संत साहित्य

संतांचा अर्थ असा आहे की भक्तांनी बनविलेले धार्मिक साहित्य. जो निर्गुण उपासक आहे त्याला संत म्हटले पाहिजे हे आवश्यक नाही. याअंतर्गत लोकमंगलविद्या ही सर्व सगुण-निर्गुणांकडे येते, परंतु आधुनिकांनी निर्गुण्य भक्तांना "संत" हे नाव दिले आणि आता त्या वर्गात हा शब्द सुरू झाला आहे. "संत" हा शब्द संस्कृतच्या पहिल्या "सत" चा बहुवचन रूप आहे, ज्याचा अर्थ सज्जन आणि धार्मिक व्यक्ती आहे. मराठीमध्ये साधू / सुधारक हा शब्द प्रचलित झाला. ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम, नामदेव इत्यादी संतांनी अभंग, भजन, गीते बनवून अगाध साहित्य निर्माण केले..

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सर्व पाने

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ९

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ९

श्रीपराशरजी बोले- आकाशमें भगवान् विष्णुका जो शिशुमार ( गिरगिट अथवा गोधा ) के समान आकारवाला तारामय स्वरूप देखा जाता है, उसके पुच्छ-भागमें ध्रुव अवस्थित है ॥१॥ यह ध्रुव स्वयं घुमता...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ८

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ८

श्रीपराशरजी बोले - हे सुव्रत ! मैंने तुमसे यह ब्रह्माण्डकी स्थिति कही, अब सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति और उनके परिमाण सुनो ॥१॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ७

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ७

श्रीमैत्रेयजी बोले - ब्रह्मन् ! आपने मुझसे समस्त भूमण्डलका वर्णन किया ! हे मुने ! अब मैं भुवलोंक आदि समस्त लोकोंके विषयमें सुनना चाहता हूँ ॥१॥ हे महाभाग ! मुझे...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ६

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ६

श्रीपराशरजी बोले - हे विप्र ! तदनन्तर पृथिवी और जलके नीचे नरक हैं जिनमें पापी लोग गिराये जाते हैं । हे महामुने ! उनका विवरण सुनो ॥१॥ रौरव , सूकर,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ५

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ५

श्रीपराशरजी बोले - हे द्विज ! मैंने तुमसे यह पृथिवीका विस्तार कहा; इसकी ऊँचाई भी सत्तर सहस्त्र योजन कही जाती हैं ॥१॥ हे मुनिसत्तम ! अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान, महातल,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ४

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ४

श्रीपराशरजे बोले - जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरें हुए प्लक्षद्वीप स्थित है ॥१॥ जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और हे ब्रह्मन ! प्लक्षद्वीपका...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ३

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय ३

श्रीपराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! जो समुद्रके उत्तर तथा हिमालयके दक्षिणमें स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है । उसमें भरतकी सन्तान बसी हुई है ॥१॥ हे महामुने !...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय २

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय २

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे ब्रह्मन ! अपने मुझसे स्वायम्भुवमनुके वंशका वर्णन किया । अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विवरण सुनना चाहता हूँ ॥१॥ हे मुने ! जितने भी सागर,...

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १

श्रीविष्णुपुराण - द्वितीय अंश - अध्याय १

श्रीमैत्रेयजी बोले - हे भगवान् ! हे गुरो ! मैंने जगत्‌की सृष्टीके विषयमें जो कुछ पूछा था वह सब आपने मुझसे भली प्रकार कह दिया ॥१॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! जगत्‌की...