ये श्लोक आए हैं। इन दोनों में ही 'संन्यास' और 'त्याग' या 'संन्यासी' तथा 'त्यागी' शब्द आए हैं। इस अध्याआय के पहले ही श्लोक में जो प्रश्न किया गया है उससे स्पष्ट है कि संन्यास और त्याग दो चीजें हैं। इसीलिए दोनों की हकीकत अलग-अलग जानने के खयाल से ही सवाल किया गया है। फलत: यह धारणा स्वभावत: हो जाती है कि आगे के श्लोकों में जहाँ कहीं ये दोनों शब्द आए हैं, अलग-अलग मानी में ही प्रयुक्त हुए हैं। मगर है यह बात गलत - यह धारणा निराधार है। यह ठीक है कि अठारहवें अध्यााय में त्याग और संन्यास के स्वरूप अलग-अलग बताए गए हैं और हम भी उनके बारे में कुछ न कुछ कहेंगे। फिर भी उसका मतलब शब्दों के अर्थ से नहीं है। इन दोनों शब्दों का अर्थ तो अकसर एक ही माना जाता है। और गीता में एक ही अर्थ में दोनों ही प्राय: बोले गए हैं। फर्क तो त्याग और संन्यास नाम की चीजों की भीतरी बातों को लेकर ही माना जाता है। ऊपर से एक होने पर भी भीतर से इनमें कुछ बारीक भेद है - आमतौर से पुराने लोगों ने कुछ भेद इनमें किया है। उसी के जानने के लिए शुरू में प्रश्न किया गया है और जवाब भी दिया गया है।

फलत: यदि भ्रांत धारणा को जुदा करके या हटाके हम देखें तो पता लगेगा कि पूर्व लिखे 7वें और 12वें श्लोकों में त्याग तथा संन्यास एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं और एक की जगह दूसरे को बदल देने से अर्थ में कोई फर्क न पड़ के और भी स्पष्टता हो जाएगी। पहले श्लोक का सीधा अर्थ यही है कि 'किसी के भी लिए जो कर्म निश्चित कर दिए गए हैं उनका संन्यास उचित नहीं है, और अगर भूल या धोखे में पड़ के उनका त्याग कर दिया जाए तो वह तामस (तमोगुणी) त्याग माना जाता है।' यहाँ पहले वाक्य में जिस मानी में संन्यास शब्द आया है, दूसरे में उसी मानी में त्याग शब्द है। दूसरा मानी संभव नहीं है। इसीलिए पहले लिखे संन्यास शब्द के ही अनुसार त्याग का भी अर्थ आगे लगता है। विपरीत इसके 12वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में पहले त्यागी (त्यागिनाम्) लिख के पीछे संन्यासी (संन्यासिनाम्) लिखा है। श्लोक का अर्थ सिर्फ यही है कि 'बुरे, भले और मिश्रित - तीन प्रकार के - जो फल कर्मों के होते हैं वह उन्हीं को मिलते हैं जो त्यागी नहीं हैं, संन्यासियों को तो ये फल कभी नहीं मिलते।' यहाँ त्यागी के ही अनुसार संन्यासी का अर्थ भी त्यागी ही माना जाता है। यह बात बहुत साफ है। ठीक इसी तरह पाँचवें अध्यागय के उक्त श्लोक में भी पीछे के ब्रह्म शब्द का अर्थ पूर्व लिखे संन्यास शब्द के बल से संन्यास ही होना ठीक है। उपनिषदों में भी 'संन्यासो हि ब्रह्म' आदि प्रयोग में ब्रह्म शब्द संन्यास के अर्थ में ही आया है और गीता तो उपनिषद् हई।

जैसा कि अभी-अभी कहा है, गीता के अठारहवें अध्याीय में जो शंका त्याग और संन्यास की हकीकत या असलियत के बारे में की गई है, उससे भी संन्यास की कर्तव्यता सिद्ध हो जाती है। हम तो कही चुके हैं कि इन दोनों शब्दों के अर्थों में फर्क नहीं है। इसीलिए इस प्रश्न के बाद भी गीता में ही दोनों एक ही अर्थ में बोले गए हैं। सवाल तो हकीकत या बारीकी के बारे में ही है। इसीलिए प्रश्नवाले पहले श्लोक में, 'तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्' लिखा है, जिसका अर्थ है कि इन दोनों की हकीकत, असलियत या भीतरी बारीकियाँ जानना चाहता हूँ। तत्त्व शब्द इसी मानी में बोला ही जाता है। शब्दार्थ को तत्त्व नहीं कहते। किंतु जब कभी तत्त्व कहना होगा तो जिनके तत्त्व से अभिप्राय होगा उन चीजों की परिभाषा कर दी जाएगी, उनका लक्षण कर दिया जाएगा। यही बात हमेशा होती आती है। यहाँ भी आमतौर से दोनों का एक ही अर्थ समझा जाने के कारण ही अर्जुन को पूछना पड़ा कि आया दोनों की परिभाषा एक ही है या जुदी-जुदी? दोनों की असलियत एक है या दो? दोनों में बारीकियाँ कुछ-कुछ हैं या नहीं? इसी हिसाब से उसे उत्तर भी दिया गया है।

उत्तर की हालत यह है कि त्याग के बारे में लोगों की चार रायें होने के कारण और कृष्ण का खुद अपना भी एक स्वतंत्र विचार होने के कारण पहले उसी की हकीकत कहनी पड़ी है। हालाँकि प्रश्न में पहले संन्यास ही आया है। संन्यास के बारे में मतभेद या अनेक रायें न होने के कारण ही उसकी बात उनने पीछे उठाई हैं। सो भी बहुत दूर जा के। असल में त्याग का ब्योरा और विवरण देने के बाद ही संन्यास की बात समझने में आसानी भी हो जाती है। इसलिए भी त्याग के मुतल्लिक सारी बातें कहने के बाद ही संन्यास की बात कहना उचित समझा गया है। यही कारण है कि आरंभ से लेकर पूरे 48 श्लोकों में कर्म के संबंध की ही सारी बातें ब्योरे के साथ कही गई हैं, जिनसे त्याग के स्वरूप और उसकी हकीकत पर पूरा प्रकाश पड़ जाता है। फिर 49वें और 57वें श्लोकों में संन्यास का जिक्र आया है। मगर 57वें श्लोक वाला संन्यास शब्द तो ठीक वैसा ही है जैसा कि तीसरे अध्यांय के 'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्या्त्मचेतसा' (30) में आया है। क्योंकि वहाँ लिखा है कि 'चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्पर:।' मालूम होता है कि प्राय: अक्षरश: एक ही श्लोक का यह हिस्सा दोनों जगह लिखा गया है। तीसरे अध्याय वाले में जो 'अध्यापत्म' शब्द ज्यादा प्रतीत होता है, उसकी जगह अठारहवें वाले में आगे 'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' लिख दिया है। और भी आगे-पीछे बहुत-सी बातें मिल जाती हैं। फलत: वहाँ भी संन्यास का वही पुराना सर्वजन विदित अर्थ ही है। जिसे ईश्वरार्पण या मदर्पण आदि नाम दिया गया है। संन्यास शब्द संन्यास की उस हकीकत को यहाँ नहीं बताता है जिसके बारे में सवाल हुआ है।

बाकी बचा 49वें श्लोक का संन्यास। ठीक है यह तो उसी बात को कहता है जिसकी - जिस हकीकत की - जानकारी के लिए शुरू में ही शंका की जा चुकी है, प्रश्न हो चुका है। यदि इस समूचे श्लोक को गौर से विचारा जाए तो यह बात साफ हो जाती है। हम खुद आगे यह विचार करेंगे। मगर इतना तो जान लेना ही होगा कि यह श्लोक भी उस संन्यास की हकीकत या उसके स्वरूप की ओर सिर्फ इशारा ही करता है और यही कहता है कि संन्यास के जरिए किस तरह परम नैष्कर्म्यसिद्धि या सर्वात्मना कर्मत्याग की तरफ आदमी जा सकता है। लेकिन उस संन्यास का स्पष्ट रूप तो बिना उस शब्द का उच्चारण किए ही आगे के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' नामक 66वें श्लोक में ही बताया गया है। इस बात पर भी प्रकाश डालेंगे। मगर अभी त्याग की बात जान लें, तो अच्छा हो।

जैसा कि कहा जा चुका है दूसरे से लेकर 48वें श्लोक तक त्याग के संबंध की ही बातें कही गई हैं। सबसे पहले दो और तीन - दो - श्लोकों के दो-दो हिस्से करके चारों हिस्सों में त्याग के संबंध के चार मत कहे गए हैं जो संसार के विद्वानों में प्रचलित हैं। उसके बाद चार से लेकर छ: तक के - तीन - श्लोकों में कृष्ण ने त्याग के बारे में अपना सिद्धांत निश्चित रूप से कहा है और उसी का स्पष्टीकरण किसी न किसी रूप में 48वें तक के श्लोकों में किया है। दूसरे श्लोक में 'न्यासं' और 'संन्यासं' शब्दों को देख के यह समझने की भूल हर्गिज नहीं की जानी चाहिए कि पूर्वार्द्ध में 'संन्यास' का लक्षण कहा है। न्यास और संन्यास शब्दों का तो एक ही अर्थ है। फलत: कामनापूर्वक किए गए (काम्य) कर्मों के संन्यास को संन्यास कहते हैं, इस कथन का कोई अर्थ नहीं है। इसीलिए हम तो यही मानते हैं कि दूसरे के पूर्वार्द्ध में 'कवयो विदु:' - 'सूक्ष्म बुद्धिवाले जानते हैं', उत्तरार्द्ध में 'विचक्षणा: प्राहु:' - 'कुशल लोग कहते हैं' तथा तीसरे के पूर्वार्द्ध में 'प्राहुर्मनीषिण:' - 'मनीषी लोग कहते हैं,' और उत्तरार्द्ध में 'अपरे प्राहु:' - 'दूसरे लोग कहते हैं' - ऐसा कह के चार मतवादों या सिद्धांतों का कर्मों के त्याग के बारे में वर्णन किया गया है। साफ ही चारों एक दूसरे से पृथक मालूम पड़ते हैं। प्रश्न में भी त्याग के बारे में 'पृथक' तत्त्व या अलग-अलग हकीकत पूछी गई है। इसीलिए उत्तर भी उसी ढंग का दिया गया है। इस प्रकार संक्षेप में पहला मत है केवल काम्य कर्मों के ही त्यागने का, दूसरा है केवल सभी कर्मों के फलों के ही त्याग का, न कि किसी भी कर्म के त्याग का, तीसरा है सभी कर्मों के ही त्याग का और चौथा है यज्ञ, दान तथा तप के सिवाय शेष कर्मों के त्याग का। इस प्रकार त्याग के बारे में चार तरह के सिद्धांत साफ हो जाते हैं।

आगे के 4 से 6 तक के श्लोकों में कृष्ण ने जो खुद अपना मत बताया है उसमें यह कहा है कि यज्ञ, दान तथा तप को भी कर्मासक्ति एवं फलासक्ति छोड़कर ही, करना यही त्याग कहा जाता है, कहा जाना चाहिए। उनने इन तीनों कर्मों की बड़ी बड़ाई की है और कहा है कि 'ये तो पवित्र करने वाले हैं ऐसा मनीषी लोग भी मानते हैं' - यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्। फलत: इनके छोड़ने का सवाल तो उठी नहीं सकता। हाँ, यह किया जाना चाहिए जरूर कि इनमें तथा इनके फलों में आसक्ति रहने न पाए। जहाँ चौथा पक्ष इन तीनों के करने में कोई विशेष बात नहीं कहता, तहाँ कृष्ण का मत है कि इन तीनों को भी कर्मासक्ति तथा फलासक्ति छोड़कर ही करना होगा।

फिर 7 से लेकर 12 तक के श्लोकों में त्याग की सात्त्विक आदि किस्में बताके उसका विवरण दिया गया है। उसके बाद कर्म के पाँच कारणों का निरूपण करके 13 से 17 तक यह सिद्ध किया गया है कि आत्मा तो इन पाँचों में है नहीं। वह तो अलग और निर्लेप है। इसलिए कर्म का साथी उसे मानके सभी कर्मों से बचने की कोशिश बेकार है, नादानी है। बाद में 18 से 28 तक यह बात विचारी गई है कि आखिर कर्म होता है कैसे और वह रहता है कहाँ, और इस तरह प्रतिपादन किया गया है कि आत्मा से उसका ताल्लुक हई नहीं। वह तो दूसरी ही चीजें हैं जिनसे कर्म संबद्ध है। कर्म के करने में अंत:करण या बुद्धि और धृति (हिम्मत, धारणशक्ति) की जरूरत होती है। ये दोनों न रहें तो कर्म हवा में मिल जाए। बुद्धि रास्ता बताती है और धृति पस्ती आने न देकर कर्म मार्ग में डँटे रहना लाती है। इसलिए जरूरी हो गया है कि इन दोनों का भी विश्लेषण किया जाए। क्योंकि शायद इनमें किसी में कहीं आत्मा आ जाए। मगर 29 से 35 तक के श्लोकों में इन दोनों को त्रिगुणात्मक बताके आत्मा को अलग ही मान लिया है। जिस आराम और सुख के लिए कर्म करते हैं उसका निरूपण 36-39 श्लोकों में करके उनमें सात्त्विक सुख को आत्मानंद माना है सही; मगर वह कर्मजन्य हुई नहीं। उसके लिए केवल अपनी बुद्धि की निर्मलता अपेक्षित है - 'आत्म-बुद्धिप्रसादजम्।' वह भले ही कर्मजन्य हो सकती है। शेष दो सुख तो आत्मा से लाख कोस दूर हैं। इसके उपरांत आमतौर से 40वें में कह दिया है कि कर्म तो सांसारिक चीजों की सिद्धि के ही लिए किया जाता है और वह चीजें तो सभी की सभी त्रिगुणात्मक होने के कारण आत्मा से अलग हैं। प्रसंगवश चारों वर्णों के स्वाभाविक गुणों का 41-44 श्लोकों में दिग्दर्शन कराके दिखा दिया है कि आत्मा से इनका क्या ताल्लुक? इस प्रकार जब कर्मों से ही भय करने की कोई वजह न होने के कारण बंधन के डर से उन्हें स्वरूपत: त्याग करने का सवाल आता ही नहीं, तो यज्ञ, दान, तप के स्वरूपत: त्याग की बात कहाँ और क्यों आएगी? इस तरह त्याग का सविस्तार निरूपण पूरा हो जाता है। चारों वर्णों के कर्म जब स्वाभाविक (स्वभावज) ही हैं तो फिर उनके बुरे-भले या छोटे-बड़े होने का प्रश्न भी कहाँ आता है? जैसा कि आग का स्वाभाविक काम जलाना और पानी का भिगोना होने के कारण उनमें भले-बुरे या नीच-ऊँच का सवाल नहीं उठता; ठीक यही बात यहाँ भी है। इस तरह वर्ण-धर्मों और कर्मों की समानरूपता भी प्रसंगत: सिद्ध हो जाती है।

विपरीत इसके 45-48 श्लोकों में स्पष्ट कह दिया है कि स्वकर्म यदि ऊपर से बुरा भी प्रतीत हो तो भी उसे हर्गिज नहीं छोड़ना चाहिए। वह सहज (स्वाभाविक) जो ठहरा। उसी के द्वारा भगवान की पूजा भी तो होती है। कर्म ही तो भगवत्पूजा है। यदि भगवान को संतुष्ट करना या उसे जानना चाहते हो तो स्वकीय कर्मों को ही ठीक-ठीक करना चाहिए। इस तरह तो त्याग की जगह कर्मों का करना ही जरूरी हो जाता है। क्योंकि भगवत्पूजा तो आखिर करनी ही है न?

इसके बाद 49-55 तक संन्यास की उपयोगिता और उसकी दशा को बता के 56-65 तक उसके लिए ही कर्मों की उपयोगिता बताई गई है। अब रह गई संन्यास की बात। सो तो 49 से ही शुरू होती है और 66वें में उसका स्पष्ट रूप दिखाया गया है। 49वाँ श्लोक यों है, 'असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह:। नैष्कर्म्य सिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।' इसका सीधा अर्थ यही है कि 'जिसकी बुद्धि कहीं लिपटी न हो, जिसका मन अपने वश में हो और जिसे कोई भी लोभ-लालच रह न गया हो वही संन्यास के द्वारा कर्मों के त्याग की अंतिम दशा को प्राप्त हो सकता है।' मन, बुद्धि आदि पर अपना अधिकार रखने से कर्मों के त्याग का रास्ता साफ हो जाता है और बहुतेरे काम छूट भी जाते हैं। फिर भी नियत या स्वाभाविक कर्म तो होते ही रहते हैं। फलत: जब तक उनका भी त्याग न हो जाए पूरी निष्कर्मता या कर्मों के त्याग की आखिरी और पूर्ण हालत पर पहुँच नहीं सकते। इसीलिए संन्यास या कर्मों का स्वरूपत: त्याग तब जरूरी हो जाता है।

कर्मत्याग की पूर्णता की जरूरत क्या है, यह सवाल हो सकता है। मगर इसका उत्तर तो 'आरुरुक्षोर्मुनर्यो' की व्याख्या के समय दिया जा चुका है। वही बात यहाँ भी 50 से लेकर 55 तक के श्लोकों में कही गई है। ये श्लोक समाधि का ही ब्योरेवार निरूपण करते हैं और कहते हैं कि अगर कुछ भी कर्मों का झमेला रहा तो समाधि हवा में ही मिल जाएगी। फिर तो योगारूढ़ या आत्मदर्शी होना असंभव हो जाएगा। समाधि के लिए प्राय: बहुत ज्यादा समय लगता है - दीर्घकाल की अपेक्षा है। सो भी जब वह निरंतर चालू रहे और बीच में विराम होने न पाए। मन के निरोध को ही तो समाधि कहते हैं। फलत: उसके निरोध के लिए जो अभ्यास किया जाता है उसके बारे में योगदर्शन के समाधिपाद में पतंजलि ने साफ ही कह दिया है कि श्रद्धापूर्वक निरंतर बहुत दिनों तक करते रहने पर ही वह दृढ़ होता है - 'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारसेवितो दृढ़भूमि:' (14)। तब इसमें कर्म की जरा भी गुंजाइश कहाँ रह जाती है? उसकी तो जरूरत तभी तक थी जब तक कि आत्मदर्शन की तरफ मन का झुकाव नहीं हुआ था। अब वैसा होने पर तो कर्मों का त्याग नितांत आवश्यक हो जाता है।

हाँ, आत्मदर्शन हो जाने के बाद भले ही कर्म कर सकते हैं। क्योंकि तब तो खामख्वाह कर्मों के छोड़ने का सवाल रही नहीं जाता। पुराने संस्कारों के बल से आत्मज्ञानी लोग दोनों ही तरह के होते हैं, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है। कर्मयोगी भी होते हैं, जैसे जनक आदि और संन्यासी भी, जैसे शुकदेव आदि। पहले तो भगवदर्पण बुद्धि वगैरह से ही कर्म करते हैं। फिर ज्ञान के बाद कर्तव्यबुद्धि से या विशुद्ध लोकसंग्रह की ही दृष्टि से। यही बात 56 से 65 तक के श्लोकों में कहके और इसी पर जोर देके 66वें में संन्यास के स्वरूप वाले प्रश्न का उत्तर देते हुए साफ कह दिया है कि 'सभी धर्मकर्मों को छोड़ के अद्वितीय परमात्मा (आत्मा) की शरण जाओ - आत्मज्ञान प्राप्त करो। उसी के फलस्वरूप सभी पुण्यपाप रूप बंधनों से छुटकारा हो जाएगा। फिक्र मत करो - 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच।' पहले इसी चीज को भक्ति के भी नाम से 54वें श्लोक में कहा है और 55वें में बताया है कि यह भक्ति अद्वैत ब्रह्मज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। सातवें अध्याकय के 'चतुर्विधा भजन्ते मां' आदि 16-19 श्लोकों में भी अद्वैत ज्ञान को ही सबसे ऊँचे दर्जे की भक्ति कहा है। इसीलिए जो लोग इस श्लोक में शरणागति और प्रपत्ति आदि के नामों से उपासना, श्रवण, कीर्त्तन आदि नामक भक्ति की बात सोचते हैं वह सत्य से बहुत दूर हैं। यदि पहले के ही कुछ श्लोकों पर अच्छी तरह गौर करें तो भी उन्हें पता लग जाएगा कि यहाँ सर्वकर्म - संन्यासपूर्वक अद्वैतज्ञान से ही मतलब है। उसी के बाद निर्वाण-मोक्ष के लिए कोई चिंता करने की गुंजाइश नहीं रहती। बाकी भक्ति आदि में तो रहती ही है। फलत: फिक्र मत करो, कहना गलत हो जाएगा। क्योंकि यदि और नहीं तो भगवान को प्रसन्न करने की ही चिंता रह जाती है।

जिस तरह कर्म और संन्यास की ही बात को लेके अठारहवें अध्यानय का विश्लेषण करना जरूरी हो गया है, क्योंकि अंतिम एवं उपसंहारवाला वही है; उसी तरह दूसरे अध्याूय की भी कुछ बातें विचारणीय हैं। पहला अध्या य पूरा का पूरा और दूसरे के शुरू के दस श्लोकों को गीतोपदेश की भूमिका मानते हैं, जिसमें उपदेश के लिए भूमि, क्षेत्र या प्रसंग तैयार किया गया है। यह बात तो श्लोकों के अर्थ के ही समय और आगे भी विदित होगी। 11वें श्लोक 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वं' से उपदेश शुरू होता है। गीता पर शंकर का भाष्य भी इसी श्लोक से शुरू होता है। बेशक, उनने भी भाष्यारंभ में एक लंबी भूमिका लिखी है और उसी से हमने शुरू में 'तत्त्वज्ञानिनां कर्म तु' आदि एक छोटा-सा अवतरण दिया है। इस अध्याहय के कुल 72 श्लोकों में शुरू के 10 तो यों ही - चले गए। उनके बाद से लेकर 38वें तक मुख्यत: आत्मा के स्वरूप आदि का विवेचन करके 39वें में लिखा है कि 'हमने अब तक सांख्य (तत्त्वज्ञान) की जानकारी तुम्हें बताई है। अब आगे योग की जानकारी की बात सुनो' - "एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।" इससे स्पष्ट है कि आगे दूसरी - योग की ही - बात कही गई है।

. . .