संत साहित्य

संतांचा अर्थ असा आहे की भक्तांनी बनविलेले धार्मिक साहित्य. जो निर्गुण उपासक आहे त्याला संत म्हटले पाहिजे हे आवश्यक नाही. याअंतर्गत लोकमंगलविद्या ही सर्व सगुण-निर्गुणांकडे येते, परंतु आधुनिकांनी निर्गुण्य भक्तांना "संत" हे नाव दिले आणि आता त्या वर्गात हा शब्द सुरू झाला आहे. "संत" हा शब्द संस्कृतच्या पहिल्या "सत" चा बहुवचन रूप आहे, ज्याचा अर्थ सज्जन आणि धार्मिक व्यक्ती आहे. मराठीमध्ये साधू / सुधारक हा शब्द प्रचलित झाला. ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम, नामदेव इत्यादी संतांनी अभंग, भजन, गीते बनवून अगाध साहित्य निर्माण केले..

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श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १७

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १७

श्रीपराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! पूर्वकालमें महात्मा सगरसे उनके पूछनेपर भगवान् और्वने इस प्रकार गृहस्थके सदाचारका निरूपण किया था ॥१॥ हे द्विज ! मैंने भी तुमसे इसका पूर्वतया वर्णन...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १६

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १६

और्व बोले - हवि, मत्स्य, शशक, ( खरगोश) , नकुल, शूकर, छाग , कस्तुरिया मृग, कृष्ण मृग, गवय ( वन - गाय ) और मेषके मांसोसें तथा गव्य ( गौके...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १५

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १५

और्व बोले - हे राजन् ! श्राद्धकालमें जैसे गुणशील ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये वह बतलाता हूँ, सुनो । त्रिणाचिकेत, त्रिमुध, त्रिसुपर्ण छहों वेदांगोके जाननेवाले, वेदवेत्ता, श्रोत्रिय योगी और ज्येष्ठसामग, तथा...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १४

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १४

और्व बोले - हे राजन् ! श्रद्धासहित श्राद्धकर्म करनेसे मनुष्य ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसुगण, मरुद्र्ण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, ऋषिगण तथा भूतगण आदि सम्पूर्ण जगत्‌को...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १३

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १३

और्व बोले - पुत्रके उप्तन्न होनेपर पिताको सचैल ( वस्त्रोसहित ) स्नन करना चाहिये । उसके पश्चात जातकर्म - संस्कार और आभ्युदयिक श्राद्ध करने चाहिये ॥१॥ फिर तन्मयभावसे अनन्यचित होकर...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १२

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १२

और्व बोले - गृहस्थ पुरुषको नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्यकी पूजा करनी चाहिये और दोनों समय सन्ध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये ॥१॥ गृहस्थ पुरुष सदा ही...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ११

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ११

सगर बोले - हे मुने ! मैं गृहस्थके सदाचारोंको सुनना चाहता हूँ, जिनका आचरण करनेसे वह इहलोक और परलोक दोनों जगह पतित नहीं होता ॥१॥ और्व बोले - हे पृथिवीपाल...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १०

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १०

सगर बोले - हे द्विजश्रेष्ठ ! आपने चारों आश्रम और चारों वर्णोके कर्मोका वर्णन किया । अब मैं आपके द्वारा मनुष्योकें ( षोडश संस्काररूप ) कर्मोको सुनना चाहता हूँ ॥१॥...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ९

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ९

और्व बोले - हे भूपते ! बालकको चाहिये कि उपनयन संस्कारके अनन्तर वेदाध्ययनमें तत्पर होकर ब्रह्माचर्यका अवलम्बन कर सावधानतापूर्वक गुरुगृहमें निवास करे ॥१॥ वहाँ रहकर उसे शौच और आचारव्रतका पालन...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ८

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ८

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे भगवान् ! जो लोग संसारको जीतना चाहते हैं वे जिस जगत्पति भगवान् विष्णुकी उपासना करते है, वह वर्णन कीजिये ॥१॥ और हे महामुने ! उन गोविन्दकी...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ७

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ७

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे गुरो ! मैंने जो कुछ पुछा था वह सब आपने यथावत् वर्णन किया । अब मैं एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ६

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ६

श्रीपराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! जिस क्रमसे व्यासजीके शिष्य जैमिनिने सामवेदकी शाखाओंका विभाग किया था, वह मुझसे सुनो ॥१॥ जैमिनिका पुत्र सुमन्तु था और उसका पुत्र सुकर्मा हुआ ।...