कबीर के भजन
संत कबीर Updated: 15 April 2021 07:30 IST

कबीर के भजन : बहुरि नहिं

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है। कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे। भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी। कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं|

केहि समुझावौ   मन लाग्यो मेरो यार

बहुरि नहिं आवना या देस॥ टेक॥

जो जो ग बहुरि नहि आ पठवत नाहिं सॅंस॥ १॥

सुर नर मुनि अरु पीर औलिया देवी देव गनेस॥ २॥

धरि धरि जनम सबै भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस॥ ३॥

जोगी जङ्गम औ संन्यासी दीगंबर दरवेस॥ ४॥

चुंडित मुंडित पंडित लो सरग रसातल सेस॥ ५॥

ज्ञानी गुनी चतुर अरु कविता राजा रंक नरेस॥ ६॥

को राम को रहिम बखानै को कहै आदेस॥ ७॥

नाना भेष बनाय सबै मिलि ढूंढि फिरें चहुॅं देस॥ ८॥

कहै कबीर अंत ना पैहो बिन सतगुरु उपदेश॥ ९॥

. . .