भजन
संकलित Updated: 15 April 2021 07:30 IST

भजन : दीनबन्धु दीनानाथ, मेरी तन हेरिये

भजन

हरि, पतित पावन सुने   हे गोविन्द राखो शरन

दीनबन्धु दीनानाथ, मेरी तन हेरिये ॥

भाई नाहिं, बन्धु नाहिं, कटुम-परिवार नाहिं ।
ऐसा कोई मीत नाहिं, जाके ढिंग जाइये ॥

खेती नाहिं, बारी नाहिं, बनिज ब्योपार नाहिं
ऐसो कोउ साहु नाहिं जासों कछू माँगिये ॥

कहत मलूकदास छोड़ि दे पराई आस,
रामधनी पाइकै अब काकी सरन जाइये ॥

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