संत साहित्य

संतांचा अर्थ असा आहे की भक्तांनी बनविलेले धार्मिक साहित्य. जो निर्गुण उपासक आहे त्याला संत म्हटले पाहिजे हे आवश्यक नाही. याअंतर्गत लोकमंगलविद्या ही सर्व सगुण-निर्गुणांकडे येते, परंतु आधुनिकांनी निर्गुण्य भक्तांना "संत" हे नाव दिले आणि आता त्या वर्गात हा शब्द सुरू झाला आहे. "संत" हा शब्द संस्कृतच्या पहिल्या "सत" चा बहुवचन रूप आहे, ज्याचा अर्थ सज्जन आणि धार्मिक व्यक्ती आहे. मराठीमध्ये साधू / सुधारक हा शब्द प्रचलित झाला. ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम, नामदेव इत्यादी संतांनी अभंग, भजन, गीते बनवून अगाध साहित्य निर्माण केले..

Install App

सर्व पाने

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ५

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ५

श्रीपराशरजी बोले - हे महामुने ! व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनने यजुर्वेदरूपी वृक्षकी सत्ताईस शाखाओंकी रचना की: और उन्हें अपने शिष्योंको पढ़या तथा शिष्योंने भी क्रमशः ग्रहण किया ॥१-२॥ हे द्विज !...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ४

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ४

श्रीपराशरजी बोले - सृष्टीके आदिमें ईश्वरमें आविर्भुत वेद ऋक् - यजुः आदि चार पादोंसे युक्त और एक लक्ष मन्तवाला था । उसीसे समस्त कमानाओंको देनेवाले अग्निहोत्रादि दस प्रकारके यज्ञोंका प्रचार...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ३

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ३

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे भगवान् ! आपके कथनसे मैं यह जान गया कि किस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है, विष्णुमें ही स्थित हैं, विष्णुसे ही उप्तन्न हुआ है तथा...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय २

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय २

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे विप्रर्षे ! आपने यह सात अतीत मन्वन्तरोंकी कथा कहीं, अब आप मुझसे आगामी मन्वन्तरोंका भी वर्णन कीजिये ॥१॥ श्रीराशरजी बोले - हे मुने ! विश्वकर्माकी पुत्री...

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १

श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे गुरुदेव ! आपने पृथिवी और समुद्र आदिकी स्थिति तथा सूर्य आदि ग्रहगणके संस्थानका मुझसे भली प्रकार अति विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥१॥ आपने देवता आदि और ऋषिगणोकी...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १६

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १६

ब्राह्मण बोले - हे नरेश्वर ! तदनन्तर सहस्त्र वर्ष व्यतीत होनेपर महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये उसी नगरको गये ॥१॥ वहाँ पहूँचनेपर उन्होंने देखा कि वहाँका राजा बहुत -...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १५

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १५

श्रीपराशरजी बोले- हे मैत्रेय ! ऐसा कहनेपर, राजाको मौन होकर मन-ही-मन-सोच-विचार करते देख वे विप्रवर यह अद्वैत - सम्बन्धिनी कथा सुनाने लगे ॥१॥ ब्राह्मण बोले - हे राजाशार्दुल ! पूर्वकालमें...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १४

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १४

श्रीपराशरजी बोले - उनके ये परमार्थमय वचन सुनकर राजाने विनयावनत होकर उन विप्रवरसे कहा ॥१॥ राजा बोले - भगवान् ! आपने जो परमार्थमय वचन कहे हैं उन्हें सुनकर मेरी मनोवृत्तियाँ...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १३

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १३

श्रीमैत्रजी बोले - हे भगवान् ! मैंने पृथिवी, समुद्र, नदियों और ग्रहगणकी स्थिति आदिंके विषयमें जो कुछ पूछा था सो सब आपने वर्णन कर दिया ॥१॥ उसके साथ ही आपने...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १२

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १२

श्रीपराशरजी बोले - चन्द्रमाका रथ तीन पहिंयोवाला है, उसके वाम दक्षिण ओर कुन्दकुसुमके समान श्वेतगर्ण दस घोडे़ जुते हुए हैं । ध्रुवके आधारपर स्थित उस वेगशाली रथसे चन्द्रदेव भ्रमण करते...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ११

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ११

श्रीमैत्रेयजी बोले - भगवान् ! आपने जो कहा कि सूर्यमण्डलमें स्थित सातों गण शीत-ग्रीष्म आदिके कारण होते हैं, सो मैंने सुना ॥१॥ हे गुरो ! आपने सूर्यके रथमेजं स्थित और...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १०

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १०

श्रीपराशरजी बोले - आरोह और अवरोहके द्वारा सूर्यको एक वर्षमें जितनी गति हैं उस सम्पूर्ण मार्गकी दोनों काष्ठाओंका अन्तर एक सौ अस्सी मण्डल है ॥१॥ सूर्यका रथ ( प्रति मास...