गीतांजलि
रवीन्द्रनाथ ठाकुर Updated: 15 April 2021 07:30 IST

गीतांजलि : मुझे झुका दो, मुझे झुका दो

गीतांजलि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओ का संग्रह है, जिनके लिए उन्हे सन् १९१३ में नोबेल पुरस्कार मिला था। 'गीतांजलि' शब्द गीत और अन्जलि को मिला कर बना है जिसका अर्थ है - गीतों का उपहार (भेंट)। यह अग्रेजी में लिखी १०३ कविताएँ हैं। इस रचना का मूल संस्करण बंगला मे था जिसमें ज्यादातर भक्तिमय गाने थे।

कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला   आज द्वार पर आ पहुँचा है जीवंत बसंत

मुझे झुका दो,मुझे झुका दो
अपने चरण तल में,
करो मन विगलित, जीवन विसर्जित
नयन जल में.

अकेली हूँ मैं अहंकार के
उच्च शिखर पर-
माटी कर दो पथरीला आसन,
तोड़ो बलपूर्वक.
मुझे झुका दो,मुझे झुका दो
अपने चरण तल में,

किस पर अभिमान करूँ
व्यर्थ जीवन में
भरे घर में शून्य हूँ मैं
बिन तुम्हारे.

दिनभर का कर्म डूबा मेरा
अतल में अहं की,
सांध्य-वेला की पूजा भी
हो न जाए विफल कहीं.

मुझे झुका दो,मुझे झुका दो
अपने चरण तल में.

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